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खिलवत - प्रकरण ११ | Khilwat prakaran 11

हक रूहन की खिलवत

खिलवत हक रूहन की, जो इस्क रूहों असल । ए बातून बका अर्स की, बीच न आवे फना अकल ॥१॥

रूहें बड़ी रूह सों मिलके, बहस किया हकसों । हम तुमारे आसिक, इस्क है हम मों ॥२॥

बड़ी रूह कहे तुम सांची सबे, पर इस्क मेरा काम । अव्वल हक और रूहन सों, इन इस्कै में मेरा आराम ॥३॥

फेर जवाब रूहन को, इन विध दिया हक । इस्क तुमारा भले है, पर मैं तुमारा आसिक ॥४॥

हक आसिक बड़ी रूह का, और रूहों का आसिक । ए क्यों कहिए सीधा इस्क, बन्दों का आसिक हक ॥५॥

रूहें चाहिए आसिक हक के, और आसिक बड़ी रूह के । और बड़ी रूह भी आसिक हक की, सीधा इस्क बेवरा ए ॥६॥

तुम सब रूहें मेरे तन हो, तुम सों इस्क जो मेरे दिल । ए क्यों कर पाओ बका मिने, जो सहूर करो सब मिल ॥७॥

तब हक के दिल में उपज्या, मैं देखाऊं अपना इस्क । और देखाऊं साहेबी, रूहें जानत नहीं मुतलक ॥८॥

तब हक के अंग का नूर जो, जो है नूरजलाल । तब तिनके दिल पैदा हुआ, देखों इस्क नूरजमाल ॥९॥

कैसा इस्क बड़ी रूह सों, कैसा इस्क साथ रूहन । बड़ी रूह का इस्क हक सों, इस्क हक सों कैसा है सबन ॥१०॥

एह रब्द हमेसा रहे, बड़ी रूह रूहें और हक । अब घट बढ़ क्यों कर जानिए, वाहेदत पूरा इस्क ॥११॥

असल जुदागी अर्स में, सो तो कबूं न होए । वाहेदत इस्क घट बढ़, क्यों कर होवे दोए ॥१२॥

वाहेदत कहिए इनको, तन मन एक इस्क । जुदागी जरा नहीं, वाहेदत का बेसक ॥१३॥

तो बेवरा कबूं न पाइए, बीच अर्स वाहेदत । इस्क बेवरा तो पाइए, जो कछू होए जुदागी इत ॥१४॥

जो इस्क वाहेदत का, ए जो किया मजकूर । ए बेवरा क्यों पाइए, कोई होए न पल एक दूर ॥१५॥

अर्स बका में जुदागी, सुपने कबूं न होए । तो हक इस्क का बेवरा, क्यों पावे मोमिन कोए ॥१६॥

हकें कह्या रूहन को, मैं देखाऊँ इस्क । ए बेवरा इस्क का, तुम पाओगे बेसक ॥१७॥

मैं छिपाऊं तुमको, बैठो कदम पकड़ के । ए तुम इस्कै से पाओगे, आए मिलो मुझसे ॥१८॥

ए इस्क तो पाइए, जो पेहेले मोको जाओ भूल । तुम ले बैठो जुदागी, मैं भेजों तुम पर रसूल ॥१९॥

मैं भेजों किताबत तुमको, सब इत की हकीकत । तुम कहोगे किन खसमें, भेजी किताबत ॥२०॥

सो कहां है हमारा खसम, कैसा खेल कौन हम । रसूल देसी तुमें साहेदियां, पर मानोगे न तुम ॥२१॥

कहां है हमारा वतन, कौन जिमी ए ठौर । क्यों कर हम आए इत, बिना मलकूृत है कोई और ॥२२॥

पढ़ोगे सब साहेदियां, जो मैं लिखोंगा इसारत । सो दिल में ल्याओगे, पर छूटेगी नहीं गफलत ॥२३॥

मैं लिखोंगा रमूजें, और सिखाऊंगा मेरा इलम । तिन इलम से चीन्होगे, पर छूटे न झूठी रसम ॥२४॥

तुम जाए झूठे खेल में, कर बैठोगे जुदे जुदे घर । मैं आए इलम देऊं अर्स का, पर तुम जागो नहीं क्योंए कर ॥२५॥

मैं रूह अपनी भेजोंगा, भेख लेसी तुम माफक । देसी अर्स की निसानियां, पर तुम चीन्ह न सको हक ॥२६॥

हादी मीठे सुकन हक के, कहेगा तुमें रोए रोए । तुम भी सुन सुन रोएसी, पर होस में न आवे कोए ॥२७॥

खेल देखोगे दुख का, याद देसी मैं ए सुख । मैं देऊंगा सब साहेदियां, पर तुम छोड़ न सको दुख ॥२८॥

मैं तुमारे वास्ते, करोंगा कई उपाए । ए बातें सब याद देऊँगा, जो करता हों इप्तदाए ॥२९॥

क्यों ऐसी हम से होएगी, क्या हम जुदे होसी माहें खेल । ऐसी अकल क्यों होएसी, ए कैसी है कदर-लैल ॥३०॥

दूर तो करोगे नहीं, कदम तले बैठे हक । हम फेरें तुमारा फुरमाया, ऐसे लूखे होसी मुतलक ॥३१॥

तुम बिना हम कबहूं, रेहे ना सकें एक दम । क्यों होसीं हम नादान, जो ऐसा करें जुलम ॥३२॥

जैसा साहेब केहेत हो, ऐसी कबूं हमसे न होए । सौ बेर देखो अजमाए के, ऐसी मोमिन करे न कोए ॥३३॥

आप भूलें या हक कदम, या भूलें अर्स घर । ऐसी निपट नादानी, हम करें क्यों कर ॥३४॥

रूहों ऐसी आई दिल में, कोई खेल है खूबतर । खेल देख हक वतन, आप जासी बिसर ॥३५॥

ए जेती हुई रद-बदलें, त्यों त्यों खेल दिल चाहे । फेर फेर मांगे खेल को, कोई ऐसी बनी जो आए ॥३६॥

ना तो जो बात आखिर होएसी, सो रबें आगूं दई बताए । कह्या खेल जुदागी दुख का, तुम मांगत हो चित ल्याए ॥३७॥

हक आप सांचे होने को, सब विध कही सुभान । त्यों त्यों दिल ज्यादा चाहे, वास्ते करने ऊपर एहेसान ॥३८॥

मिनों मिने करें हुसियारियां, हक खेल देखावें जुदागी । एक कहे दूजी को मुख थें, रहिए लपटाए अंग लागी ॥३९॥

क्यों हम जुदे होएसी, एक दूजी को छोड़ें नाहें । क्यों भूलें हम हक को, बैठे खिलवत के माहें ॥४०॥

हक कहे तुम भूलोगे, आप बैठे बका में जित । मुझे भी तुम भूलोगे, ऐसा खेल देखोगे बैठे इत ॥४१॥

ऐसी क्यों होवे हमसे, ऐसे क्यों होवें बेसुध हम । खेल फरेब लाख देखिए, पर क्यों भूलिए इन खसम ॥४२॥

एक दूजी कहे रूहन को, तुम हूजो खबरदार । खेल देखावें फरामोस का, जिन भूलो परवरदिगार ॥४३॥

जो तूं भूले मैं तुझको, देऊंगी तुरत जगाए । मैं भूलों तो तूं मुझे, पल में दीजे बताए ॥४४॥

इन विध एक दूजी सों, मसलहत करी सबन । क्या करसी खेल फरेब का, आपन मोमिन सब एक तन ॥४५॥

सो क्यों भूलें ए सैयां, जो आगूं होवें खबरदार । खेल देखावें चेतन कर, सो भूलें नहीं निरधार ॥४६॥

सो भूलेंगे क्यों कर, इस्क जिनको होए । एक पाव पल जुदागीय का, क्यों कर सेहेवें सोए ॥४७॥

इस्क सबों रूहों पूरन, वाहेदत का मुतलक । क्यों जरा पैठे जुदागी, बीच रूहों हादी हक ॥४८॥

ए बोहोत रब्द बीच अर्स के, रूहों हक सों हुआ मजकूर । अर्स बका के हजूरी, ए क्यों होवें हक सों दूर ॥४९॥

इस्क का अर्स अजीम में, रब्द हुआ बिलंद । तो फरामोसी में इस्क का, बेवरा देखाया खावंद ॥५०॥

आप बैठे दिल देय के, ऊपर बारे हजार । फरामोसी हांसी होएसी, जिनको नहीं सुमार ॥५१॥

हक बैठे खेल देखावने, जिन फरामोसी हाँसी होए । इस्क हक का आवे दिल में, ए फरामोसी हांसी जाने सोए ॥५२॥

तिन वास्ते हकें पैदा किया, दई दूर जुदागी जोर । और नजीक बैठाए सेहेरग से, यों देखाया खेल मरोर ॥५३॥

अर्स बका बीच ब्रह्मांड में, चौदे तबकों में सुध नाहें । किया सेहेरग से नजीक, गिरो बैठी बका माहें ॥५४॥

दिया बीच ब्रह्मांड जुदागी, अजूं इनसे भी दूर दूर । निपट दई ऐसी नजीकी, बैठे अंग सों लाग हजूर ॥५५॥

ऐसा बुजरक खेल देखाया, ऐसा न देख्या कब । ए बातें हाँसी फरामोसी की, करसी इस्क ले अब ॥५६॥

फरामोसी दई जिन वास्ते, हाँसी भी वास्ते इन । इस्क ले ले हँससी, कयामत बखत मोमिन ॥५७॥

ए बातें हुई सब अर्स में, रूहें बड़ी रूह हक साथ । सो ए खेल पैदा हुआ, काहूं हाथ न सूझे हाथ ॥५८॥

कई जातें कई जिनसें, कई फिरके मजहब । भेख भाखा सब जुदियां, हक को ढूंढ़ें सब ॥५९॥

ढूंढ़ ढूंढ़ सब जुदे परे, हक न पाया किन । अव्वल बीच और आखिर लो, किन पाया न बका वतन ॥६०॥

रसमें सबों जुदी लई, माहों-माहें कई लरत । आप बड़े सब कहावहीं, पानी पत्थर आग पूजत ॥६१॥

ए ऐसा खेल अंधेर का, सब कहें हम बुजरक । पर हक सुध काहू में नहीं, छूटी न सुभे सक ॥६२॥

काहूं तरफ न पाई अर्स की, कहावत हैं दीनदार । डूबे सब अपनी स्यानपे, जात हाथ पटक सिर मार ॥६३॥

ऐसे में आए रसूल, हाथ लिए फुरमान । फैलाया नूर आलम में, वास्ते मोमिनों पेहेचान ॥६४॥

आगूं आए खबर दई, आखिर आवेगा साहेब । रूहअल्ला इमाम उमत, होसी नाजी-मजहब ॥६५॥

पुकार करी सबन में, कह्या आवेगा सुभान । हिसाब ले भिस्त देयसी, ठौर हक बका पेहेचान ॥६६॥

ऐसा खेल पैदा हुआ, और सोई आए मोमिन । सोई खेल देखे पीछे, भूल गए आप वतन ॥६७॥

और भूले खसम को, गए खेल में रल । कोई सुध बका की न देवहीं, जो कायम अर्स असल ॥६८॥

बैठे ख्वाब जिमीय में, और दिल पर सैतान पातसाह । नसल आदम हवाई, जो मारे खुदाई राह ॥६९॥

मोमिन आए इन नसल में, जित हक न सुन्या कान । तिन जिमी क्यों पावें मोमिन, कायम अर्स सुभान ॥७०॥

मोमिन आए जुदे जुदे, जुदी जातें जुदी रवेस । जुदे मुलक मजहब जुदे, जुदी बोली जुदे भेस ॥७१॥

चौदे तबक की दुनी को, काहू खबर खुदा की नाहें । ऐसे किए मोहोरे खेल के, ए भी मिल गए तिन माहें ॥७२॥

दुनियां चौदे तबक में, काहू खोली नहीं किताब । साहेब जमाने का खोलसी, एही सिर खिताब ॥७३॥

कुंजी ल्याए रूहअल्ला, दई हाथ इमाम । सो गिरो मोमिनों मिलाए के, करसी सिजदा तमाम ॥७४॥

सो अग्यारै सदी मिने, होसी जाहेर हकीकत । हादी मोमिन जानसी, हक की इसारत ॥७५॥

अव्वल करी बातें अर्स में, वास्ते मोमिनों न्यामत । कुन्जी खिताब सबे ल्याए, सोई फुरमान ल्‍याए इत ॥७६॥

सो मिली जमात रूहन की, जिन वास्ते किया खेल । सो हक भी आए इन बीच में, सो कहे वचन माहें लैल ॥७७॥

लैल गई पुकारते, आया बखत फजर । ए अग्यारै सदी पूरन, तब खुली रूहों नजर ॥७८॥

ए बुजरकी इस्क की, अबलों न जानी किन । और मोहोरे सब खेल के, क्यों जाने बिना मोमिन ॥७९॥

सो फरामोसी मोमिन को, हकें दई बनाए । और हक जगावें ऊपर से, बिना इस्क न उठ्यो जाए ॥८०॥

आप हकें दिल उठाए के, खेल किया फरामोस । एती पुकारें हक की, आवत नाहीं होस ॥८१॥

ए बातें बोहोत बारीक हैं, और हैं बुजरक । ए सुध तब तुमें होएसी, जब आवसी इस्क ॥८२॥

महामत रूहों हक सों हुआ, बहस इस्क वास्ते । सो इस्क बिना क्यों पैठिए, बीच हक अर्स के ॥८३॥

॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥६०५॥

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