खिलवत - प्रकरण १२ | Khilwat prakaran 12
सूरत हक इस्क के मगज का बेसक
हाए हाए क्यों न सुनो रूहें अर्स की, हक बका वतन । रूहअल्ला ने जाहेर किया, काहू सुन्या न एते दिन ॥१॥
फरामोसी हकें दई, सो वास्ते हाँसी के । हाए हाए घाव न लागहीं, सुन के सब्द ए ॥२॥
ए साहेब हाँसी करे, अर्स की अरवाहों सों । हाए हाए विचार न आवहीं, ऐसी सखती हिरदे मों ॥३॥
ए साहेब किने न देखिया, ना किन सुनिया कान । ढूंढ गए त्रैगुन, पर पाया न काहूं निदान ॥४॥
एक पल थें पैदा फना, कोट ब्रह्मांड नूर के । सो नूर नूरजमाल के, मुजरे आवत इत ए ॥५॥
जो किनहूं पाया नहीं, सो जात रोज दरबार । साहेब अर्स-अजीम के, करने उत दीदार ॥६॥
सो साहेब हाँसी करे, अपने मोमिन रूहो सों मिल । सो सुन के घाव न लागहीं, हाए हाए ऐसे बजर दिल ॥७॥
हाँसी करी किन भांत की, फरामोसी दई किन । पर हाए हाए दिल न विचारहीं, कोई ऐसा दिल हुआ कठिन ॥८॥
हक का इस्क हम पें, पूरा पाया मैं । ए खेल देखाया नींद का, फरामोसी के से ॥९॥
इलम भी पूरा दिया, जित जरा न मैं को सक । सुख देखे बेसक अर्स के, तो क्यों न आवे हक इस्क ॥१०॥
सुख में भी सक नहीं, नाहीं अर्स में सक । ना कछू सक इलम में, सक ना खसम हक ॥११॥
सक ना रही कछू खेल में, सक ना आए देखन । सक ना मैं हक की, और सक ना गिरो मोमिन ॥१२॥
सक नाहीं कुदरत में, सक नाहीं कादर । सक नहीं कयामत में, सब अरवाहें उठें ज्यों कर ॥१३॥
सक ना कायम भिस्त में, बेसक ब्रह्मांड हुकम । बेसक तीनों उमत, बेसक घरों पोहोंचावें हम ॥१४॥
बेसक फरामोसीय में, हक बेसक मिले हम साथ । बेसक ताला खोलिया, बेसक कुन्जी हमारे हाथ ॥१५॥
बेसक खेल देखाइया, खोली बेसक कतेब वेद । बेसक हमों ने पाइया, बेसक हक दिल भेद ॥१६॥
बेसक दोऊ अर्सों की, जरे जरे की बेसक । बेसक मेहेर मोमिनों पर, बेसक करी जो हक ॥१७॥
जो पैदा चौदे तबक में, जो कोई हुए बुजरक । अपने मुख किने ना कह्या, जो हम हुए बेसक ॥१८॥
सो बेसक मैं जानिया, ए बात तेहेकीक बेसक । मोमिन बेसक समझियो, बेसक बोले मैं हक ॥१९॥
केतेक मोमिन हो बेसक, जो बेसक करो विचार । तो बेसक सुख अर्स का, इन तन बेसक ल्यो करार ॥२०॥
दुनियां चौदे तबक में, कोई बेसक हुआ न कित । सो सब थें सक मिट गई, ऐसी बेसकी आई इत ॥२१॥
किस वास्ते हाँसी करी, किस वास्ते हुए फरामोस । हाए हाए दिल ना विचारहीं, हाए हाए आवत नाहीं माहें होस ॥२२॥
ए कदम दिल कछू आवहीं, जब करे विचार दिल ए । हाए हाए ए समया क्यों ना रह्या, इन हाँसी फरामोसी के ॥२३॥
हाए हाए दिल में न आवहीं, किस वास्ते हाँसी भई । ए कारन कौन फरामोस को, ए दिल खोल किने न कही ॥२४॥
समया न रह्या किन वास्ते, होए पेहेचान न वास्ते किन । इस्क हक के दिल का, हाए हाए पाए नहीं लछन ॥२५॥
आप फरामोसी देय के, ऊपर से जगावत । तरंग हक इस्क के, हाए हाए दिल में न आवत ॥२६॥
खेल किया किस वास्ते, किस वास्ते देखाया दुख । मेहेर प्रीत हक के दिल की, हाए हाए देखें ना इस्क के सुख ॥२७॥
किस वास्ते हलके जगावत, ऊपर करत बोहोतक सोर । हाए हाए ए सुध कोई ना ले सके, हक के इस्क का जोर ॥२८॥
किस वास्ते दुनी ना समझी, किस वास्ते भेज्या फुरमान । ए बातें हक के इस्क की, हाए हाए करी न काहूं पेहेचान ॥२९॥
कुंजी ल्याए किस वास्ते, किस वास्ते दई दूजे को । मेहेर अल्ला के कलाम, हाए हाए आए ना काहूं दिल मों ॥३०॥
किस वास्ते खिताब खुदाए का, एक सोई खोले कलाम । हाए हाए ए सुध मोमिनो ना लई, मीठा हक इस्क का आराम ॥३१॥
ए द्वार किने ना खोलिया, ए जो कुरान किताब । पाई ना हकीकत किनहूं, हाए हाए एकै ठौर खिताब ॥३२॥
साहेदी देवे जो खुदाए की, सोई खुदा जान । सो साहेदी किन ना लई, हाए हाए मगज न पाया कुरान ॥३३॥
लिखी इसारतें रमूजें, हकें किन ऊपर । ए बातें मोमिनों मिनें, हाए हाए छिपी रही क्यों कर ॥३४॥
तरंग हक के इस्क के, पाए ना गिरो में किन । अजूं माएने मगज, हाए हाए पाए नहीं मोमिन ॥३५॥
हक के दिल का इस्क, निपट बड़ी है बात । अजूं जाहेर रूहों ना हुई, अर्स सूरत हक जात ॥३६॥
हाँसी करी किन वास्ते, फरामोसी की दे । हाए हाए मोमिन ना समझे, बात इस्क की ए ॥३७॥
लिख्या ऐसा कुरान में, कुँआरी रही फुरकान । ए दाग गिरो तब देखसी, हाए हाए होसी जब पेहेचान ॥३८॥
ए भी वास्ते इस्क के, फुरमाया यों कर । तो कही कुँआरी फुरकान, हाए हाए गिरो न लई दिल धर ॥३९॥
उतरे नूर बिलंद से, मोमिन बड़ा मरातब । हक के दिल का इस्क, हाए हाए मोमिन लेसी कब ॥४०॥
ऐसा नूर-जमाल जो, रूहें रहें इन दरगाह । ए किस्सा सुनते विचारते, हाए हाए उड़त नहीं अरवाह ॥४१॥
हक सूरत के दिल का, मोमिनों से सनेह । हेत प्रीत इस्क की, हाए हाए आई नहीं काहूं एह ॥४२॥
इस्क खेल हाँसी इस्क, इस्क फरामोस मोमिन । इस्कें रसूल होए आइया, वास्ते इस्क न पाया किन ॥४३॥
इस्कें फुरमान आइया, वास्ते इस्क न खुल्या किन । वास्ते इस्क के गैब हुआ, इस्कें खुले ना खुदा बिन ॥४४॥
इस्कें कुंजी ल्याइया, इस्कें ल्याया खिताब । इस्कें आए मोमिन, इस्कें खुले ना सिताब ॥४५॥
कई बानी इस्कें उपजी, कई इस्कें पड़ी पुकार । ए रूहें भी वास्ते इस्क के, हाए हाए हुइयां न खबरदार ॥४६॥
हाए हाए इस्क हक का, समझे नहीं मोमिन । ना तो अरवाहें थी अर्स की, पर हुआ न दिल रोसन ॥४७॥
सो भी वास्ते इस्क के, जो लगत नाहीं घाए । सो भी वास्ते इस्क के, जो उड़त नहीं अरवाहे ॥४८॥
इस्कें ऊपर पुकारहीं, आवत नाहीं होस । सो भी वास्ते इस्क के, जो टलत नहीं फरामोस ॥४९॥
सो भी वास्ते इस्क के, जो लगत न कलाम सुभान । सो भी वास्ते इस्क के, जो होत नहीं पेहेचान ॥५०॥
सो भी वास्ते इस्क के, जो पेहेचान आवत नाहें । सो भी वास्ते इस्क के, जो पेहेचानत दिल माहें ॥५१॥
ए करत है सब इस्क, जो खेल में कोई जीतत । सो भी करत इस्क, जो कोई काहूं भूलत ॥५२॥
ए बारीक बातें इस्क की, ए कोई समझत नाहें । सो भी करत है इस्क, जानत बल जुबांए ॥५३॥
सो भी करत है इस्क, जुदी जुदी जिनस । काहू सुध थोड़ी काहू घनी, काहू इस्क न देत हरगिस ॥५४॥
इस्क सेती हारिए, जितावे इस्क । इस्कें इस्क न आवहीं, इस्क करे बेसक ॥५५॥
ए बारीक बातें हक की, क्यों कर जानी जाए । इस्क हक के दिल का, बिना हुकमें क्यों समझाए ॥५६॥
ए हक देखावें इस्क, तो बेर न पल एक होए । सौ साल सोहोबत कीजिए, बिना हुकम न समझे कोए ॥५७॥
ए बातें हक के दिल की, निपट बारीक हैं सोए । बिना इस्क दिए हक के, क्यों कर समझे कोए ॥५८॥
इस्क हक के दिल का, क्यों आवे माहें बूझ । हक देवें तो इस्क आवहीं, ए हक के इस्क का गुझ ॥५९॥
ए हक का बातून इस्क, तिन इस्क का बारीक बातन । बिना पाए इस्क हक के, इस्क न आवे किन ॥६०॥
ए खेल फरामोसीय का, इस्कें किया जो अब । तुम कायम दायम इस्क में, पर ऐसा इस्क न कब ॥६१॥
ए हमेसा रूहन में, रहे भीगे बीच इस्क । पर इस्क ए फरामोसीय का, जो हक के दिल माफक ॥६२॥
बीच कायम ठौर बिछोहा नहीं, जो जुदी होवे गिरो दम । खेल इस्क जुदागीय का, क्यों देखें अर्स में हम ॥६३॥
लेने लज्जत इस्क वास्ते, दई फरामोसी खेल हुकम । जो रूह लेवे बीच दिल के, तो देखे इस्क खसम ॥६४॥
आप आगूं रूहें बैठाए के, दिल से उपजाई हक । सुख देने देखाइया, अपने दिल का इस्क ॥६५॥
आप दे फरामोसी, और जगावें भी आप । देखाई जुदाई फरामोस में, देने इस्क मिलाप ॥६६॥
न मांग्या न दिल उपज्या, दिल हकें उठाया एह । तो मांग्या खेल जुदागीय का, देने अपना इस्क सनेह ॥६७॥
इस्क तरंग उपजत है, दूर जाए मिलिए आए । वास्ते इस्क हक के दिल का, खेल फरामोसी देखाए ॥६८॥
इस्क बिछुरे से जानिए, आए दूर थें मिलिए जब । ए दोऊ बातें अर्स में ना थीं, इस्क चिन्हार देखाई अब ॥६९॥
जो हक का इस्क विचारिए, तो बड़ा दिल देत लज्जत । ए बुजरक मेहेरबानगी, हकें ऐसी दई न्यामत ॥७०॥
जैसा साहेब बुजरक, तैसा बुजरक इस्क । जो दिल देय के देखिए, तो सुख आवे हक माफक ॥७१॥
जैसा मेहेबूब बुजरक, तैसा हादी हक का तन । रूहें तन हादी माफक, इनों माफक बका वतन ॥७२॥
ऐसा साहेब इस्क, करत निसबत जान । हाए हाए भूली अरवाहें असल, परत नहीं पेहेचान ॥७३॥
भूले हक और आप को, और भूले बका घर । हक हँससी इसी बात को, रूहें भूली क्यों कर ॥७४॥
औलिया लिल्ला दोस्त, हकसों रखें निसबत । फरामोसी दई हाँसीय को, कछू चल्या न हकसों इत ॥७५॥
कैसे थे इन खेल में, किन माफक थे तुम । किन से ए निसबत भई, कैसा बका पाया खसम ॥७६॥
कहां थे फना के खेल में, कैसा था अर्स घर दूर । किन बुजरकों न पाइया, सो क्यों कर लिए तुमें हजूर ॥७७॥
कैसा अर्स देखाइया, क्यों लिए खिलवत माहें । ए जो अरवाहें अर्स की, क्यों अजूं विचारत नाहें ॥७८॥
किन सूरत न पाई हक की, न पाया अर्स बका ठौर । सब कहें हमों न पाइया, कर कर थके दौर ॥७९॥
धनी मलकूत के कई गए, पर पाया न नूर-मकान । खोज खोज के कई थके, पर देख्या नहीं निदान ॥८०॥
ऐसा साहेब बुजरक, जो हमेसा कायम । सो तले झांकत नूरजमाल के, आवे दीदारें दायम ॥८१॥
कैसा हाल है तुमारा, हो कैसे वतन में तुम । कौन बड़ाई तुमारी, हाए हाए आवे न याद खसम ॥८२॥
कैसा घर बुजरक बका, कैसी खसम साहेबी । किन चाह्या तुमारा दीदार, कैसी तिनकी है बुजरकी ॥८३॥
कैसी जिमी थी कुफर की, और कैसी थी अकल । किन झूठे कबीले में थे, कैसे तुमारे अमल ॥८४॥
अब कैसा सहूर है तुम पे, पाई कौन सोहोबत । किन कबीले में थे, अब कैसी राखत हो निसबत ॥८५॥
कैसी पाई सराफी, कैसी आई तुमें पेहेचान । हक बका चीन्हया कौन जिमिएं, पाया कैसा इस्क ईमान ॥८६॥
जागत हो के नींद में, विचारत हो के फरामोस । सीधी बात जाग करत हो, तुम हो होस में के बेहोस ॥८७॥
विचार नींद में तो ना होए, जागे नींद रहे क्यों कर । विचार देखो तो अचरज, देखो फरामोसी हाँसी दिल धर ॥८८॥
आड़ा ब्रह्मांड देय के, ऐसी जुदागी कर । करत गुफ्तगोए हजूर, खेल ऐसा किया जोरावर ॥८९॥
ना तो बैठे हो कदम तले, पर लागत ऐसे दूर । हक आप इस्क देखावने, करत आपनसों मजकूर ॥९०॥
हक का इस्क बढ़या, इस्क अपना जरा नाहें । जब दई इत बेसकी, तो इस्क क्यों न आवे दिल माहें ॥९१॥
तुम कहोगे हम बेसुध हुए, दिल में रही ना खबर । ना कछू रही सो अकल, तो इस्क आवे क्यों कर ॥९२॥
ना सुध आप ना खसम, ना सुध घर गुफ्तगोए । ज्यों जीवत मुरदे भए, रूहें क्यों कर बल होए ॥९३॥
आप भूले बेसक, बेसक भूले खसम । बेसक भूले बुध वतन, पर हकें बेसक दिया इलम ॥९४॥
मुए भी इत बेसक, और जिए भी बेसक । सहूर भी बेसक दिया, दिया इलम बेसक हक ॥९५॥
तब सुध पाई सब बेसक, हुए बेसक खबरदार । हकें ऐसी दई बेसकी, हुए बेसक बेसुमार ॥९६॥
इनहीं बात की हाँसी है, उड़त ना फरामोस । ना तो जब बेसक हुए, हाए हाए क्यों न आवत होस ॥९७॥
ऐही हाँसी इसही बात की, फरामोसी में जाग्रत। जागे में भी सक नहीं, कोई ऐसी इस्कें करी जो इत ॥९८॥
बैठाए बेसक अर्स में, और जगाए बेसक । हाँसी भी बेसक हुई, जो आया नहीं इस्क ॥९९॥
कहे महामत तुम पर मोमिनों, दम दम जो बरतत । सो सब इस्क हक का, पल पल मेहेर करत ॥१००॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥७०५॥
