खिलवत - प्रकरण १३ | Khilwat prakaran 13
बुलाए ल्याओ तुम रूहअल्ला
ल्याओ बुलाए तुम रूहअल्ला, जो रूहें मेरी आसिक । रब्द किया प्यार वास्ते, कहियो केहेलाया हक ॥१॥
रूहअल्ला सों बका मिने, हकें करी मजकूर । उतरी अरवाहें अर्स से, बुलाए ल्याओ हजूर ॥२॥
हक बका का बातून, जो किया रूहों सों गुझ । केहेलाइयां बातें छिपियां, खिलवत करके मुझ ॥३॥
मैं वास्ता कहूं तुमको, उतरियां कारन इन । इनों रब्द किया इस्क का, आगूं मेरे बीच वतन ॥४॥
करी रूहों मसलहत मिलके, कहे हमको प्यारे हक । और बड़ी रूह प्यारी हमको, ए बात जानो मुतलक ॥५॥
बड़ी रूह कहे प्यारे मुझे, मेरा साहेब बुजरक । और प्यारी रूहें मेरे तन हैं, ए जानो तुम बेसक ॥६॥
तुम रूहें नूर मेरे तन का, इन विध केहेवे हक । बोहोत प्यारी बड़ी रूह मुझे, मैं तुमारा आसिक ॥७॥
प्यार हक का ज्यादा हमसों, ए उपजी रूहों दिल सक । इस्क हमारा हक सों, क्या नहीं हक माफक ॥८॥
और भी ए रूहों कह्या, हक प्यारे हैं हमको । और प्यारी बड़ी रूह, जरा सक नहीं इनमों ॥९॥
तब ए बात सुन हकें कह्या, मैं प्यारा हों तुमको । पर मैं आसिक अरवाहों का, सो कोई जानत नहीं तुममों ॥१०॥
तुम ज्यादा प्यार कह्या अपना, हादी कहे मेरा अधिक । मैं कह्या प्यार मेरा ज्यादा, तब तुमें उपजी सक ॥११॥
तुम रूहें मेरे नूर तन, सो वाहेदत के बीच एक । इस्क बेवरा बका मिने, क्यों पाइए ए विवेक ॥१२॥
तुम बड़ा इस्क कह्या अपना, मेरा न आया नजर । खेल देखाया तिन वास्ते, अब देखो सहूर कर ॥१३॥
ए बेवरा बीच बका मिने, इस्क का न होए । दई जुदागी तिन वास्ते, बात करी बका में सोए ॥१४॥
छिपाइयां अपनी मेहेर में, देखाया और आलम । देखो कौन आवे दौड़ अर्स में, लेय के इस्क खसम ॥१५॥
रूहों ऐसा खेल देखाऊं मैं, जित झूठे झूठ पूजत । ढूंढें अव्वल आखिर लग, तो हक न कहूं पाइयत ॥१६॥
आए फंसे तिन फरेब में, पानी पत्थर आग पुजात । अर्स साहेब कायम की, कहूं सुपने न पाइए बात ॥१७॥
आइयां तिन आलम में, जित हक को न जानत कोए । पूजें खाहिस हवाए को, जो कोई इनमें बुजरक होए ॥१८॥
झूठे मोहोरे जो खेल के, मिल गैयां माहें तिन । कबीला कर बैठियां, कहे एह हमारा वतन ॥१९॥
समझाईयां समझें नहीं, मानें नहीं फुरमान । कहें कौन तुम कौन हम, अपने कैसी पेहेचान ॥२०॥
ए सोई हमारा साहेब, जो बड़को दिया बताए । ए पत्थर पानी आग है, पर हमसों छोड़या न जाए ॥२१॥
बड़के हमारे कदीम के, पूजत आए ए । सो क्यों छूटे हमसे, रब बाप दादों का जे ॥२२॥
रब रसूल बतावे गैब का, हम पूजें जाहेर । हम बातून को पोहोंचे नहीं, देखें नजर बाहेर ॥२३॥
केतिक करें लड़ाइयां, सामी देवें फरेब । कौन रसूल कौन रूहअल्ला, कौन वेद कौन कतेब ॥२४॥
इन हाल जो दुनियां, ए गईयां तिन में मिल । मोहे इस्क बिना पावें नहीं, रूहों ऐसी भई मुस्किल ॥२५॥
कठिन हाल है रूहों का, पर तुम विरचो जिन । भूल गईयां उनें सुध नहीं, हाँसी एही मोमिन ॥२६॥
बड़ी हाँसी इत होएसी, जब सब होसी रोसन । खेल खुसाली इत होएसी, इस्क बेवरे इन ॥२७॥
एक रोसी एक हँससी, होसी खूबी बड़ी खुसाल । बिना इस्क बीच अर्स के, कोई देखे न नूरजमाल ॥२८॥
रोसी इनहीं हाल में, वास्ते हाँसी के । मुदा सब हाँसीय का, फरामोसी का जे ॥२९॥
रूहअल्ला एता कहियो, तुम मांग्या सो फरामोस । जब इस्क ज्यादा आवसी, तब आवसी माहें होस ॥३०॥
मैं छिपा हों इनसे, रूहें नजर में ले । वह देखत झूठा आलम, मोको देखत नाहीं ए ॥३१॥
जब इस्क इनों आवसी, तब देखेंगे मुझको । इस्क बिना इन अर्स में, मैं मिलों नहीं इनसों ॥३२॥
रब्द रूहों ने हकसों, किया इस्क का जोए। तो अर्स में इस्क बिना, पैठ न सके कोए ॥३३॥
इनों रब्द किया इस्क का, हम जैसा हक का नाहें । दई फरामोसी इन वास्ते, देखों कैसा इस्क इनों माहें ॥३४॥
ऐसी देखाई दुनियां, जित कोई हक को जानत नाहें । काहूँ तरफ न पाइए अर्स की, बैठे बका बैत के माहें ॥३५॥
पार ना अर्स जिमीय का, बैठियां कदम तले इत । ऐसा पट आड़ा किया, जानूं कहूं गईयां हैं कित ॥३६॥
जब याद तुमें मैं आऊंगा, तबहीं बैठोगे जाग । गए आए कहूं नहीं, सब रूहें बैठीं अंग लाग ॥३७॥
मैं लाड़ किया रूहन सों, वास्ते इस्क इन । क्यों ना लें मेरा इस्क, अंग असलू मेरे तन ॥३८॥
बोहोत लाड़ किए मुझसों, इनों अर्स में मिल । एक लाड़ किया मैं इनों से, प्यार देखन सब दिल ॥३९॥
मैं फुरमान भेज्या है अव्वल, हाथ अमीन रसूल । इमाम भेज्या रूहों वास्ते, जिन जावें ए भूल ॥४०॥
याद दीजो अरवाहों को, जो मैं करी खिलवत । सो ए लिखी फुरमान में, रमूजें इसारत ॥४१॥
अव्वल बातें जो अर्स की, जाए कहियो तुम । फुरमान पेहेले भेजिया, लिखी हकीकत हम ॥४२॥
बातें बका में जो हुई, जब उनों होसी रोसन । तब तुरत ईमान ल्यावसी, जो मेरे हैं मोमिन ॥४३॥
इलम मेरा उनों में, जाए करो जाहेर । मैं सेहेरग से नजीक, नहीं बका थें बाहेर ॥४४॥
तुम बैठे मेरे कदम तले, कहूं गईयां नाहीं दूर । ए याद करो इन इस्क को, जो आपन करी मजकूर ॥४५॥
इत जो करी मजकूर, अजूं सोई है साइत । चार घड़ी दिन पीछला, तुम जानो हुई मुद्दत ॥४६॥
जों रब्द किया इत बैठ के, अजूं बैठे हो ठौर इन । रात दिन ना पल घड़ी, सोई बात सोई खिन ॥४७॥
याही अजमाइस वास्ते, खेल देखाया ए । जब इलम मेरे बेसक हुई, तब दौड़सी इस्क ले ॥४८॥
नाम मेरा सुनते, और सुनत अपना वतन । सुनत मिलावा रूहों का, याद आवे असल तन ॥४९॥
सक मिटी जिनों हक की, और मिटी हादी की सक । बेसक हुइयां आप वतन, ताए क्यों न आवे इस्क ॥५०॥
सांच झूठ में मिल गईयां, तुरत होसी तफावत । करसी पल में बेसक, ऐसा इलम मेरी न्यामत ॥५१॥
अजमावने अरवाहों को, हकें दिया वास्ते इन । अव्वल फरामोसी देय के, इलमें खोले दीदे बातन ॥५२॥
बातून खुले ऐसा हुआ, सेहेरग से नजीक हक । तुम बैठे बीच अर्स के, कदम तले बेसक ॥५३॥
चौदे तबकों न पाइए, हक बका ठौर तरफ । सो कदम तले बैठावत, ऐसा इलम का सरफ ॥५४॥
इलम हक के बेसकी, बेसक आवे सहूर । बेसक पेहेचान हक की, बरस्या बेसक बका नूर ॥५५॥
बेसक असल सुख की, आवे बेसक रूहों इलम । जरे जरे की बेसकी, जो बीच नजर खसम ॥५६॥
बेसक देखी फरामोसी, बेसक गिरो मोमिन । बेसक फुरमान रमूजें, पाई बेसक बका वतन ॥५७॥
बेसक ठौर कादर, पाई बेसक कुदरत । बेसक खेल जो मांगया, बेसक बातें उमत ॥५८॥
बेसक हकें देखाइया, बेसक करी मजकूर । बेसक रद-बदल करी, हुआ बेसक इलम जहूर ॥५९॥
बेसक जगाई फरामोस में, बेसक दे इलम । होसी रूहों बका की बेसक, ले बेसक इलम खसम ॥६०॥
भुलाइयां खेल में बेसक, हुआ बेसक बेवरा ए । क्यों ना लें इस्क बेसक, कहाए बेसक संदेसे ॥६१॥
रूहों को हकें बेसक, भेज्या पैगाम बेसक । इस्क बेसक ले आइयो, भेजी बेसक रूह बुजरक ॥६२॥
इस्क रूहों कम बेसक, हादी ज्यादा इस्क बेसक । सब थें इस्क बढ़या, बेसक इस्क जो हक ॥६३॥
महामत कहे बेसक मोमिनों, बेसक बेवरा कमाल । फरामोसी में हक का, पाइए बेसक इस्क हाल ॥६४॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥७६९॥
