खिलवत - प्रकरण १४ | Khilwat prakaran 14
सूरत अर्स अजीम की बातूनी रोसनी
रूहअल्ला सुभाने भेजिया, रूहें अर्स अपनी जान । पिउ प्यारे भेजी रूह अपनी, तुम क्यों ना करो पेहेचान ॥१॥
अरवाहें जो अर्स की, सो उरझियां माहें फरेब । सो सुरझाइयां पट खोल के, केहे हकीकत वेद कतेब ॥२॥
मजकूर बका बीच में, किया हक हादी रूहन । दई फरामोसी हाँसीय को, बीच अपने अर्स मोमिन ॥३॥
ऐसी तुमें देखाऊं दुनियां, और पनाह में राखों छिपाए । ओ तुमें ना चीन्ह हीं, ना तुमें ओ चिन्हाए ॥४॥
मैं छिपोंगा तुमसों, तुमें नजर में ले । पाओ ना अर्स या मुझे, काहूं तरफ न पाओ ए ॥५॥
ढूंढ़ोगे तुम मुझको, बोहोतक सहूर कर । मेरा ठौर न पाओ या मुझे, क्योंए ना खुले नजर ॥६॥
आंखां होसी खुलियां, मेरी बातां करो माहों-माहें । ढूंढ़ोगे माहें बाहेर, और पावे ना कोई क्याहें ॥७॥
क्या कहूं भेजोगे हमको, के इतथें करोगे दूर । के इतहीं बैठे देखाओगे, हमको अपने हजूर ॥८॥
इतहीं बैठे देखोगे, खेल हांसी का फरामोस । सहूर करोगे बोहोतक, पर आए न सको माहें होस ॥९॥
ज्यों जाने बेसुध हुए, जैसे अमल चढ़या जोर । सो तुम क्यों ए ना सुनोगे, हादी करे बोहोतक सोर ॥१०॥
ना तुमें अमल ना नींद कछू, पर ऐसा खेल हाँसी का ए । खेलें हँसें बातें करें, याद आवे ना हक घर जे ॥११॥
ऐसा इलम हादीय पे, देखावे हक वतन । आप पाओ पल में जगावहीं, इन इलम आधे सुकन ॥१२॥
जो हुए होवें मुरदे, तिनको देत उठाए । इन विध इलम लदुन्नी, पर तुमें न सके जगाए ॥१३॥
ऐसी देखोगे दुनियां, हक न काहूं खबर । ना सुध अर्स न आपकी, कई ढूंढ़त सहूर कर ॥१४॥
ना सुध मेरी ना वतन की, आपुस में जाओगे भूल । ना सुध मेरे कागद की, ना सुध मेरे रसूल ॥१५॥
लिखी इसारतें रमूजें, निसान हकीकत । सुध कछू तुमें न परे, भूलोगे मेरी न्यामत ॥१६॥
ऐसा फुरमान भेजसी, और याद देसी रसूल । जिन अंग इस्क तिनका, क्यों होसी ऐसा सूल ॥१७॥
भूलोगे तेहेकीक तुम, मेरी पाओ ना तुम खबर । ए खेल देखे ऐसा होएसी, ना सुध आप ना घर ॥१८॥
एक दूजी आपुस में, रहे ना रूह चिन्हार । ना चीन्हो बड़ी रूह को, ना कछू परवरदिगार ॥१९॥
रूहें कहें हाँसी होसी अति बड़ी, तुम हूजो सबे हुसियार । क्यों ए न भूलें आपन, जो खेल जोर करे अपार ॥२०॥
आपन सामी हाँसी करें हकसों, चले ना खेल को बल । आपन आगूं चेतन हुइयाँ, रहिए एक दूजी हिल मिल ॥२१॥
जब आगूं से खबर करी, क्या करे फरेब असत । इस्क हमारा कहां जाएसी, क्या करसी नहीं मदत ॥२२॥
इस्क का बल भान के, क्या फरेब होसी जोर । निसबत अपनी हकसों, क्यों देसी मरोर ॥२३॥
दूर तो कहूं जाए नहीं, बैठे पकड़ हक चरन । तो फरामोसी बल क्या करे, आपन आगूं हुइयां चेतन ॥२४॥
कहें रूहें एक दूजी को, नजीक बैठो आए । जिन कोई जुदी परे, रहिए अंग लपटाए ॥२५॥
हाथों-हाथ न छोड़िए, लग रहिए अंगो अंग । इन विध एक दिल राखिए, कोई छोड़े ना काहू को संग ॥२६॥
हम हमेसा एक दिल, जुदियां होवें क्यों कर । हक खेल देखावहीं, कर आगे से खबर ॥२७॥
अंग जुदे ना हो सकें, तो क्यों होए जुदे दिल । एक जरा जुदे ना होए सकें, अंग यों रहें हिल मिल ॥२८॥
रूहें कहें एक दूजी को, जिन अंग जुदा करो कोए । इन विध रहो लपटाए के, सब एक वजूद ज्यों होए ॥२९॥
रूहें रब्द कर बैठियां, जानें सामी हाँसी करें हकसों । पर हकें हाँसी ऐसी करी, सुध जरा न रही किनमों ॥३०॥
एक वजूद होए बैठियां, खेलें ऐसी दई भुलाए । कौल फैल हाल सब जुदे, दिल ऐसे दिए फिराए ॥३१॥
जात भांत जिनसें जुदी, जुदी जुदी जिमी पैदाए । सब बैठियां अंग लगाए के, खेलें कहूं दिए उलटाए ॥३२॥
जुदे जुदे कबीलों, कर बैठियां अपना घर । जानें हम इत कदीम के, जुदे होवें क्यों कर ॥३३॥
सो भी कबीले स्वारथी, दुख आए न कोई अपना । जात वजूद भी रंग बदले, ज्यों फना होत सुपना ॥३४॥
रूहें सुध ना एक दूजी की, ना मिनों मिनें पेहेचान । याद बिना जात मुद्दत, काहूं सुपने न आवें सुभान ॥३५॥
खेल तो है एक खिन का, रूहें जानें हुई मुद्दत । कई कुरसी हुई कई होएसी, गईयां भूल मूल सोहोबत ॥३६॥
आइयां झूठे कबीले में, भूल गईयां बका वतन । सुख अर्स अजीम के, हाए हाए फरेब दिया दुनी इन ॥३७॥
तिन कबीले में रेहेना, पूजें पानी आग पत्थर । बेसहूर इन भांत के, जान बूझ जलें काफर ॥३८॥
बड़के फना हो गए, और हाल होत फना । आखिर फना सब पीछले, जाए गिनते रात दिना ॥३९॥
कहें हमको इन वतन में, मौत आवेगी अब । नफा नुकसानी हो चुकी, फेर जनम लेवें कब ॥४०॥
ऐसा मौत अपना जान के, लेत हैं नुकसान । जाग के नफा न लेवहीं, सुन ऐसा हक फुरमान ॥४१॥
उमर खोवें नुकसान में, पर करें नाहीं सहूर । याद न करें तिनको, जिनका एता बड़ा जहूर ॥४२॥
कहें हिन्दू पीछे मौत के, हम जनम लेसी फेर । जो अब हम भूलेंगे, तो नफा लेसी और बेर ॥४३॥
खेल ऐसा फरेब का, सब हवा को पूजत । सुध दोऊ को ना परी, कायम बका सुख कित ॥४४॥
ए तेहेकीक किने ना किया, कहावें सब बुजरक । जेती बात ल्यावें इलम की, तिन सबों में सक ॥४५॥
ए दुनियां इन विध की, ताए एती सुध सबन । हम सब बीच फना मिने, ठौर बका न पाया किन ॥४६॥
एता न जाने दुनियां, कहां से आए कौन हम । आए कौन फरेब में, ए हुआ किन के हुकम ॥४७॥
सब कोई कहे हुकमें हुआ, जिन हुकम किया सो कित । सो किनहूं ना पाइया, ताए खलक गई खोजत ॥४८॥
अवतार तीर्थंकर बड़े हुए, बड़े कहावें पैगंमर । पट बका किन खोल्या नहीं, सबों कहया खुले आखिर ॥४९॥
सब पूजें खाहिस अपनी, याही फना की वस्त । मिट्टी आग पानी पत्थर, करें याही की सिफत ॥५०॥
झूठे झूठा राचहीं, दिल सांच न पावत । ए सांच क्यों कर पावहीं, पेहेले दिल में न आवत ॥५१॥
नासूत और मलकूत लग, इनकी याही बीच नजर । देख किताबें यों कहें, हम पाई नहीं खबर ॥५२॥
इन बिध बोलें किताबें, देखो दिल के दीदों माहें । कानों सुन्या सो कछुए नहीं, ए देख्या सो भी नाहें ॥५३॥
जान बूझ पूजें फना को, कहें एही हमारा खुदाए । हम छोड़ें ना कदीम का, जो बड़कों पूज्या इप्तदाए ॥५४॥
इस्क लगावें तिन सों, जो दुख रूपी दिन रात । कायम सुख अर्स का, कहूँ सुपने न पाइए बात ॥५५॥
ऐसी देखाई दुनियां, जानें सांच है हमेसगी । सांचो विचार जब कर दिया, तब झूठों भी झूठ लगी ॥५६॥
हुई रात अंधेरी फरेब की, फिरत चिरागें दोए । आप अर्स हक की, इन से खबर न होए ॥५७॥
दुनियां इन चिराग को, रोसन कर बूझत । आप वतन हक बका की, इनसे कछू ना सूझत ॥५८॥
ढूंढ़ थके अर्स को, चौदे तबक न पाया किन । रात फना को छोड़ के, किन देख्या न सूर रोसन ॥५९॥
चौदे तबक जुलमत से, पेहेले कही जो रात । दिन कायम सूर अर्स की, इत काहूं न पाइए बात ॥६०॥
सूर ऊग्या तब जानिए, ए रोसन हुआ अर्स हक । दुनियां सब के अंग में, काहूं जरा न रही सक ॥६१॥
अर्स बका जाहेर हुआ, तब हुई फजर । अर्स देखाया इलमें, खुली बातून सबों नजर ॥६२॥
हकीकत कुरान में, ए लिखी नीके कर । सबको करसी कायम, जाहेर हुए कायम खबर ॥६३॥
जो होसी रूहें अर्स की, तिन आवे ईमान अव्वल । आखिर तो सब ल्यावसी, दोजख की आग जल ॥६४॥
सो ताला इन मुसाफ का, क्यों खुले ईमान बिन । खोले ताला फरेब क्यों रहे, जब उग्या बका अर्स दिन ॥६५॥
जोलों ताला खुले नहीं, द्वार अथरवन कतेब । पाई ना तरफ हक बका, ना कछू खेल फरेब ॥६६॥
ए हकीकत जिनकी, अपनी खोले सोए । सो खोले हक जाहेर हुआ, तब क्यों कर रेहेवे दोए ॥६७॥
फरेब कछुए ना रह्या, रोसन उमत करी जब । हक अर्स जाहेर हुआ, तब कायम दुनी हुई सब ॥६८॥
लिख्या दिन बका मुसाफ में, खोले बातून होसी फजर । लिए हकीकत हैयाती, बका सुख पावें आखिर ॥६९॥
कुन्जी भेजी हाथ रूहअल्ला, पर खोल न सके ए । फुरमान खुले आखिर, हाथ सूरत हकी जे ॥७०॥
सहूर दिया साहेब ने, फुरमान भेज्या हाथ रसूल । पावे न हकीकत मुसाफ की, ए खोलिए किन सूल ॥७१॥
रसूल कहे फुरमान में, मेरी तीनों एक सूरत । सो पोहोंची नजीक हक के, और कोई न पोहोंच्या तित ॥७२॥
बसरी मलकी और हकी, माहें फैल तीनों के । सो खोले फुरमान को, आखिर सूरत हकी जे ॥७३॥
और चाहे कोई खोलने, क्योंकर खोले सोए । सो कौल खोले हक हुकमें, फैल हाल जिनों के होए ॥७४॥
हुआ दीदार सब मेयराज में, जो हरफ कहे हकें मुझ । जो छिपे रखे मैं हुकमें, सो कौन जाहेर करे मेरा गुझ ॥७५॥
जो हुकम हुआ जाहेर का, सो जाहेर किए मैं तब । बाकी रखे जो हुकमें, सो हुकमें जाहेर करों अब ॥७६॥
ए बातें सब मेयराज की, रखें जाहेर तीन सूरत । और कोई न केहे सके, ए अर्स हक न्यामत ॥७७॥
और तीनों सूरत, रूहें फरिस्ते उमत । जो आखिर इनों में गुजरी, मुसाफ में सोई हकीकत ॥७८॥
सो खोले आपे अपनी, हकीकत फुरमान । खोले परदे नूर पार के, हुई अर्स पेहेचान ॥७९॥
सक जरा किन ना रही, जब खोले ताले ए । हुआ सूर बका अर्स जाहेर, लिख्या मुसाफ में जे ॥८०॥
ए इलम आए पीछे, नींद आवत क्यों कर । जब सक जरा ना रही, रूहों क्यों न आवे याद घर ॥८१॥
याद करो बीच अर्स के, जो हक सों किया मजकूर । मांग्या खेल फरामोस का, बैठ के हक हजूर ॥८२॥
तुम बका सुख छोड़ के, खेल मांग्या हाँसी को । सो देखो हकीकत अपनी, हकें भेजी फुरमान मों ॥८३॥
खेल देखाया तुमको, वास्ते तफावत । इत याद देत सुख पावने, हक बका निसबत ॥८४॥
इन झूठी जिमी में बैठाए के, देखाई हक बका निसबत । मेहेर करी रूहों पर, देने अर्स लज्जत ॥८५॥
इन ख्वाब जिमी में बैठे के, अर्स सुख लीजे इत । हक याद देत तिन वास्ते, सब बका न्यामत ॥८६॥
कैसा इलम था तुम पे, पूजते थे किन को । कैसे झूठे कबीले में थे, अब आए किनमों ॥८७॥
कौन किया था वतन, जामें कबूं मिटी ना सक । कौन फना सोहोबत में, कहावते थे बुजरक ॥८८॥
अब कैसा पाया हक इलम, कैसे हुए बेसक । कैसा पाया बका वतन, कैसा पाया धनी हक ॥८९॥
कैसा पाया रूहों कबीला, कैसी पाई हक निसबत । कैसे दुख से निकस के, पाई सांची न्यामत ॥९०॥
कैसे फना में हुते, आए कैसे बका वतन । आए कैसे सुख में, छूटी कैसी जलन ॥९१॥
कैसे झूठे घर हुते, पाई कैसी अर्स मोहोलात । जागत हो के नींद में, कछू विचारत हो ए बात ॥९२॥
कौन जंगल गुमराह में हुते, कैसा पाया अर्स बाग । नींद उड़ाओ विचार के, क्यों ना देखो उठ जाग ॥९३॥
चरकीन जिमी में बैठ के, कैसी लेते थे वाए । अब वाए झरोखे अर्स के, कैसी लेत हो अब आए ॥९४॥
कौन बदबोए में हुते, अब आई कौन खुसबोए । सहूर अपने दिल में, तौल देखो ए दोए ॥९५॥
ए कैसा था दुख वजूद, दुख में थे रात दिन । अब पाया सुख अर्स ठौर में, और कैसे अर्स तुम तन ॥९६॥
कैसे सुख पाए कायम तन के, किनसों हुआ मिलाप । अब देखो साहेब अर्स का, पूछो रूह अपनी आप ॥९७॥
कहां रात दिन गुजरानते, अब पाया अर्स रात दिन । देखो दिल विचार के, कछू फरक है उन इन ॥९८॥
कैसी झूठी निसबत में, करते थे गुजरान । अब निसबत भई अर्स की, लेत संग सुभान ॥९९॥
पेहेनावा फना मिने, और पेहेनावा अर्स का । कछू पाई है तफावत, तुम देखो दिल अपना ॥१००॥
अब जिमी फना के, और जिमी बका पटंतर । पसु पंखी देखो फना के, देखो अर्स जानवर ॥१०१॥
देखो ताल नदी झूठी जिमी, और देखो अर्स हौज जोए । करो याद सुख दयो रूह को, दिल देख तफावत दोए ॥१०२॥
दिल मजाजी और हकीकी, कहे कुरान में दोए । ए लेसी तफावत देख के, जो रूह अर्स की होए ॥१०३॥
दिल मजाजी दुनी का, इत अबलीस पातसाह । सो औरों दुस्मन और आपका, मारत सबकी राह ॥१०४॥
और दिल हकीकी मोमिन, सो कह्या है अर्स हक । तरफ नहीं दिल पाक की, जित साहेब की बैठक ॥१०५॥
इस्क मोमिन और दुनी का, कछू देखत हो फरक । अब इस्क ल्यो दिल अपने, तुम दिल अर्स बुजरक ॥१०६॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, जो दिए थे दिल भुलाए । फरामोस से बीच होस के, अब साहेब लेत बुलाए ॥१०७॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥८७६॥
