खिलवत - प्रकरण १५ | Khilwat prakaran 15
आसिक मेरा नाम, रूह-अल्ला आसिक मेरा नाम । इस्क मेरा रूहन सों, मेरा उमत में आराम ॥१॥
इलम ले चलो अर्स का, खोल दयो हकीकत । भूल गईयां आप अर्स को, याद देओ निसबत ॥२॥
इसारतें रमूजें इत की, लिखी माहें फुरमान । सो भेज्या हाथ रसूल के, मिलाए देओ निसान ॥३॥
और भेजत हों तुमको, कहियो मूल संदेसे । इलम ऐसा दिया तुमको, जासों उठें मुरदे ॥४॥
रेहे ना सकों मैं रूहों बिना, रूहें रेहे ना सकें मुझ बिन । जब पेहेचान होवे वाको, तब सहें ना बिछोहा खिन ॥५॥
जब इलम मेरा पोहोंचिया, तब ए होसी बेसक । तब साइत ना रेहे सकें, ऐसा इनों का इस्क ॥६॥
ए बात मैं पेहेले कही, रूहें होसी फरामोस । मेरे इलम बिना तुम कबहूं, आए न सको माहें होस ॥७॥
फरामोसी हम को क्या करे, फेर कह्या रूहन । हम अरवाहें अर्स-अजीम की, असल बका में तन ॥८॥
फुरमान तुमारा आवसी, सो हम पढ़ कर । देख इसारतें रमूजें, हम भूल जाएं क्यों कर ॥९॥
और देवें साहेदी रसूल, दे याद बातें असल । तब क्यों रेहेवे फरामोसी, कहां जाए मूल अकल ॥१०॥
सुन सुख बातें अर्स की, क्यों ना होवें हुसियार । जो मोमिन होवे अर्स की, माहें रूहें बारे हजार ॥११॥
सो तो तबहीं सुन के, होसी खबरदार । मोमिन इत क्यों भूलहीं, सुन संदेसे परवरदिगार ॥१२॥
आगूं से चेतन करी, एती करी मजकूर । रूहें सुन ए सुकन, क्यों याद न आवे जहूर ॥१३॥
ए फुरमान पढ़े पीछे, पाई जब हकीकत । तब फरामोसी क्यों कर रहे, क्यों भूलें ए निसबत ॥१४॥
हाए हाए ऐसी हमसे क्यों होए, कैसे हम मोमिन । सुन संदेसे क्यों भूलहीं, हक आप वतन ॥१५॥
एता हम जानत हैं, जो सौ फरेब करो तुम । ऐसा इस्क क्यों होवहीं, तुमको भूलें हम ॥१६॥
तुम कूदत हो अर्स में, अपने इस्क के बल । तब सुध जरा ना रहे, रहे न एह अकल ॥१७॥
सो खेल मांगत हो, वास्ते इस्क देखन । ए खेल है इन भांत का, उत इस्क न जरा किन ॥१८॥
ना इस्क ना अकल, ना सुध आप वतन । ना सुध रेहेसी हक की, ए भूलोगे मूल तन ॥१९॥
कई चालें बोली जुदियां, माहें मजहब भेख अपार । पूजें आग पानी पत्थर, इनमें खुदा हजार ॥२०॥
खाहिस से बनावहीं, अपने हाथ समार । जुदा जुदा कर पूजहीं, जिनको नाहीं पार ॥२१॥
खेल देखाऊं इन भांत का, जित झूठै में आराम । झूठे झूठा पूजहीं, हक का न जानें नाम ॥२२॥
एक पैदा हुए एक होत हैं, एक होने की उमेद । एक गए जात जाएंगे, इन विध को छल भेद ॥२३॥
देखोगे आसमान जिमी, माहें मुरदों का वास । देत देखाई मर जात हैं, कर गिनती अपने स्वांस ॥२४॥
मौत सबों के सिर पर, मान लिया सबन । चौदे तबक के खेल में, ठौर बका न पाया किन ॥२५॥
खेलत सब फना में, बोलें चालें सब फना । सब जानत आपे आपको, हम उड़सी ज्यों सुपना ॥२६॥
तब रूहों मुझ आगे कह्या, ऐसा इस्क हमारा जोर । फरामोसी क्या करे हम को, इस्क देवे सब तोर ॥२७॥
ए मजकूर भई रूहन सों, मुझ सों किया रब्द । और कछुए न ल्यावें दिल में, आप इस्क के मद ॥२८॥
बातें बोहोत करी रूहन सों, मेरा कह्या न ल्याइयां दिल । सुन्या न आगूं इस्क के, बहस किया सबों मिल ॥२९॥
मैं कह्या इस्क मेरा बड़ा, हादी रूहों आप माफक । एह बात जब मैं करी, तब तुम उपजी सक ॥३०॥
कहे हादी इस्क मेरा बड़ा, कहें रूहें बड़ा हम प्यार । ए बेवरा बीच अर्स के, ए होए नहीं निरवार ॥३१॥
क्यों होए तफावत इस्क, बैठे बीच बका में हम । एक जरा न होए जुदागी, तो क्यों पाइए ज्यादा कम ॥३२॥
पेहेले कह्या मैं तुम को, भूलोगे खेल देख । जहां झूठे झूठा खेलहीं, उत मुझे न पाओ एक ॥३३॥
ए हकें अव्वल कह्या, भूल जाओगे तुम । ना मानोगे फुरमान को, ना कछू रसूल हुकम ॥३४॥
ना मानोगे संदेसे, ना मुझे करोगे याद । झूठा कबीला करोगे, लगसी झूठा स्वाद ॥३५॥
जान बूझ के पूजोगे, पानी पत्थर आग । सब केहेसी ए झूठ है, तो भी रहोगे तिन लाग ॥३६॥
पूजोगे सब फना को, कोई ऐसा खेल बेसुध । ना तो क्यों पूजो मिट्टी गोबर, पर क्या करो बिना बुध ॥३७॥
सुकन मेरा मानो नहीं, सबे भरी इस्क के जोस । सबे बोलें नाचें कूदहीं, हमें कहा करे फरामोस ॥३८॥
हार दिया तब मैं इनों को, रब्द न किया हम । जाए फंदियां झूठ में, नेक देखाया तिलसम ॥३९॥
इस्क ज्यादा आपे अपना, सबों किया रब्द । फरामोसी तिलसम देखाइया, तिन किया सब रद ॥४०॥
अब सो क्योंए आप को, काढ़ न सकें तिलसम । फुरमान ले पोहोंच्या रसूल, तो भी न आवे सरम ॥४१॥
फुरमान लिख्या इन विध का, जो पढ़ के देखें ए । एक जरा सक न रहे, तबहीं जागें हिरदे ॥४२॥
ऐसा रसूल भेजिया, और भेज्या फुरमान । और संदेसे रूहअल्ला, तो भी हुई नहीं पेहेचान ॥४३॥
बड़ा इस्क सबों अपना, कह्या रूहों रब्द कर । तिलसम तो देखाइया, पावने पटंतर ॥४४॥
रूहअल्ला भेद तिलसम का, रूहों देवे बताए । तबहीं रूहों के दिल से, फरामोसी उड़ जाए ॥४५॥
रूहें सुनो तुम संदेसे, मैं ल्याया तुम पर । जो रब्द किया माहें बका, सो ल्याओ दिल भीतर ॥४६॥
मुझे भेज्या हक ने, याद दीजो मेरा सुख । तब इनों तिलसम का, उड़ जासी सब दुख ॥४७॥
बीच बका के बैठ के, हकें कह्या यों कर । रूहअल्ला कहियो रूहन से, भूल गइयां हक घर ॥४८॥
हाथ रसूल के भेजिया, तुम ऊपर फुरमान । हकीकत मारफत की, तुम क्यों न करो पेहेचान ॥४९॥
रब्द किया था अव्वल, सो क्यों गैयां तुम भूल । अजूं याद दिए न आवहीं, सुन एती पुकार रसूल ॥५०॥
और संदेसे रूहअल्ला, सुने जो अलेखे । तो भी आंखें खुली नहीं, आए बका से हक के ॥५१॥
ऐसा इलम हकें भेजिया, आंखें खोल दई बातन । एक जरा सक ना रही, देखे बका वतन ॥५२॥
बेसक जान्या आपे अपना, बेसक जान्या हक । बेसक जान्या हादीय को, उमत हुई बेसक ॥५३॥
ए याद नीके दीजियो, तुम देखो सहूर कर । मेरे इलम से रूहों को, देवे साहेदी अंतर ॥५४॥
बेसक इलम पोहोंचिया, के नाहीं पोहोंच्या तुम । ए देखो दिल विचार के, तो न्यारा नहीं खसम ॥५५॥
इलम पोहोंच्या होए तुमको, हमारा बेसक । तो संदेसे तुमारे इत के, क्यों ना पोहोंचे बका में हक ॥५६॥
किन ठौर छिपाए तुम को, बोलत हो कहां से । कौन तरफ हो अर्स के, ए सहूर करो दिल में ॥५७॥
देखो दिल से दसो दिस, किन तरफ हैं हक । ए विचार देखो इलम को, तो जरा ना रहे सक ॥५८॥
कौन तरफ वजूद है, कौन तरफ है कौल । हाल कौन तरफ का, कौन तरफ है फैल ॥५९॥
ए सब एक तरफ हैं, के जुदे जुदे दौड़त । देखो सहूर करके, है कौन तरफ निसबत ॥६०॥
जब एक ठौर पांचों भए, तब तुमारा इत का । सत संदेसा हक को, क्यों न पोहोंचे माहें बका ॥६१॥
इलम दिया तुमें खुदाई, तब बदले कौल चाल । फैल होवे वाहेदत का, तब बेर न लगे हाल ॥६२॥
गुजरी अर्स बका मिने, मजकूर जो मुतलक । सो इलम हकें ऐसा दिया, जिनमें जरा न सक ॥६३॥
एही तुमारी भूल है, तुमें बंधन याही बात । एही फरामोसी तुम को, जो भूल गए हक जात ॥६४॥
कौल फैल जुदे हुए, हुआ फरामोसी हाल । अब पड़े याही सक में, इन जुदागी के ख्याल ॥६५॥
सो ए इलम जब हक का, देत अर्स की याद । तुमें बेसक गुजरे हाल की, क्यों न आवे कायम स्वाद ॥६६॥
फरामोसी कुलफ की, कुंजी इलम बेसक । करो सहूर तुम रूह सों, जो बकसीस है हक ॥६७॥
ए ऐसा इलम है लदुन्नी, जो देत बका की बूझ । बेसकी सब देत है, और देत हक के दिल का गूझ ॥६८॥
ऐसी कुंजी हकें दई, जो सहूरें कुलफ लगाए । तो फरामोसी क्यों रहे, पर हाथ हुकम जगाए ॥६९॥
बैठे आगूं हक के, किया था मजकूर । इंतहाए नहीं अर्स जिमी का, तुम कहूं नजीक हो के दूर ॥७०॥
बाहेर तो ना जाए सको, छेह न आवे जिमी इन । एक जरा जुदा न होए सके, तुमें ठौर न बका बिन ॥७१॥
हक संदेसे लेत हो, कौन तरफ तुमसों हक । आया इलम खुदाई तुम पे, तिनमें जरा न सक ॥७२॥
तुमें अर्स देखाया दिल में, जो खोलो ले कुंजी सहूर । कुलफ फरामोसी ना रहे, अर्स दिल हक हजूर ॥७३॥
बिना विचारे रेहेत है, तुम पे हक इलम । ए सहूर रूहें पोहोंचहीं, तबहीं उड़े तिलसम ॥७४॥
तीन उमत कही खेल में, एक रूहें और फरिस्ते । तीसरी खलक आम जो, ए सब लरें सरीयत जे ॥७५॥
कुंन से और नूर से, ए दोऊ पैदास । रूहें उतरी अर्स अजीम से, कही असल खासल खास ॥७६॥
ए इलम-इलाही देत हों, तो भी छूटत नहीं तिलसम । हकें पेहेले कह्या भूलोगे, न मानोगे हुकम ॥७७॥
सोई बातें अब मिली, भूल गैयां घर तुम । भूली आप और हक को, भूलियां अकल इलम ॥७८॥
फुरमान रसूल ले आइया, रूहअल्ला संदेसे । असल इलम दे दे थके, अजूं न आवे अकल में ए ॥७९॥
कही बड़ी मेहेर रसूलें, जो हुई माहें रात मेयराज । फजर होसी जाहेर, सो रोज कयामत है आज ॥८०॥
तो मजकूर मेयराज का, ए जो किया जाहेर मेहेरबान । मोमिन देखो हक सहूर से, खोली मारफत-फजर सुभान ॥८१॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, अजूं फरामोसी न जात । बेसक देखो दिन बका, माहें मेयराज की रात ॥८२॥
॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥९५८॥
