खिलवत - प्रकरण १६ | Khilwat prakaran 16
मेहेर हुई महंमद पर, खोले नूरतजल्ला द्वार । सब मेयराज में लेय के, दिया हकें दीदार ॥१॥
बीच बका के पोहोंचिया, जित जले जबराईल पर । तित नब्बे हजार हरफ सुने, फिरे जो मजकूर कर ॥२॥
हुकम हुआ इमाम को, खोल दे द्वार रूहन । आवें सब मेयराज में, दिल देखें अर्स मोमिन ॥३॥
खिलवत सब मेयराज में, जो रूहों करी अव्वल । सो खोले हक हादीय की, ज्यों देखें हकीकी दिल ॥४॥
आखिर गिरो जो रूहन, सब मेयराज में आराम । याको दई इमामें हुकमें, वाहेदत की अर्स ताम ॥५॥
खिलवत हक हादी रूहन की, कबूं न जाहेर किन । सो रूहअल्ला ने रूहसों, तिन कही आगे मोमिन ॥६॥
एक समे हक हादी रूहें, मिल किया मजकूर । रब्द किया इस्क का, सबों आप अपना जहूर ॥७॥
रूहें कहें सब मिल के, हक के आसिक हम । इस्क पूरा है हम में, ए नीके जानो तुम ॥८॥
और आसिक बड़ी रूह के, इनमें नाहीं सक । इस्क हमारे रूहन के, जानत हैं सब हक ॥९॥
बड़ी रूह कहे मुझ में, हक का पूरा इस्क । रूहें प्यारी मेरी रूह की, इनमें नाहीं सक ॥१०॥
तब हकें कह्या सबन को, मैं तुमारा आसिक । और आसिक बड़ी रूह का, कौन मेरे माफक ॥११॥
खबर मेरे इस्क की, तुम जानी नहीं किन । इस्क बड़े सबों अपने, तो कहे रूहन ॥१२॥
और पातसाही मेरे अर्स की, तुमको नहीं खबर । इस्क सबों को अपने, तो बड़े आए नजर ॥१३॥
बुजरक इस्क अपना, तोलों देख्या तुम । कादर की कुदरत की, तुमको नाहीं गम ॥१४॥
साहेबी अर्स अजीम की, तुमें नजर आवे तब । नूर-तजल्ला नूर थें, जुदे होए देखो जब ॥१५॥
खबर तुमारे इस्क की, तो होवे जाहेर । सब मिल जाओ इत थें, बका से बाहेर ॥१६॥
एक पातसाही अर्स की, और वाहेदत का इस्क । सो देखलावने रूहन को, पेहेले दिल में लिया हक ॥१७॥
कहूं विध वाहेदत की, बात करनी हकें जे । सो अपने दिल पेहेले लेय के, पीछे आवे दिल वाहेदत के ॥१८॥
पोहोर दिन से चार घड़ी लग, बरस्या हक का नूर । इस्क तरंग सबों अपने, रोसन किए जहूर ॥१९॥
अपने अपने इस्क का, सबों देखाया भार । तोलों किया रब्द, दिन पीछला घड़ी चार ॥२०॥
एह बातें असल की, करते इस्क सों प्यार । हँसते खेलते बोलते, एही चलत बारंबार ॥२१॥
अपना अपना इस्क, बड़ा जानत सब कोए । बीच बका के बेवरा, इस्क का न होए ॥२२॥
इस्क का हक हादी रूहें, रब्द किया माहों-माहें । सो हक से बीच अर्स के, घट बढ़ होवे नाहें ॥२३॥
जित जुदागी जरा नहीं, तित बेवरा क्यों होए । ताथें रूहें रब्द हक का, क्यों ए ना निबरे सोए ॥२४॥
एक पात न गिरे अर्स बन का, ना खिरे पंखी का पर । अपार जिमी की रूह कोई, कहूं जाए न सके क्योंए कर ॥२५॥
आगूं वाहेदत जिमी के, कहूं नाम न जरा एक । आगूं जरे वाहेदत के, उड़ें ब्रह्मांड अनेक ॥२६॥
रूहें उन वाहेदत की, ताए फरेब न रहे नजर । सो क्यों पड़े फरेब में, देखो सहूर कर ॥२७॥
मौत उत पैठे नहीं, कायम अर्स सुभान । ठौर नहीं अबलीस को, जरा न कबूं नुकसान ॥२८॥
अर्स बका वाहेदत में, सुध इस्क न होवे इत । जुदे जुदे हो रहिए, इस्क सुध पाइए तित ॥२९॥
वाहेदत में सुध इस्क की, पाइए नहीं क्योंए कर । घट बढ़ इत है नहीं, अर्स में एकै नजर ॥३०॥
बिना जुदागी इस्क की, क्यों कर पाइए खबर । सो तो बका में है नहीं, सब कोई बराबर ॥३१॥
कोई बात खुदा से न होवहीं, ऐसे न कहियो कोए । पर एक बात ऐसी बका मिने, जो हक से भी न होए ॥३२॥
कौल फैल हाल बदले, पर ना छूटे रूह इस्क । रूह इस्क दोऊ बका, इनमें नाहीं सक ॥३३॥
दिल फिरे रंग फिरत है, जुसा जोस बदलत । पर असल इस्क ना बदले, जो नेहेचल रूह न्यामत ॥३४॥
रूहों सबों इस्क का, किया बड़ा मजकूर । इस वास्ते बेवरा इस्क का, मुझे देखलावना जरूर ॥३५॥
इस्क बेवरा देखने, एक तुमें देखाऊं ख्याल । इस्क तअल्लुक रूह के, छूटे ना बदले हाल ॥३६॥
रूहें अर्स अजीम की, ताए लगे ना कोई नुकसान । ऐसा खेल देखाऊं तुमें, जो कछू ना रहे पेहेचान ॥३७॥
ऐसा इस्क तुम पे, रूह से क्यों ए ना छूटत । पर ए खेल इन भांत का, जगाए भी न जागत ॥३८॥
मैं छिपोंगा तुमसे, तुम पाए न सको मुझ । न पाओ तरफ मेरीय को, ऐसा खेल देखाऊं गुझ ॥३९॥
और कहूं जाए छिपोगे, के हमको करोगे दूर । के इतहीं बैठे देखाओगे, धनी अपने हजूर ॥४०॥
दूर कहूं न जाऊंगा, तुम बैठो पकड़ चरन । खेल देखोगे इतहीं, तुम मिल सब मोमिन ॥४१॥
हम सब मिल मोमिन बैठेंगे, पकड़ तुमारे चरन । तब कहा करसी फरामोसी, जब बैठें होए एक तन ॥४२॥
गले बाथ सब लेय के, मिल बैठेंगे एक होए । तो फरामोसी कहा करे, होए न जरा जुदागी कोए ॥४३॥
जेते कोई मोमिन, सो बैठे तले कदम । तो तुमारे रसूल का, फेरें नाहीं हुकम ॥४४॥
जो मुनकर हुकम सों, मोमिन कहिए क्यों ताए । दयो फरामोसी हम को, देखो सौ बेर अजमाए ॥४५॥
सो कैसा मोमिन, अर्स की अरवाहें । हम कदमों बीच अर्स के, क्यों जासी भुलाए ॥४६॥
जेती रूहें अर्स की, ताए फरामोसी न जाए जीत । कछू पड़े बीच अपने, ए नहीं इस्क की रीत ॥४७॥
कछुए न चले फरामोस का, हम आगूं हुए चेतन । इस्क हमारे रूह के, असल है एक तन ॥४८॥
बका आड़े पट करों, तुम देख न सको कोए । झूठे मिलावे कबीले, तुम देखोगे सब सोए ॥४९॥
बैठियां सब मिल के, अंग सों अंग लगाए । उठाऊं जुदे जुदे मुलकों, नए नए वजूद बनाए ॥५०॥
पर ऐसा देखोगे तिलसम, जो सबे हुई फरामोस । इलम देऊं मेरा बेसक, तो भी ना आओ माहें होस ॥५१॥
एह खेल ऐसा है, तुम अपना कबीला कर । कोई न किसी को पेहेचाने, बैठो जुदे जुदे कर घर ॥५२॥
तेहेकीक जानोगे झूठ है, तो भी दिल से न छूटे एह । ऐसी मोहोब्बत बांधोगे, झूठै सों सनेह ॥५३॥
वाही जानोगे न्यामत, और वाही से करोगे प्यार । सुख दुख सारा झूठ का, वाही कुटम परिवार ॥५४॥
आग पानी पूजोगे, या सूरत बनाए पत्थर । कहोगे हमारा हक है, सब की एह नजर ॥५५॥
आसमान जिमी पाताल लग, सब झूठे झूठ मन्डल । ऐसे झूठे खेल में, तुम जाओगे सब रल ॥५६॥
हक इनों में न पाइए, ना कछू सुनिया कान । सांच न पाइए इनों में, ए झूठे फना निदान ॥५७॥
झूठा खेल कबीले झूठे, झूठे झूठा खेलें । सब झूठे पूजें खाएं पिएं झूठे, झूठे झूठा बोलें ॥५८॥
झूठा सब लगेगा मीठा, झूठा कुटम परिवार । सुख दुख इनमें झूठी चरचा, हुआ सब झूठै का विस्तार ॥५९॥
इस्क तुमारा तो सांचा, मोहे याद करो बखत इन । रब्द किया तुम मुझसों, बीच बका वतन ॥६०॥
ऐसी तो कोई ना हुई, बिना इलम होवे हुसियार । हाँसी बिना कोई ना रही, छोड़ ना सके अंधार ॥६१॥
इलम मेरा लेय के, निसंक दुनी से तोड़ । सोई भला इस्क, जो मुझ पे आवे दौड़ ॥६२॥
झूठा खेल देखाइया, चौदे तबक की जहान । एक कंकरी होवे अर्स की, तो उड़े जिमी आसमान ॥६३॥
ज्यों नींद में सुपन देखिए, कई लाखों वजूद देखाए । आंखां खोले उड़े फरामोसी, वह तबहीं मिट जाए ॥६४॥
फुरमान लिखूं तुमको, और भेजोंगा पैगाम । तुम कहोगे किन भेजिया, किनके एह कलाम ॥६५॥
कहां है हमारा खसम, और वतन हमारा कित । चौदे तबकों में नहीं, ए किनकी किताबत ॥६६॥
आपन आए वास्ते मजकूर, अर्स से उतर । तो ए दुनियां जो तिलसम की, सो माने क्यों कर ॥६७॥
एह न पावें अर्स को, ना कछू पावें हक । ना कछू समझें इलम को, ए आप नहीं मुतलक ॥६८॥
ए जो ढूंढ़त दुनियां, सो सब तिलसम के । ए क्यों पावें हक बका, तन असल नाहीं जे ॥६९॥
पैदा आदम हवा से, हिरस हवा सैतान । इन बिध की ए पैदास, केहेवत कुरान पुरान ॥७०॥
रल गए वाही खेल में, कछू रही न असल बुध । रूहअल्ला कहे सौ बेर, तो भी आवे न दिल सुध ॥७१॥
देखा देखी करो इनकी, बैठे तिलसम माहें । तुम आए बका वतन से, ए मुतलक कछुए नाहें ॥७२॥
ए तिलसम खेल फना से, खेलत फना माहें । आखिर सब फना होवहीं, इत कायम जरा नाहें ॥७३॥
पट आड़ा बका वतन के, एही हुई फरामोस । जो याद करो हक वतन, इस्क न आवे बिना होस ॥७४॥
बेसक झूठ देखाइया, सो क्यों देखें हमको । रूहें लेवें इलम बेसक, तब पोहोंचें बका मों ॥७५॥
तुम देख्या तिन मुलक को, जित जरा ना इस्क । इत बेसक क्यों होवहीं, जित खबर न पाइए हक ॥७६॥
रूहें उन मुलक से, फिर ना सकें वतन । फरेब क्योंए ना छूटहीं, हक के इस्क बिन ॥७७॥
ऐसी रूहें वाहेदत की, ताए फरेब पोहोंचे क्यों कर । ए बड़ा रूहों का तअजुब, जो बांधी झूठ सों नजर ॥७८॥
मैं भेजी रूह अपनी, सब दिल की बातें ले । तुमें तो भी याद न आवहीं, कोई आए बनी ऐसी ए ॥७९॥
सब बातें मेरे दिल की, और सब रूहों के दिल । सो भेजी मैं तुम पे, जो करियां आपन मिल ॥८०॥
ए बातें सब असल की, जब याद दई तुम । तब इस्क वाली रूहों को, क्यों न उड़े तिलसम ॥८१॥
जब लग लगे दुनियां, तब पोहोंचे न बका मों । एक रूह दूजा इस्क, आए काम पड़या इनसों ॥८२॥
दूजा कछू पोहोंचे नहीं, हक को बीच बका । जहां रूह न होवे एकली, छोड़ सबे इतका ॥८३॥
बका बीच रूहन को, खेल देखावें हक । आया गया इत कोई नहीं, ए इलम कहे बेसक ॥८४॥
बेसक इलम सीख के, ऐसे खेल को पीठ दे । देखो कौन आवे दौड़ती, आगूं इस्क मेरा ले ॥८५॥
जब तुम भूले मुझ को, तब इस्क गया भुलाए । अब नए सिर इस्क, देखो कौन लेय के धाए ॥८६॥
याद करो इन इस्क को, जो रब्द किया सबों मिल । सो इस्क अपना कहां गया, टिक्या नहीं पाव पल ॥८७॥
सब ज्यादा केहेती अपना, करती अर्स में सोर । असल रूहों के इस्क का, कहां गया एता जोर ॥८८॥
किया रूहों सबों रब्द, पर आप न पकड़या किन । फरामोसी सबों फिरवली, हुई हाँसी सबन ॥८९॥
जब इस्क गया सब थें, तब निकल आई पेहेचान । जिनका इस्क जोरावर, ताए कछुक रहे निदान ॥९०॥
सब केहेती इस्क अपना, हमारा बेसुमार । सो रह्या न जरा किन पे, हाए हाए दिया सबों ने हार ॥९१॥
इनों बोहोत लाड़ किए मुझसों, मैं एक किया इनों सों । सो एक मेरे लाड़ में, सब बेहे गैयां तिनमों ॥९२॥
और इस्क भी जोरावर, तिनकी एह चिन्हार । जिन घट सुनत आवहीं, सोई जानो सिरदार ॥९३॥
और भी बेवरा इस्क का, जिनका होए बुजरक । ताए याद दिए क्यों न आवहीं, ऐसा क्यों जाए मुतलक ॥९४॥
रूहें बात सुनते हक की, तुरत ही करें सहूर । जब सहूर रूहें पकड़े, तो इस्क क्यों न करे जहूर ॥९५॥
और भी पेहेचान इस्क की, जो बढ़ के घट जाए । इस्क रूहों का हक सों, क्यों कहिए बका ताए ॥९६॥
इस्क हक का सो कहिए, जो इस्क है कायम । एक जरा कम न होवहीं, बढ़ता बढ़े दायम ॥९७॥
मेरा छूट्या न इस्क रूहों सों, नजर न छूटी निसबत । रूहों छूटी इस्क निसबत, ऐसी भूल गैयां खिलवत ॥९८॥
किया मजकूर इस्क का, अजूं सोई है साइत । पड़े बीच फरामोस के, तुम जानो हुई मुद्दत ॥९९॥
सक छूटी अर्स हक की, सब बातों हुई बेसक । तब अर्स अरवाहों को, क्यों न आवे इस्क ॥१००॥
तोलों चले ना इस्क का, जोलों आड़ी पड़ी सक । सो सक जब उड़ गई, तब क्यों न आवे इस्क हक ॥१०१॥
अव्वल इस्क जिनों आइया, सोई अर्स अरवाहें । नाहीं मुतलक मोमिन, जिनों लगे न बेसक घाए ॥१०२॥
बेसक इलम आइया, पाई बेसक हक दिल बात । हुए बेसक इस्क न आइया, सो क्यों कहिए हक जात ॥१०३॥
बेसक इलम रूहअल्ला का, जो हैयात करे फना को । मुरदे चौदे तबक के, उठें इन इलम सों ॥१०४॥
सो बेसक इलम ल्याइया, रूहअल्ला रूहन पर । जो अरवाहें अर्स की, ताए इस्क न आवे क्यों कर ॥१०५॥
इलम हक का सुनत ही, इस्क न आया जिन । तिनको नसीहत जिन करो, वह मुतलक नहीं मोमिन ॥१०६॥
है तीन वज्हे की उमत, इस्क बंदगी कुफर । सो तीनों आपे अपनी, खड़ियां मजल पर ॥१०७॥
सो तीनों लेवें नसीहत, पर छूटे नहीं मजल । जैसा होवे दरखत, तिन तैसा होवे फल ॥१०८॥
कोई बुरा न चाहे आप को, पर तिन से दूसरी न होए । बीज बराबर बिरिख है, फल भी अपना सोए ॥१०९॥
खेल झूठा देख्या नजरों, सो ले खड़े सिर आप । ताही में मगन भए, छोड़ कायम मिलाप ॥११०॥
अब सो क्योंए याद न आवहीं, जो रूहअल्ला आया तबीब । दारू न लगे तिनका, जाए हकें कह्या हबीब ॥१११॥
चौदे तबक करसी कायम, दारू मसी का ए । गई न फरामोसी रूहों की, आई हुकम सों जे ॥११२॥
आखिर रूहों नसीहत, ए तो हकें देखाया ख्याल । रूहों हक को देखाइया, कौल फैल या हाल ॥११३॥
हकें खेल देखाए के, इलम दिया बेसक । हक हाँसी करे रूहन पर, देसी सबों इस्क ॥११४॥
कोई आगे पीछे अव्वल, इस्क लेसी सब कोए । पेहेले इस्क जिन लिया, सोई सोहागिन होए ॥११५॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, जिन हाँसी कराओ तुम । याद करो बीच बका के, किया रब्द आगूं खसम ॥११६॥
॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥१०७४॥
प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन
प्रकरण ३८१, चौपाई १०५५६
॥ खिलवत सम्पूर्ण ॥
