खिलवत - प्रकरण ५ | Khilwat prakaran 5
रूहों को कुदरत देखाई हक ने
यों कई देखाई माया, और कई विध कराई पेहेचान । कई विध बदली मजलें, कई पुराए साख निसान ॥१॥
हक की बातें अनेक हैं, कही न जाए या मुख । इन झूठे खेल में बैठाए के, कई दिए कायम सुख ॥२॥
मैं पेहेले केहेनी कही, किया काम दुनी का सब । पर एक फैल रेहेनीय का, लिया न सिर पर तब ॥३॥
अब आया बखत रेहेनीय का, रात मेट हुई फजर । अब केहेनी रेहेनी हुआ चाहे, छोड़ दुनी ले अर्स नजर ॥४॥
अब समया आया रेहेनीय का, रूह फैल को चाहे । जो होवे असल अर्स की, सो फैल ले हाल देखाए ॥५॥
केहेनी कही सब रात में, आया फैल हाल का रोज । हक अर्स नजर में लेय के, उडाए देओ दुनी बोझ ॥६॥
जो हकें केहेलाया सो कहया, इत मैं बीच कहूं नाहें । फैल हाल सब हक के, हकें सक मेटी दिल माहें ॥७॥
इलम दिया हकें अपना, और दई असल अकल । जोस इस्क सब हक के, सब उमत करी निरमल ॥८॥
इन जड़ थें तब मैं निकसी, जब आकीन दिया आप । सकें सारी भान के, तुम साहेब किया मिलाप ॥९॥
ए मैं काढ़ी तुम इन विध, इन मैं में न आवे सक । यों काढ़ी खुदी मैं साथ की, हकें किए आप माफक ॥१०॥
हुकमें हाथ पकड़ के, दिया फैल हाल बेसक । तब जोस इस्क देखाया, जासों पाया हक ॥११॥
जोस हाल और इस्क, ए आवे न फैल हाल बिन । सो फैल हाल हक के, बिना बकसीस न पाया किन ॥१२॥
कलाम हक जुबान के, तिनका कहूं विवेक । इन केहेनी से कायम हुए, दुनी पाया हक एक ॥१३॥
जिन केहेनी किल्लीय से, खुल्या भिस्त का द्वार । सो केहेनी छुड़ाई हुकमें, दे फैल रेहेनी सार ॥१४॥
ए जो केहेनी इन भांत की, किए कायम चौदे तबक । सो छुड़ाई केहेनीय को, जासों पाया दुनियां हक ॥१५॥
कहे हुकम आगे रेहेनीय के, केहेनी कछुए नाहें । जोस इस्क हक मिलावहीं, सो फैल हाल के माहें ॥१६॥
दुनियां केहेनी केहेत है, सो डूबत मैं सागर । मैं लेहेरें मेर समान में, कोई निकस न पावे बका घर ॥१७॥
ए खेल मोहोरे कथ कथ गए, सो जले खुदी बेखबर । आप लेहेरें माहें अपनी, गोते खात फेर फेर ॥१८॥
ओही उनों का किबला, छोड़ें नाहीं ख्याल । मैं मैं करत मरत नहीं, इनके एही फैल हाल ॥१९॥
अब कैसी मैं बीच खेल के, जो खेलत कबूतर । ए जो नाबूद कछुए नहीं, तो मैं केहेत क्यों कर ॥२०॥
खेल किया तुम वास्ते, जो देखत बैठे वतन । सो देख के उड़ावसी, जिन विध झूठ सुपन ॥२१॥
जो रूहें होए अर्स की, सो तो तले हुकम । जानत त्यों खेलावत, ऊपर बैठ खसम ॥२२॥
इन में भी मैं है नहीं, जो ए समझें मूल इलम । फैल हाल इस्क लेवहीं, तब हक की मैं आतम ॥२३॥
तब गुनाह कछू ना लगे, जो कीजे ऐसी चाल । सो सुकन पेहेले कहे, जो कोई बदले हाल ॥२४॥
इन विध मैं मरत है, बैठे तले कदम । जोस इस्क आवे हाल में, लेय के हक इलम ॥२५॥
जो सुध मलकूत में नहीं, ना सुध नूर वतन । सो गिरो दिल पूरन भई, मैं काढ़ी बकसीस इन ॥२६॥
इन मैं को हक बिना, कबहूं न काढ़ी जाए । सो मुझ पर मेहेर हकें करी, मैं जरे को देत उड़ाए ॥२७॥
ना तो ए मैं ऐसी नहीं, जो निकसे किए उपाए । मेहेनत कर त्रिगुन थके, कोई सके न मैं को फिराए ॥२८॥
ए दुनियां चौदे तबक में, किन जान्यो न मैं को बल । किन मैं को पार न पाइया, कई दौड़ाए थके अकल ॥२९॥
इन मैं में डूब्या सब कोई, याको पार न पावे कोए । याको पार सो पावहीं, जाको मुतलक बकसीस होए ॥३०॥
ए बानी मैं मारेय की, सुनी होए मोमिन । दुनी तरफ की जीवती, कबहूं न रेहेवे इन ॥३१॥
ए मैं इन गिरोह की, काढ़े एक धनी धाम । ए मरे पेड़ से हुकमें, ले साहेब के कलाम ॥३२॥
इलम खुदाई लदुन्नी, बकसीस असल रोसन । जोस इस्क ले बंदगी, निसबत असल वतन ॥३३॥
अब यों हक को याद कर, ले हुकम सिर चढ़ाए । ए हक बिना मैं दुनीय की, सो सब मैं देऊं उड़ाए ॥३४॥
इत मैं नेक न आवहीं, खड़े हुकम तले जे । ए मैं हक की मेहेर लेय के, कर निसंक हिदायत ए ॥३५॥
ए सुनियो खास उमत, इन मैं को काढ़ो जड़ मूल । ले साहेदी लदुन्नीय से, कौल ईसा इमाम रसूल ॥३६॥
हकें किया हुकम वतन में, सो उपजत अंग असल । जैसा देखत सुपन में, ए जो बरतत इत नकल ॥३७॥
ए करो तेहेकीक विचार के, जो होए अर्स उमत । यों असल में हक जगावत, तैसा बदलत बखत ॥३८॥
कहे लदुन्नी भोम तलेय की, हक बैठे खेलावत । तैसा इत होता गया, जैसा हजूर हुकम करत ॥३९॥
मोहे दिया लदुन्नी रूहअल्ला, सो मैं कह्या बेवरा कर । ए किया उमत कारने, जो विचारो दिल धर ॥४०॥
ए रसूल अर्स अजीम से, ले आया फुरमान । मैं जो कह्या तुमें लदुन्नी, सो जोड़ देखो निसान ॥४१॥
कहे विध विध की साहेदी, या फुरमान या हदीस । और भेजे नामे वसीयत, सो गिरो पर बकसीस ॥४२॥
इत तीन सूरत आए मिली, भांत भांत साहेदी ले । सो लगाए देखो तुम रूह सों, ए इलम लदुन्नी जे ॥४३॥
एह करत सब हुकम, ले अव्वल से आखिर । इत मैं बीच काहू में नहीं, मैं ल्यावे सो काफर ॥४४॥
विचार देखो इप्तदाए से, ले अपना तारतम । आपन सोवत हैं नींद में, खेल खेलावत खसम ॥४५॥
ए जो सूते तुम देखत हो, खसम देखावत ख्याल । सो अब हीं देत उड़ाए के, होसी हाँसी बड़ी खुसाल ॥४६॥
अब मैं काहू में नहीं, ए जो लेत सिर मैं । ए हाँसी होसी ज्यों कर, जो करत हैं मैं तैं ॥४७॥
ताथें जो मैं हक की, रहत तले हुकम । मैं दुनी की मार के, रही देख खेल खसम ॥४८॥
ताथें मैं इन धनी की, करत हक का काम । ए खेल खुसाली लेय के, जाग बैठे इत धाम ॥४९॥
ए सब लेवे रोसनी, पेहेचान के निसबत । ए मैं बका हक की, करे हिदायत महामत ॥५०॥
॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥२५९॥
