खिलवत - प्रकरण ६ | Khilwat prakaran 6
पंच रोशनी का मंगला चरन
गैब बातें मेहेबूब की, बीच बका खिलवत । हकें भेजी मुझ ऊपर, रूह-अल्ला ल्याए न्यामत ॥१॥
रूह-अल्ला आया रूहन पर, उतर चौथे आसमान । सब सुध लाहूती ल्याइया, जो लिख्या बीच फुरमान ॥२॥
इलम लदुन्नी हक का, कुन्जी बका की जे । मेहेर करी मुझ ऊपर, खोल दिए पट ए ॥३॥
मोसों मिलाप कर कह्या, मैं आया रूहन पर । अरवाहें जेती अर्स की, तिन बुलावन खातिर ॥४॥
मोहे कह्या तेरी रूह, आई अर्स अजीम सों । कुन्जी देत हों तुझको, पट खोल दे सब को ॥५॥
न्यामत ल्याए सब रात में, लैलत-कदर के माहें । बुलाए ल्याओ रूहें फजर को, वतन कायम है जांहें ॥६॥
अर्स चौदे तबकों, नजर न आवत किन । सो सेहेरग से नजीक, देखाया बका वतन ॥७॥
एह इलम जिन आइया, सेहेरग से नजीक ताए । ए पट नजरों खोल के, लिए अर्स में बैठाए ॥८॥
ए नेक हकीकत केहेत हों, है बात बिना हिसाब । सो जाने जो लेवे कुन्जी, खोले माएने मगज किताब ॥९॥
सब किताबन की, जब पाई हकीकत । तब तिन सब जाहेर हुई, महंमद हक मारफत ॥१०॥
एह न्यामत जब आई, तब खुले सब द्वार । जो पट कानों ना सुने, सो खोले नूर के पार ॥११॥
बादल रूह-अल्लाह का, बरस्या वतनी नूर । अर्स बका का नासूत में, हुआ सब जहूर ॥१२॥
जब थें दुनी पैदा हुई, अब लग थें अव्वल । बका पट किने न खोल्या, कई गए ब्रह्मांड चल ॥१३॥
अव्वल पैदा होए के, दुनी हो जात फना । तिनमें कछुए ना रहे, ज्यों उड़ जात सुपना ॥१४॥
ऐसे खेल कई हुए, सो फना ही हो जात । एक जरा बाकी ना रहे, कोई करे न बका की बात ॥१५॥
दौड़े कई पैगंमर, कई तीर्थंकर अवतार । अव्वल से आखिर लग, किन खोल्या न बका द्वार ॥१६॥
चौदे तबकों बका का, कोई बोल्या न एक हरफ । तो ए क्यों पावे हक सूरत, किन पाई न बका तरफ ॥१७॥
जो हक पैदा होए नासूत में, तो होय सबे हैयात । इलम अपना देय के, करें जाहेर बका बिसात ॥१८॥
सो इलम रूहअल्ला, ले आया हक का । सेहेरग से नजीक देखाए के, माहें बैठावत बका ॥१९॥
ए बात सुनो तुम मोमिनों, अपनी कहूं बीतक । मेहेर करी मुझ ऊपर, ए इलम खुदाई बेसक ॥२०॥
कौल अलस्तो-बे-रब का, किया रूहों सों जब । हक इलम से देखिए, सोई साइत है अब ॥२१॥
दुनियां दिल मजाजी, कह्या सो कछुए नाहें । और दिल हकीकी मोमिन, हक अर्स कह्या इनों माहें ॥२२॥
इलम हक और दुनी का, कही जाए ना तफावत । ए सुकन सुन रूह मोमिन, आवसी अर्स लज्जत ॥२३॥
बीच बका के रूहन सों, हकें करी खिलवत । सों साथ रूह-अल्लाह के, भेजे संदेसे इत ॥२४॥
रूह-अल्ला आए अर्स से, मुझ सों किया मिलाप । कहे मैं आया तुम वास्ते, मुझे भेज्या है आप ॥२५॥
ए न्यामत हक के दिल की, सोई जाने दई जिन । या दिल जाने मेरी रूह का, सो कहूँ आगे मोमिन ॥२६॥
ए न्यामत वाहेदत की, हक के दिल की बात । और कोई ना ले सके, बिना बका हक जात ॥२७॥
रूह-अल्ला कहे अर्स से, तेरी रूह आई उतर । मैं दई बका तोहे न्यामत, अव्वल से आखिर ॥२८॥
बादल बरस्या रूह-अल्ला, ए बूंदें लई जो तिन । और कोई न ले सके, बिना अर्स रूहन ॥२९॥
जिन पिआ मस्ती तिन की, बीच दुनी के छिपे नाहें । सो मस्ती मोमिनों जाहेर हुई, चौदे तबकों माहें ॥३०॥
हकें न छोड़े अव्वल से, अपना इस्क दिल ल्याए । आप इस्क न छोड़ी निसबत, पर मैं गई भुलाए ॥३१॥
जगाई तो भी ना जागी, आप कह्या इत आए । मैं परी बीच फरेब के, मोहे थके जगाए जगाए ॥३२॥
इस्क न आवे पेहेचान बिना, सो मोको दई पेहेचान । दई बातें हक के दिल की, हक की निसबत जान ॥३३॥
मैं ना कछू जानी पेहेचान, मुझ पर करी मेहेनत । मैं इस्क न जानी निसबत, ना तो मोहे दई हक न्यामत ॥३४॥
इस्क पेहेचान ना निसबत, सब फरेबें दिया भुलाए । हकें इस्क अपना, आखिर लो निबाहे ॥३५॥
ए सुख सब्दातीत के, क्यों कर आवें जुबान । बाले थें बुड़ापन लग, मेरे सिर पर खड़े सुभान ॥३६॥
तो भी घाव न लग्या अरवाह को, जो देखे अलेखे एहेसान । न्यामत पाई बका हक की, कर दई रूह पेहेचान ॥३७॥
नजर से न काढ़ी मुझे, अव्वल से आज दिन । क्यों कहूँ मेहेर मेहेबूब की, जो करत ऊपर मोमिन ॥३८॥
तन असल तले कदम के, और उपज्या तन सुपना । ताए भी हक रहे नजीक, जो था बीच फना ॥३९॥
नीदें दिए गोते सुध बिना, ए जो सुपन का तन । तिनको भी हकें न छोड़िया, सिर पर रहे रात दिन ॥४०॥
उमर अव्वल से आखिर लग, गुजरी सांई संग । मैं पेहेले ना पेहेचाने, हक के इस्क तरंग ॥४१॥
जो बात करनी है हकें, सो पेहेले लेवें माहें दिल । पीछे सब में पसरे, जो वाहेदत में असल ॥४२॥
एक पातसाही अर्स की, और वाहेदत का इस्क । सो देखलावने रूहों को, पेहेले दिल में लिया हक ॥४३॥
जो पेहेले लई हकें दिल में, पीछे आई माहें नूर । तिन पीछे हादी रूहन में, ए जो हुआ जहूर ॥४४॥
वास्ते नूर-जलाल के, और हादी रूहन । बोहोत बेवरा है खेल में, किया महंमद रूहों देखन ॥४५॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, हक साहेबी बुजरक । बेसक इलम हक का, और हक का बड़ा इस्क ॥४६॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥३०५॥
