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खिलवत - प्रकरण ८ | Khilwat prakaran 8

सराब सुख लज्जत

साकी पिलावे सराब, रूहें प्याले लीजिए । हक इस्क का आब, भर भर प्याले पीजिए ॥१॥

हक आसिक रूहन का, इन इस्क का आब जे । इन आब में जो स्वाद है, ए रस जानें पीवन वाले ॥२॥

नहीं हिसाब इस्क का, स्वाद को नाहीं हिसाब । हिसाब ना तरंग अमल के, ए जो आवत साकी के सराब ॥३॥

कई रस इन सराब में, ए जो पिलावत सुभान । मस्ती पिलावत कायम, मेहेर कर मेहेरबान ॥४॥

रूहें नींद से जगाए के, पिलावत प्याले फूल । मुंह पकड़ तालू रूह के, देत कायम सुख सनकूल ॥५॥

ए प्याले कर मेहेरबानगी, कई रूहों पिलावत । सुख देने बका नजीक का, प्यार कर निसबत ॥६॥

कई विध मेहेर करत हैं, मासूक जो मेहेरबान । उलट आप आसिक हुआ, जो वाहेदत में सुभान ॥७॥

रूहों के दिल कछू ना हुता, कछू कहें न मांगें हक से । ना कछू चित्त में चितवन, ना मुतलक रूहों मन में ॥८॥

आस बंधाई हुकमें, हुकमें कराई उमेद । आप इस्क की बुजरकी, कर मेहेर देखाए कई भेद ॥९॥

यों कई सुख दिए इस्क के, कई सुख दिए जो मेहेर । कई सुख अपनी बड़ाई के, जासों और लगे सब जेहेर ॥१०॥

कई सुख दिए अर्स के, कई सुख दिए निसबत । कई सुख दिए इलम के, बेसक जो नसीहत ॥११॥

कई सुख दिए रूहन में, ए मेला बैठा विध जिन । हक ऊपर आप बैठके, सुख देवें सबन ॥१२॥

सुख दिए अर्स जिमीय के, सुख दिए जल जोए । सुख दिए मोहोलात के, सब जरी किनारे सोए ॥१३॥

सुख दिए जल ताल के, सुख ताल कई विवेक । कोट जुबां ना केहे सके, तो कहा कहे रसना एक ॥१४॥

सुख दिए मोहोल नूर के, सुख बाग नूर गिरदवाए । ए समूह मोहोल सुख कैसे कहूं, इन जुबां कहे न जाए ॥१५॥

कई सुख बड़े अर्स के, बन गिरद मोहोलात । ए कायम सुख हक अर्स के, सुख हमेसा दिन रात ॥१६॥

कई सुख जोए बाग के, कई सुख कुंज गलियन । कई सुख पसु पंखियन के, मुख बानी मीठी बोलन ॥१७॥

ए खेलौने सुख हक के, ए सुख दिए रूहन । खूबी इनके परन की, आकास न माए रोसन ॥१८॥

देखी कायम साहेबी हक की, जिनका नहीं सुमार । इन नासूत में बैठाए के, सुख देखाए नूर के पार ॥१९॥

कई सुख दिए लैलत कदर में, जो अव्वल दो तकरार । सुख दिए फजर तीसरे, कई सुख परवरदिगार ॥२०॥

कई सुख दिए निसबत कर, ए झूठा तन कर यार । क्यों कहूं सुख मेहेबूब के, जाके कायम सुख अपार ॥२१॥

और सुख सब मेयराज में, केते कहूं जुबान । जुदी जुदी जंजीरों, लिखे मांहें फुरमान ॥२२॥

हकें कह्या उतरते, तुम जात बीच नासूत । आप वतन जिन भूलो मोहे, मैं बैठा बीच लाहूत ॥२३॥

तब फेर कह्या अरवाहों ने, हम क्यों भूलें तुमको । तुम पेहेले किए चेतन, खेल कहा करे हमको ॥२४॥

ए बातें बीच अर्स के, अव्वल जो मजकूर । सो याद देने लिखी रमूजें, जो हुई हक हजूर ॥२५॥

बैठाए बीच नासूत के, हम पर भेज्या फुरमान । उनमें लिखी इसारतें, वाहेदत के सुभान ॥२६॥

मोमिन मेरे अहेल हैं, हकें लिख्या माहें कुरान । खोल इसारतें रमूजें, इनों जरे जरा पेहेचान ॥२७॥

और जिन छुओ कुरान को, यों हकें लिखी हकीकत । वाको नापाकी ना टरे, बिना तौहीद मदत ॥२८॥

सो मदत तौहीद की, पाइए ना मोमिनों बिन । ए दुनियाँ को चाहें नहीं, जाको हक बका रोसन ॥२९॥

सो पाक मोमिन कहे, जिन लिया हकीकी दीन । सो हक बिना कछू ना रखें, ऐसा इनका आकीन ॥३०॥

हकीकत मारफत के, इनको खुले द्वार । उतरे नूर बिलंद से, याको वतन नूर के पार ॥३१॥

जहां जबराईल जाए ना सक्या, रह्या नूर-मकान । पर जलावे नूरतजल्ली, चढ़ सक्या न चौथे आसमान ॥३२॥

जित हक हादी रूहें, अर्स अजीम का नूर । कौल किया रूहोंसों हकें, सो महंमद मसी ल्याए मजकूर ॥३३॥

और हुज्जत न रखी किनकी, चौदे तबक की जहान । मोमिनों ऊपर अहमद, ल्याया एह फुरमान ॥३४॥

ए नाबूद वजूद जो नासूती, अर्स उमत धरे आकार । लिख्या हकें कुरान में, ए तन मेरे यार ॥३५॥

यों हकें लिख्या कुरान में, ए अरवाहें मेरे अहेल । ए झूठे वजूद जो खाक के, निपट गंदे सेहेल ॥३६॥

औलिया लिल्ला दोस्त कर, नूर जमाल लिखत । ऐसे निजस तन नासूती, कहे यासों मेरी निसबत ॥३७॥

कहे नूर-जमाल कुरान में, छोड़ के एह अंधेर । एक साद करो मुझको, मैं तुमें जी जी कहूं दस बेर ॥३८॥

यों हकें लिख्या कुरान में, हक रूहों की करें जिकर । पीछे आपन करत हैं, रूहें क्यों न देखो दिल धर ॥३९॥

हकें लिख्या कुरान में, पेहेले मेरा प्यार । जो तुम पीछे दोस्ती करो, तो भी मेरे सच्चे यार ॥४०॥

रूहें सुनो एक मैं कहूं, जो हकें करी मुझसों । पड़ी थी जल अंधेर में, कोई थाह न थी इनमों ॥४१॥

भवसागर जीवन को, किन पाया नाहीं पार । दुख रूपी अति मोहजल, माहें धखत जीव संसार ॥४२॥

लेहेरी उठे अंधेर की, पहाड़ जैसी बेर बेर । ऊपर तले लग भमरियां, जीव पड़े फेर माहें फेर ॥४३॥

निपट अंधेरी ला-ए की, सिर ना सूझे हाथ पाए । टापू पहाड़ो बीच में, सब बंधे गोते खाए ॥४४॥

मगर मच्छ माहें बुजरक, वजूद बड़े विक्राल । खेलें निगलें जीव को, एक दूजे का काल ॥४५॥

ला मकान का सागर, लग तले तेहेतसरा । ऐसे अंधेर अथाह बीच पैठ के, मोहे काढ़ी होए मरजिया ॥४६॥

काढ़ के बूझ ऐसी दई, मोहे समझाई सब इत का । बेसक का इलम दिया, जासों बैठी बीच बका ॥४७॥

ए सब किया हक ने, वास्ते इस्क के । एक जरे जरा जो दुनीय में, जो विचार देखो तुम ए ॥४८॥

मैं कह्या नूरी अपना रसूल, तुम पर भेज्या फुरमान । लिखी गुझ बातें दिल की, हाए हाए केहेवत यों सुभान ॥४९॥

लिखी अन्दर की इसारतें, और रमूजें जे । कुन्जी भेजी हाथ रूहअल्ला, जाए दीजो अपनी अरवाहों को ए ॥५०॥

सो कुन्जी दई मुझ को, और खोलने की कल । तिनसे ताले सब खुले, पाई आखिर अव्वल असल ॥५१॥

और कोई ना खोल सके, तीन सूरत का हाल । फैल हाल दोऊ उमत के, तोको लिखिया नूरजमाल ॥५२॥

सुख देओ दोऊ उमत को, बीच बैठ नासूत । चिन्हाए इस्क हक साहेबी, बुलाए ल्‍याओ लाहूत ॥५३॥

इन विध सुख केते कहूँ, झूठी इन जुबान । मेरी रूह जाने या मोमिन, या दिए जिन रेहेमान ॥५४॥

दे आड़ो ब्रह्मांड सबन को, ढूंढ़ ढूंढ़ रहे सब दूर । आगूं आए इलम दिया, जासो पोहोंची बका हजूर ॥५५॥

केती कहूं मेहेर मेहेबूब की, जो रूहें देखो सहूर कर । महामत कहे मेहेर अलेखे, जो देखो रूह की नजर ॥५६॥

॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥३९८॥

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