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खिलवत - प्रकरण ९ | Khilwat prakaran 9

निसबत का प्रकरण

देख तूं निसबत अपनी, मेरी रूह तूं आंखां खोल । तैं तेरे कानों सुनें, हक बका के बोल ॥१॥

कौन जिमी में तूं खड़ी, कहां है तेरा वतन । कौन खसम तेरी रूह का, कौन असल तेरा तन ॥२॥

कौन मिलावा तेरा असल, तूं बिछुरी क्यों कर । तो तोहे याद न आवहीं, जो तैं सुन्या नहीं दिल धर ॥३॥

सहूर तोको साहेब दिया, इलम दिया हक । बाहेर माहें अन्तर, एक जरा न रही सक ॥४॥

चौदे तबकों में नहीं, रूह-अल्ला का इलम । ए दिया एक तोही को, करके मेहेर खसम ॥५॥

मूल मिलावा चीन्हया, चीन्हया बिछुरे वास्ते जिन । बेसक हुई इन बातों, जो हक बका का बातन ॥६॥

दुनियां में अर्स कहावहीं, ताए सब जानें हक । ए इलम तिनको नहीं, जो तैं पाया बेसक ॥७॥

त्रैगुन सिफत कर कर गए, ए जो खावंद जिमी आसमान । खोज खोज खाली गए, माहें थके ला मकान ॥८॥

मलकूत साहेब फरिस्ते, हक ढूंढ़या चहूं ओर । रहे बेचून बेसबीय में, ना पाया बका ठौर ॥९॥

ए नूर बका किने ना पाइया, कर कर गए सिफत । ए सुध नूर बका को नहीं, जो तैं पाई न्यामत ॥१०॥

नूर बका इत दायम, आवे हक के दीदार । तले झरोखे झांकत, आए उलंघ जोए के पार ॥११॥

नूर-जमाल के दीदार को, आवें नूर-जलाल । नूर-जमाल के अर्स में, इत रूहें रहें कमाल ॥१२॥

इत मिलावा रूहन का, जो कही बारे हजार । उतरे लैलत-कदर में, एह तीसरा तकरार ॥१३॥

अर्स-अजीम तेरा वतन, खसम नूर-जमाल । ए इलम पाया तैं बेसक, देख कौल फैल हाल ॥१४॥

देख मेहेर तूं हक की, खोल दई हकीकत । देख इलम तूं बेसक, दई अपनी मारफत ॥१५॥

जिन कारन तेरा आवना, हुआ जिमी इन । रूह-अल्ला ने जो कही, सो मैं कहूं आगे मोमिन ॥१६॥

दायम करत रब्द, रूहें हादी हक । सब कोई केहेते आपना, बड़ा है मेरा इस्क ॥१७॥

बीच अर्स खिलवत में, होत दायम विवाद । इस्क अपना रूहें हक को, फेर फेर देती याद ॥१८॥

तब कह्या हकें हादी रूहन को, मैं तुमारा आसिक । ए तेहेकीक तुम जानियो, इस्क मेरा बुजरक ॥१९॥

तब हादी रूहन को, ए दिल उपजी सक । हक का इस्क हमसे बड़ा, ए क्यों होवे मुतलक ॥२०॥

हकें कह्या रब्द मैं ना करूं, कर देखाऊं तुमको । इस्क मेरा तब देखो, नेक न्‍यारे हो मुझ सों ॥२१॥

न्यारे तो हम होएँ नहीं, निमख ना छोड़ें कदम । ए जेती अरवाहें अर्स की, कदम तले सब हम ॥२२॥

जुदे होए हम ना सकें, अव्वल तो तुमसों । हादी रूहन में जुदागी, कोई होए ना सके हममों ॥२३॥

खेल देखाऊं मैं जुदागी, कदम तले बैठो मिल । ऐसा खेल फरामोस का, जानों जुदे हुए सब दिल ॥२४॥

हक कहे मेरी साहेबी, और मेरा इस्क । हादी रूहों को अर्स में, ए सुध नहीं मुतलक ॥२५॥

जो ए खबर होती तुमको, जैसी मेरी साहेबी बुजरक । तो बड़ा कबूं न केहेतियां, अपने मुख इस्क ॥२६॥

अर्स न छूटे खिन एक, तो क्यों देखें मेरा इस्क । तो क्यों पाइए इस्क बेवरा, आप अपने माफक ॥२७॥

अर्स साहेबी जानी नहीं, तो ना देख्या हक इस्क । तो रूहों हक सों कह्या, इस्क अपना बुजरक ॥२८॥

ना कछू जानी साहेबी, ना जान्या इस्क असल । तो बुजरक इस्क अपना, रब्द किया सबों मिल ॥२९॥

दायम बातें इस्क की, करत माहों-माहें प्यार । खेलते हँसते रमते, करत बारंबार ॥३०॥

एक इस्क दूजी साहेबी, रूहों देखलावना जरूर । तो हमेसा अर्स में, होता एह मजकूर ॥३१॥

ए बात हकें करनी, सुध देने सबन । इस्क और पातसाही की, खबर न थी रूहन ॥३२॥

बहुत बातें हैं हक की, बीच अर्स खिलवत । इन जुबां केती कहूं, हिसाब बिना न्यामत ॥३३॥

एक साहेबी हक की, और इस्क हक का । ए दोऊ कोई न चीन्हैं, बीच अर्स बका ॥३४॥

एक जरा कोई वाहेदत का, ना सके जुदा होए । तोलों न चीन्हे कोई हक की, इस्क साहेबी दोए ॥३५॥

अर्स से जुदे होए के, ए देखे जो कोए । इस्क साहेबी हक की, बुजरक देखे सोए ॥३६॥

ए देखाओ अपनी साहेबी, और कैसा इस्क है तुम । राजी करो देखाए के, हम बैठें पकड़ कदम ॥३७॥

जोलों जुदे होए नहीं, हक बका अर्स सों । तोलो नजरों न आवहीं, अर्स सुख खिलवत मों ॥३८॥

ए अनहोनी क्यों होवहीं, झूठ न आवे बका माहें । और रूहें बका की झूठ को, सो कबूं देखें नाहें ॥३९॥

जरा एक अर्स-अजीम का, उड़ावें चौदे तबक । तो रूह बका क्यों देखहीं, झूठा खेल मुतलक ॥४०॥

अनहोनी ए हकें करी, करके ऐसी फिकर । परदे में झूठ देखाइया, बीच कायम बका नजर ॥४१॥

मेहेर पूरी मेहेबूब की, बड़ी रूह रूहों ऊपर । इस्क साहेबी अर्स की, खेल देखाया और नजर ॥४२॥

हकें नेक करी महंमद सों, सब-मेयराज में मजकूर । सो वास्ते रूहों के साहेदी, सो रूहअल्ला करी जहूर ॥४३॥

महामत कहे मेहेर मोमिनों, हकें करी वास्ते तुम । कौन देवे इत सुख बका, बिना इन खसम ॥४४॥

॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥४४२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-