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विषय-सूची

खुलासा - प्रकरण १ | Khulasa prakaran 1

किताब खुलासा वानी हकी सूरत फजर की । रूहें अर्स की दिल दे देखो ॥

खुलासा फुरमान का

ए होत फुरमाया हक का, जो किया खुलासा ए । किए हादी ने जाहेर, याही मगज मुसाफ के ॥१॥

ए देखो खुलासा फुरमान का, मोमिन करें विचार । रूहें हक सूरत दिल में लई, छोड़ी दुनियाँ कर मुरदार ॥२॥

चौदे तबक होसी कायम, इन नुकते इलम हुकम । हक अर्स वाहेदत में, हुआ रोसन दिन खसम ॥३॥

बड़ाई नुकते इलम की, कहूं जाहेर न एते दिन । खोले द्वार खिलवत के, एही कुन्जी बका वतन ॥४॥

खुले द्वार सब अर्सों के, एही रूह अल्ला इलम । एही लदुन्नी खुदाई, ए कौल हक हुकम ॥५॥

ए कलाम आए हक से, ए नुकता कहया जे । ए जानें विचारें मोमिन, जिन वास्ते हुआ ए ॥६॥

किया बेवरा इन वास्ते, उतरे अर्स से रूहें फरिस्ते । मोमिन मुतकी ए सुन के, रेहे न सकें जुदे ॥७॥

जाहेर हुआ फुरमान से, क्यों आरिफ करें न सहूर । रूहें फरिस्ते और दुनियाँ, ए लिख्या तीनों का मजकूर ॥८॥

देखो दोऊ पलड़े, एक दुनी और अर्स अरवाए । रूहें फरिस्ते पूजें बका सूरत, और लिख्या दुनियाँ खुदा हवाए ॥९॥

ए जो गिरो अर्स अजीम की, तिन पे हकीकत मारफत । बड़ी बड़ाई रूहन की, बीच लाहूत बका वाहेदत ॥१०॥

नूर मकान से पैदा हुई, ए जो गिरो फरिस्तन । कायम वतन से उतरे, सो पोहोंचे न हकीकत बिन ॥११॥

ए बेवरा सिपारे आम में, इन्ना इन्जुलना सूरत । रूहें फरिस्ते दे सलामती, करें हुकम फजर बखत ॥१२॥

ए पैदा बनी-आदम की, ए जो सकल जहान । सो क्यों कर आवे अर्स में, बिना अपने मकान ॥१३॥

जाहेर सिपारे आठमें, लिख्या पैदा आदम हवाए । अबलीस लिख्या दुनी नसलें, और दिल पर ए पातसाह ॥१४॥

भया निकाह आदम हवा, दुनी निकाह अबलीस । ए जाहेर लिख्या फुरमान में, पूजे हवा अपनी खाहिस ॥१५॥

तिन हवा हिरस से पैदा हुई, अपनी खाहिसें जे । सो फैल कर जुदे पड़े, ए जो फिरे दुनियां के फिरके ॥१६॥

पैदास बीच अबलीस कहया, ए जो आदम की नसल । पूजे हवा को खुदा कर, दुनियां एह अकल ॥१७॥

कहया कुलफ आड़े ईमान के, हवाई का देख । दुनी का लिख्या बेवरा, सो ए कहूं विवेक ॥१८॥

राह पकड़े तौहीद की, धरे महंमद कदमों कदम । सो जानो दिल मोमिन, जिन दिल अर्स इलम ॥१९॥

कहया सिजदा आदम पर, अजाजीलें फेरया फुरमान । सो लिखी लानत सबन को, जो औलाद आदम जहान ॥२०॥

असल दुनी की ए भई, जो लिखी माहें फुरमान । पातसाही अबलीस दिल पर, जो करत है सैतान ॥२१॥

गुनाह किया अजाजीलें, दुनी दिल लगी लानत । ढूंढ़ें दज्जाल को बाहेर, पावें ना लिखी इसारत ॥२२॥

अबलीस लिख्या दुनी नसलें, पातसाही करे दिलों पर । ऐसा लिख्या तो भी ना समझे, ए देखें ना रूह की नजर ॥२३॥

चौदे तबक के तखत, बैठा मलकूत अजाजील । राह मारत सब दुनी दिलों, अबलीस इनों वकील ॥२४॥

बुरका हवा का सिर पर, ले बैठा बुजरक । दे कुलफ आड़े ईमान के, किए सब हवा के तअलुक ॥२५॥

तोड़ हवा कुलफ ले ईमान, सोई कहया सिरदार । हवा तरक कर लेवे तौहीद, ए बल पैगंमरी हुसियार ॥२६॥

पूजे हवा कौल तोड़ के, ए फौज सबे अबलीस । लेने बुजरकी जुदे पड़े, कर एक दूजे की रीस ॥२७॥

सिपारे आठमें मिने, जहूद नसारे जुदे पड़े । त्यों कौल तोड़ महंमद के, एक दीन पर रहे ना खड़े ॥२८॥

कहया अर्स दिल महंमद का, ए पूजें सब पत्थर । माएने मुसाफ सब बातून, और ए लेत सब ऊपर ॥२९॥

लोक लानत जाने अबलीस को, सो तो सब दिलों पातसाह । लोक ढूंढ़े बाहेर दज्जाल को, इन किए ताबे अपनी राह ॥३०॥

आकीन न रहे ऊपर का, जो होए जरा समया सखत । तो आकीन उठ्या सबन से, जो आए पोहोंची सरत ॥३१॥

तो जोरा किया दज्जाल ने, देखो आए नामे वसीयत । लिखाए महंमद मेंहेदिए, तो भी देखें ना पोहोंची कयामत ॥३२॥

दिल मोमिन अर्स कहया, कहया दुनी दिल सैतान । ए जाहेर इन बिध लिख्या, आरिफ क्यों न करें बयान ॥३३॥

जो कोई दुनियाँ कुंन से, आए न सके मांहें अर्स । जो रूहें फरिस्ते उतरे, सोई अर्सों के वारस ॥३४॥

रूहें आइयां जुदे ठौर से, और जुदा ही चलन । दुनियाँ राह क्यों ले सके, जिन राह मह होवें मोमिन ॥३५॥

मोमिन रूहें करें कुरबानियाँ, और मता वजूद समेत । छोड़ दुनी इस्क लेवहीं, दिल अर्स हुआ इन हेत ॥३६॥

अर्स कहया दिल मोमिन, कोई एता न करे सहूर । आए वजूद बीच आदम, इनों दिल क्यों हुआ रोसन नूर ॥३७॥

दुनी दिल पर अबलीस, दिल मोमिन अर्स हक । कुरान कौल तो ना विचारहीं, जो इनों अकल नहीं रंचक ॥३८॥

ए देखें दिल अर्स मोमिन, अर्स हक बिना होए क्यों कर । एह विचार तो न करे, जो कुलफ कहे दिलों पर ॥३९॥

बीच कुरान रूहों का लिख्या, इनों असल अर्स में तन । यों हक कलाम कहे जाहेर, मैं बीच अर्स दिल मोमिन ॥४०॥

पत्थर पानी आग पूजत, किन जानी ना हक तरफ । कहया दरिया हैवान का, समझ ना करे एक हरफ ॥४१॥

होए भोम बका की कंकरी, ताए पूजे चौदे तबक । कुरान बतावे बका मोमिन, पर दुनियाँ अपनी मत माफक ॥४२॥

इत सहूर दुनी का ना चले, सुरिया छोड़े ना इनों अकल । सरभर करे मोमिन की, जिनकी अर्स असल ॥४३॥

केहेलावें महंमद के, चलें ना महंमद साथ । डारें जुदागी दीन में, कहें हम सुन्नत जमात ॥४४॥

पेहेचान नहीं मोमिन की, जिनमें अहमद सिरदार । जो रूहें कही दरगाह की, बीच बका बारे हजार ॥४५॥

ढूंढ़ पाए ना पकड़े मोमिन के, पर हुआ हक हाथ सहूर । जो मेहेर करे मेहेबूब, तब ए होए जहूर ॥४६॥

दिल मोमिन अर्स कहया, बड़ा बेवरा किया इत । दुनी दिल पर अबलीस, यों कहे कुरान हजरत ॥४७॥

दुनी न छोड़े तिन को, जो मोमिनों मुरदार करी । दुनी हवा को हक जानहीं, रूहों हक सूरत दिल धरी ॥४८॥

राह दोऊ जुदी पड़ी, दोऊ एक होवें क्योंकर । तरक करी जो मोमिनों, सो हुआ दुनी का घर ॥४९॥

मोमिन उतरे अर्स से, सो अर्स बिलंदी नूर । ए जो रूहें कहीं दरगाह की, हक वाहेदत जिनों अंकूर ॥५०॥

रूहें अर्स अजीम की, जाकी हक हादी सों निसबत । ए हमेसा बीच अर्स के, हक जात वाहेदत ॥५१॥

रूहों तीन बेर खेल देखिया, बीच बैठे अपने वतन । बड़ी दरगाह अर्स अजीम की, जित असल रूहों के तन ॥५२॥

ए हुकमें कजा करी, अव्वल से आखिर । हक अर्स मता मोमिन का, लिया सब फिरकों दावा कर ॥५३॥

करनी को देखे नहीं, जो हम चलत भांत किन । वह दुनियां को छोड़े नहीं, जो मुरदार करी मोमिन ॥५४॥

मोमिनों के माल का, दावा किया सबन । तब हो गए खेल कबूतर, हुआ जाहेर बका अर्स दिन ॥५५॥

गुनाह एही सबन पर, ए जो झूठी सकल जहान । दावा किया वाहेदत का, पछतासी हुए पेहेचान ॥५६॥

अब ए सुध किनको नहीं, पर रोसी हुए रोसन । ए सब होसी जाहेर, ऊगे कायम सूरज दिन ॥५७॥

रूहें जो दरगाह की, हक जात वाहेदत । ए जाने अर्स अरवाहें, जिन मोमिनों निसबत ॥५८॥

और गिरो फरिस्तन की, जिनका कायम वतन । दुनियां कायम होएसी, सो बरकत गिरो इन ॥५९॥

और जो उपजे कुंन से, जो आदम की नसल । दावा किया मोमिन का, जो दुस्मन अबलीस असल ॥६०॥

लिख्या सिपारे चौदमें, गिरो भांत है तीन । महंमद समझाओ तिनों त्यों कर, जिनों जैसा आकीन ॥६१॥

किया तीनों गिरो का बेवरा, सरीयत तरीकत हकीकत । हुकम हुआ महंमद को, कर तीनों को हिदायत ॥६२॥

हकीकत सों समझावना, समझे इसारत सों मोमिन । हक सूरत दृढ़ कर दई, तब दिल अर्स हुआ वतन ॥६३॥

और राह जो तरीकत, गिरो फरिस्तों बंदगी कही । सो समझे मीठी जुबांन सों, समझ पोहोंचे जबरूत सही ॥६४॥

तीसरी गिरो सरीयत से, जो करसी जेहेल जिदाल । सो समझेंगे जिद्दैसों, क्या करें पड़े बंध दज्जाल ॥६५॥

ए पढ़े सब जानत हैं, दिल पर दुस्मन पातसाह । ले लानत बैठा दिल पर, ए अबलीस मारत राह ॥६६॥

कुरान पढ़े चलें सरीयत, करें दावा मोमिनों राह । पर क्या करें कुंजी बिना, पावें ना खुलासा ॥६७॥

मोमिन दुनी ए तफावत, ज्यों खेल और देखनहार । मोमिन मता हक वाहेदत, दुनियां मता मुरदार ॥६८॥

सबों दावा किया अर्स का, हिंदू या मुसलमान । वेद कतेब दोऊ पढ़े, परी न काहूं पेहेचान ॥६९॥

कहया दावा सब का तोड़या, दिया मता मोमिनों को । लिए अर्स वाहेदत में, और कोई आए न सके इनमों ॥७०॥

सिपारे सताईस में, लिखे दुनी के सुकन । ए क्योंए पाक न होवहीं, एक तौहीद आब बिन ॥७१॥

मोको पाक होए सो छूइयो, यों केहेवे फुरमान । करे गुसल तौहीद आब में, इन पाकी पकड़ो कुरान ॥७२॥

सो पाक कहे रूह मोमिन, जिनको तौहीद मदत । सो पीठ देवें दुनीय को, जिनपे मुसाफ मारफत ॥७३॥

सो सरीयत को है नहीं, ए तो खड़े जाहेर ऊपर । एक हादी के लड़ जुदे हुए, ए जो नारी फिरके बहत्तर ॥७४॥

लिख्या कुरान का माजजा, और नबी की नबुवत । एक दीन जब होवहीं, दोऊ तब होवे साबित ॥७५॥

महंमद चाहे सबों मिलावने, ए सब जुदागी डारत । ए सब गुमाने जुदे किए, दुस्मन राह मारत ॥७६॥

एक फिरका नाजी कहया, जित लिखी हक हिदायत । एक दीन किया चाहे, एही मोमिन वाहेदत ॥७७॥

बसरी मलकी और हकी, लिखी महंमद तीन सूरत । होसी हक दीदार सबन को, करसी महंमद सिफायत ॥७८॥

इनों हक बका देखाए के, करसी सबों एक दीन । हक सूरत दृढ़ कर दई, देसी सबों आकीन ॥७९॥

मोमिन गुसल हौज कौसर, माहें ईसा मेंहेदी महंमद । पकड़ें एक वाहेदत को, और करें सब रद ॥८०॥

हक बतावत जाहेर, मेरे खूबों में महंमद खूब । सो मोमिन छोड़ें क्यों कदम, जाको हकें कहया मेहेबूब ॥८१॥

मासूक आसिक दोऊ जाने दुनी, हक मोमिन मांहें खिलवत । उतरी अरवाहें अर्स से, तो भी पढ़े न पावें वाहेदत ॥८२॥

महंमद बतावें हक सूरत, तिनका अर्स दिल मोमिन । सो अर्स दिल दुनी छोड़ के, पूजे हवा उजाड़ जो सुंन ॥८३॥

अबलीस कहया दुनी दुस्मन, तो किया मोमिनों मता का दावा । सो समझे न इसारतें, जिन ताले अबलीस हवा ॥८४॥

जोस गिरो मोमिनों पर, हकें भेज्या जबराईल । रूहें साफ रहें आठो जाम, और अबलीस दुनी दिल ॥८५॥

अर्स से आया असराफील, दिया कई बिध सूर बजाए । सो सोर पड़या ब्रह्मांड में, पाक किए काजी कजाए ॥८६॥

तो अर्स कहया दिल मोमिन, पाया अर्स खिताब । इतहीं गिरो पैगंमरों, काजी कजा इत किताब ॥८७॥

फुरमान आया इमाम पर, कुंजी रूह अल्ला इलम । खुली हकीकत हुकमें, इसारतें रमूजे खसम ॥८८॥

जो लिख्या जिन ताले मिने, मांहें हक फुरमान । रूहें फरिस्ते और कुंन से, तीनों की नसल कही निदान ॥८९॥

बेवरा हुआ मुसाफ का, एक दुनियां और अर्स हक । हक अर्स में सब कहया, दुनियां नहीं रंचक ॥९०॥

और बेवरा कहया जाहेर, दुनियां और मोमिन । दुनी पैदा जुलमत से, मोमिन असल अर्स तन ॥९१॥

ए जो दुनियां चौदे तबक, हक के खेलौने । ऐसे कई पैदा होत हैं, कोई कायम न इनों में ॥९२॥

साँच और झूठ को, दोऊ जुदे किए बताए । हक मोमिन बिन दुनियाँ, बैठी कुफर खेल बनाए ॥९३॥

जब खुली मुसाफ मारफत, तब हुआ बेवरा रोसन । खेल भी हुआ जाहेर, हुए जाहेर बका मोमिन ॥९४॥

दुनियां दिल पर अबलीस, तो राह पुलसरात कही । वजूद न छोड़े जाहेरी, तो दस भांत दोजख भई ॥९५॥

भिस्त दई तिन को, जो हुते दुस्मन । सबों लई थी हुज्जत, हम वारसी ले मोमिन ॥९६॥

मेहेर हुई दुनियां पर, पाई तिनों आठों भिस्त । बीज बुता कछू ना हुता, करी हुकमें किसमत ॥९७॥

मेहेर करी बड़ी महंमदें, आठों भिस्तों पर । दोऊ गिरो दोऊ अर्सों, पोहोंचे रूहें फरिस्ते यों कर ॥९८॥

कोइ आए न सके अर्स में, जाकी नसल आदम निदान । दई हैयाती सबन को, मेहेर कर सुभान ॥९९॥

करें हिंदू लड़ाई मुझ से, दूजे सरीयत मुसलमान । पाया अहमद मासूक हक का, अब छोड़ो नहीं फुरकान ॥१००॥

छत्ते आगा लिया इन समें, जब दोऊ सों लागी जंग । हुकम लिया सिर आकीन, छोड़ दुनी का संग ॥१०१॥

किया खुलासा जाहेर, ले बेसक हक इलम । दिया महंमद मेंहेदी ने, गिरो मोमिनों हाथ हुकम ॥१०२॥

॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥१०२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-