खुलासा - प्रकरण १० | Khulasa prakaran 10
जहूरनामा किताब
पढ़े तो हम हैं नहीं, ए जो दुनियां की चतुराए । कहूं माएने हकीकत मारफत, जो ईसा रसूल फुरमाए ॥१॥
अव्वल बीच और अबलों, सबों ढूंढ़या बनी आदम । एती सुध किन न परी, कहाँ खुदा कौन हम ॥२॥
कौन आप कौन और है, ऐसा छल किया खसम । सुध न खसम रसूल की, नहीं गिरो की गम ॥३॥
कौन रूहें कौन फरिस्ते, कौन आदम कौन जिन । पढ़ पढ़ वेद कतेब को, पर हुआ न दिल रोसन ॥४॥
अपनी अपनी खोजिया, पर आया नहीं खुदाए । थके सब नासूत में, पोहोंचे नहीं इप्तदाए ॥५॥
आब हैयाती न पाइया, दौड़या सिकंदर । काहूँ न पाया ठौर कायम, यों कहे सब पैगंमर ॥६॥
आप राह अपनी मिने, ढूंढ़या सब फिरकन । कायम ठौर पाई नहीं, यों कहया सबन ॥७॥
कहे किताब लोक नासूत के, और मलकूती अकल । छोड़ सुरिया सितारा, कोई आगूं न सके चल ॥८॥
जाहेर लिया माएना, सरीयत कांड करम । खुद खबर पाई नहीं, ताथें पड़े सब भरम ॥९॥
लड़ फिरके जुदे हुए, हिंदू मुसलमान । और खलक केती कहूं, सब में लड़े गुमान ॥१०॥
माएनें ऊपर का सबों लिया, और लिया अहंकार । फिरके फिरे सब हक से, बांधे जाए कतार ॥११॥
कहे सब एक वजूद है, और सब में एकै दम । सब कहे साहेब एक है, पर सबकी लड़े रसम ॥१२॥
क्यों निसान कयामत के, क्यों कर फना आखिर । कहे सब विध लिखी कुरान में, सो पाई न काहूं खबर ॥१३॥
क्यों कर लैलत कदर है, क्यों कर हौज कौसर । ए सुध किनको न परी, कौन किताबें क्यों कर ॥१४॥
मनसूख करी सब किताबें, रानी सबों की उमत । ए सुध किन को न परी, जो इनकी क्यों करी सिफत ॥१५॥
कौन सब पैगंमर हुए, क्यों कर निसान आखिर । कहां से उतरे रूहें मोमिन, कहां से आए काफर ॥१६॥
काजी कजा क्यों होएसी, क्यों होसी दुनी दीदार । क्यों भिस्त क्यों दोजख, किन सिर कयामत मुद्दार ॥१७॥
क्यों असराफील आवसी, क्यों बजावसी सूर । क्यों कर पहाड़ उड़सी, तब कौन नजीक कौन दूर ॥१८॥
पोते नूह नबीय के, जादे पैगंमर । सब दुनियां को खाएसी, आजूज माजूज क्यों कर ॥१९॥
कहया गधा बड़ा दज्जाल का, ऊंचा लग आसमान । पानी सात दरियाव का, पोहोंच्या नहीं लग रान ॥२०॥
ना पेहेचान दज्जाल की, ना दाभतूलअर्ज । ए सुध काहूं न परी, क्यों मगरब सूरज ॥२१॥
ना सुध मोमिन गिनती, ना सुध तीन उमत । माएने मगज खोले बिना, पाइए ना तफावत ॥२२॥
मुरदे क्यों कर उठसी, दुनियां चौदे तबक । पढ़े वेद कतेब को, पर गई न काहूं की सक ॥२३॥
जब मोहे हादी सुध दई, ए खुले माएने तब । तले ला मकान के, खुराक मौत की सब ॥२४॥
कहे दुनियां ला मकान को, बेचून बेचगून । खुदा याही को बूझहीं, बेसबी बेनिमून ॥२५॥
याही को माया कहें, पैदास सब इन से । कोई कहे ए करम है, सब बंधे इन ने ॥२६॥
खुदा याही को कहें, याही को कहें काल । आखिर सब को खाएसी, एही खेलावे ख्याल ॥२७॥
यासों सुन्य निरगुन कहें, निराकार निरंजन । यों नाम खुदाए के, बोहोत धरे फिरकन ॥२८॥
दुनियां ला इलाह की, फेर फेर करे फिकर । गोते खाए फना मिने, पोहोंचे न बका नजर ॥२९॥
ला याही को केहेवहीं, इला भी याही को । सब कोई गोते खात हैं, ला इला के मों ॥३०॥
दुनियां ला इलाह की, फेर फेर करे फिकर । सब तले ला फना के, एक हरफ ना चले ऊपर ॥३१॥
मैं भी उन अंधेर में, हुती ना सुध दिन रात । जो मेहेर मुझ पर भई, सो कहूं भाइयों को बात ॥३२॥
जब मोहे हादी सुध दई, पाया ला इला तब । नूर-मकान नूर-तजल्ला, पाई अर्स हकीकत सब ॥३३॥
जो मानो सो मानियो, दिल में ले ईमान । मैं तो तेहेकीक कहूंगी, गिरो अपनी जान ॥३४॥
नफा ईमान का अब है, पीछे दुनियां मिलसी सब । तोबा दरवाजे बन्द होएसी, कहा करसी ईमान तब ॥३५॥
ईमान ल्याओ सो ल्याइओ, मैं केहेती हों बीतक । पीछे तो सब ल्यावसी, ऐसा कहया मोहे हक ॥३६॥
रूह अल्ला अर्स अजीम से, मो सों आए कियो मिलाप । कहे तुम आए अर्स से, मोहे भेजी बुलावन आप ॥३७॥
तुम आए खेल देखन को, सो किया कारन तुम । ए खेल देख पीछे फिरो, आए बुलावन हम ॥३८॥
तुम बैठे अपने वतन में, खेल देखत मिने ख्वाब । हम आए तुमें देखावने, देख के फिरो सिताब ॥३९॥
इलम लदुन्नी देय के, खोल दई हकीकत । सदर-तुल-मुंतहा अर्स-अजीम, कही कायम की मारफत ॥४०॥
दे साहेदी किताब की, खोल दिए पट पार । ए खेल लैल का देखिया, तीसरा तकरार ॥४१॥
दो बेर लैलत कदर में, खेल में तुम उतरे । चाहे मनोरथ मन में, सो हुए नहीं पूरे ॥४२॥
सो ए पट सब खोल के, दे साहेदी किताब । कहया तीसरा तकरार, ए जो खेल दुख का अजाब ॥४३॥
इतहीं बैठे देखें रूहें, कोई आया नहीं गया । तुम जानो घर दूर है, सेहेरग से नजीक कहया ॥४४॥
नहीं कायम चौदे तबक में, सो इत देखाए दिया । सेहेरग से नजीक, अर्स बका में लिया ॥४५॥
साहेदी खुदाए की, रूह अल्ला दई जब । खुले अन्दर पट अर्स के, पाई सूरत खुदाए की तब ॥४६॥
अन्दर मेरे बैठ के, खोले पट द्वार । ल्याए किल्ली अर्स अजीम से, ले बैठाए नूर के पार ॥४७॥
हक सूरत ठौर कायम, कबहूं न पाया किन । रूह अल्ला के इलम से, मेरी नजर खुली बातन ॥४८॥
ए इलम लिए ऐसा होत है, रूह अपनी साहेदी देत । बैठ बीच ब्रह्मांड के, अर्स बका में लेत ॥४९॥
अव्वल बीच और अब लों, ऐसा हुआ न दुनी में कोए । कायम ठौर हक सूरत, इत देखावे सोए ॥५०॥
जो रूहें अर्स अजीम की, कहूं तिनको मेरी बीतक । जो हुई इनायत मुझ पर, जिन बिध पाया हक ॥५१॥
कायम फना बीच दुनी के, हुती न तफावत । मैं जो बेवरा करत हों, सो कदम हादी बरकत ॥५२॥
नासूत और मलकूृत की, ना ला मकान की सुध । जबरूत लाहूत हाहूत, दई हादी हिरदे बुध ॥५३॥
ए सुध पाए पीछे, हुआ बेवरा बुजरक । ज्यों जाहेर मांहें दुनियां, त्यों बातून माहें हक ॥५४॥
बंदगी सरीयत की, और हकीकत बंदगी । नासूत दुनियां अर्स मोमिन, है तफावत एती ॥५५॥
नासूत बीच फना के, अर्स कायम हमेसगी । दुनियां ताल्लुक दिल की, रूह मोमिन खुदाए की ॥५६॥
एता लिख्या बेवरा, सब किताबों मिने । नुकसान नफा दोऊ देखत, तो भी छोड़ें न हठ अपने ॥५७॥
इस्क बंदगी अल्लाह की, सो होत है हजूर । फरज बंदगी जाहेरी, सो लिखी हक से दूर ॥५८॥
जाहेर मैं केता कहूं, खुदाए का जहूर । वास्ते खास उमत के, ए करी है मजकूर ॥५९॥
ऊपर ला मकान के, राह न मौत की तित । नूर-मकान नूर-तजल्ला, अर्स हमेसगी जित ॥६०॥
नूर-तजल्ला अर्स में, सूरत साहेब की । दरगाह बीच रेहेत हैं, रूहें हमेसगी ॥६१॥
बड़ी बड़ाई इन की, कोई नहीं इन समान । रहें हजूर हक के, ए निसबत करी पेहेचान ॥६२॥
तब मैं दिल में यों लिया, करों कायम चौदे तबक । मेरे खावंद के इलम से, सबों पोहोंचाऊं हक ॥६३॥
ऐसा जब दिल में आइया, दिया जोस हकें बल । उतरी किताबें कादर से, पोहोंच्या हुकम असल ॥६४॥
ए इनायत पेहेले भई, आए महंमद आप । रूह अल्ला पेहेले दिल मिने, अहमद कियो मिलाप ॥६५॥
तब खुदाई इलम से, भई सबे पेहेचान । ऐसी पाई निसबत, बूझा अपना कुरान ॥६६॥
सो कुरान मैं देखिया, सब पाइयां इसारत । हाथ मुद्दा सब आइया, हक पेड़ जानी निसबत ॥६७॥
जो भेजी गिरो हक ने, ए जो खासल खास उमत । ताए देऊं दोऊ साहेदी, ज्यों आवे असल लज्जत ॥६८॥
एह कायम न्यामतें, दोऊ से जुदी जुदी । नूर-जमाल और नूर की, दई दोऊ की साहेदी ॥६९॥
महंमद कहे मैं उनसे, मोमिन मेरे भाई । कुरान हदीसों बीच में, है उनों की बड़ाई ॥७०॥
ए कलाम अल्ला में पेहेले लिख्या, सब छोड़ेंगे सक । बरकत खास उमत की, सब लेसी इस्क ॥७१॥
करसी कतल दज्जाल को, ईसे का इलम । साफ दिल सब होएसी, जिनको पोहोंच्या दम ॥७२॥
कहे सब्द सब आगूं ही, इत खुदा करसी कजाए । हिसाब सबन का लेयके, भिस्त जो देसी ताए ॥७३॥
रूह अल्ला कुंजी ल्यावसी, मेंहेदी इमामत । दरगाही रूहें आवसी, करसी महंमद सिफायत ॥७४॥
जेते कोई फिरके कहे, सब छोड़ देसी कुफर । आवसी दीन इसलाम में, दिल साफ होए कर ॥७५॥
एह पट जिनको खुले, सो आए बीच इसलाम । लिया दावा हकीकी दीन का, सिर ले अल्ला कलाम ॥७६॥
जो बात मैं दिल में लई, सो हकें आगूं रखी बनाए । इत काम बीच खुदाए के, काहूँ दम ना मारयो जाए ॥७७॥
हुकम साहेब का इन विध, सो लेत सबे मिलाए । खावंदे बंध ऐसा बांध्या, कोई काढ़ ना सके पाए ॥७८॥
अग्यारे सै साल का, बंध बांध्या मजबूत कर । हुकम ऐसा कर छोड़या, काहूं करनी न पड़े फिकर ॥७९॥
महामत कहे सुनो मोमिनों, मौला अति बुजरक । मेहेर होत जिन ऊपर, ताए लेत कदमों हक ॥८०॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥५७४॥
