खुलासा - प्रकरण ११ | Khulasa prakaran 11
दोनामा किताब - मंगला चरण
अब कहूं विध निगम, देऊँ महंमद की गम । जाथें मिटे दुनी हम तुम, करूं जाहेर रसम खसम ॥१॥
कहूं माएने मगज विवेक, जाथें दीन होए सब एक । छूट जाए छल भेख, ए बुध इमाम को विसेख ॥२॥
खोज थके सब वेद, और खोज्या कैयों कतेब । पर पाया न काहूं भेद, ताथें रही सबों उमेद ॥३॥
सास्त्र सबे जो ग्रन्थ, ताके करते थे अनरथ । बिना इमाम न कोई समरथ, जो पट खोल के करे अर्थ ॥४॥
हक नाहीं मिने सृष्ट सुपन, ढूंढ़या ला के लोकन । जो जुलमत से उतपन, दई साख आप मुख तिन ॥५॥
कई खोज करी निगम, पर पाई नाहीं गम । ए पैदा जिनके हुकम, सो पाया न किन खसम ॥६॥
कैयों ढूंढ़या चौदे भवन, ढूंढ़े चार मुक्त के जन । नवधा के ढूंढ़े भिंन भिंन, न कछु खबर त्रैगुन ॥७॥
महाप्रले होसी जब, सरगुन न निरगुन तब । निराकार न सुंन, केहेवे को नाहीं वचन ॥८॥
नेत नेत कर तो गाया, जो ब्रह्म न नजरों आया । जित देख्यो तित माया, तब नाम निगम धराया ॥९॥
ब्रह्म नहीं मिने संसार, मन वाचा रही इत हार । ढूंढ़या कैयों कई प्रकार, पर चल्या न आगे विचार ॥१०॥
कई अवतार किताबाँ कर, बहु ग्यानी कहावें तीर्थंकर । औलिए अंबिए पैगंमर, हक की नाहीं काहूं खबर ॥११॥
कहया इतथें आगे सुंन, निराकार निरगुन । भी कहया निरंजन, ताथें अगम रहया सबन ॥१२॥
कैयों ढूंढ़या होए दरवेस, फिरे जो देस विदेस । पर पाया ना काहूं भेस, आगूं ला मकान कहया नेस ॥१३॥
मंगला चरन तमाम
॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥५८७॥
