खुलासा - प्रकरण १२ | Khulasa prakaran 12
साखी- दौड़ करी सिकंदरे, ढूंढ़या हैयाती आब। बका अर्स पाया नहीं, उलंघ न सक्या ख्वाब ॥१॥
हारे ढूंढ़ ऊपर तले, खुदा न पाया किन । तब हक का नाम निराकार, कहया निरंजन सुंन ॥२॥
और नाम धरया हक का, बेचून बेचगून । कहे हक को सूरत नहीं, बेसबी बेनिमून ॥३॥
इत थें आए महंमद, ल्याए फुरमान हकीकत । देखाए खोल माएने, अर्स हक सूरत ॥४॥
मैं आया हक का हुकम, हक आएगा आखिरत । कौल किया हकें मुझ सों, मैं ल्याया हक मारफत ॥५॥
उतरी अरवाहें अर्स से, रूहें बारे हजार । और उतरी गिरो फरिस्ते, और कुंन से हुआ संसार ॥६॥
महंमद कहे मैं उमत पर, ल्याया हक फुरमान । जो लेवे मेरी हकीकत, ताए होवे हक पेहेचान ॥७॥
सात तबक तले जिमी के, तिन पर है नासूत । तिन पर हैं कई फरिस्ते, तिन पर है मलकूत ॥८॥
ला हवा मलकूत पर, ला पर नूर मकान । नूर पार नूर तजल्ला, मैं तहां से ल्याया फुरमान ॥९॥
जबराईल पोहोंच्या नूर लग, मैं पोहोंच्या पार हजूर । मैं वास्ते उमत के, बोहोत करी मजकूर ॥१०॥
कहया सुभाने मुझको, हरफ नब्बे हजार । कहया तीस जाहेर कीजियो, और तीस तुम पर अखत्यार ॥११॥
बाकी जो तीस रहे, सो राखियो छिपाए । बका दरवाजे खोलसी, आखिर को हम आए ॥१२॥
कौल किया हकें मुझ से, हम आवेंगे आखिर । ज्यों आवे ईमान उमत को, तुम जाए देओ खबर ॥१३॥
होए काजी हिसाब लेयसी, दुनी को होसी दीदार । भिस्त देसी कायम, रूहें लेसी नूर के पार ॥१४॥
ईसा मेंहेदी जबराईल, और असराफील इमाम । मार दज्जाल एक दीन करसी, खोलसी अल्ला कलाम ॥१५॥
सो ए कौल माने नहीं, हिंदू मुसलमान । महंमद कहे जाहेर, पर ए ल्यावें ना ईमान ॥१६॥
तो भी न मानें हक सूरत, पातसाह अबलीस दिलों जिन । कहे हक न किनहूं देखिया, खुदा निराकार है सुंन ॥१७॥
सोई कौल सरीयत ने, पकड़ लिया इनों से । कौल तोड़त रसूल के, दुस्मन बैठा दिल में ॥१८॥
आखिर आए रूहअल्ला, सो लीजो कर आकीन । ए समझेगा बेवरा, सोई महंमद दीन ॥१९॥
जो कछू कहया महंमदे, ईसे भी कहया सोए । ए माएने सो समझहीं, जो अरवा अर्स की होए ॥२०॥
सात लोक तले जिमी के, मृत लोक है तिन पर । इंद्र रूद्र ब्रह्मा बीच में, ऊपर विष्णु बैकुण्ठ घर ॥२१॥
निराकार बैकुण्ठ पर, तिन पर अछर ब्रह्म । अछरातीत ब्रह्म तिन पर, यों कहे ईसे का इलम ॥२२॥
ए बेवरा वेद कतेब का, दोनों की हकीकत । इलम एकै बिध का, दोऊ की एक सरत ॥२३॥
ईसे महंमद मेंहेदी का, इन तीनों का एक इलम । हक नहीं ब्रह्मांड में, ए हुआ पैदा जिनके हुकम ॥२४॥
दुनियां बीच ब्रह्मांड के, ऐसा होए जो इलम लिए ए । हक नजीक सेहेरग से, बीच बका बैठावे ले ॥२५॥
करम कांड और सरीयत, ए तब मानें महंमद । जब ईसा और इमाम, होवें दोऊ साहेद ॥२६॥
हिंदू न माने कौल महंमद, न सरीयत मुसलमान । यों जान चौथे आसमान से, आया ईसा देने ईमान ॥२७॥
और आए इमाम, ऊपर अपनी सरत । दे साहेदी महंमद की, करे इमामत ॥२८॥
ईसा इमाम उमत को कहे, चलो हुकम माफक । दे साहेदी महंमद की, दूर करे सब सक ॥२९॥
पेहेले लिख्या फुरमान में, आवसी ईसा इमाम हजरत । मारेगा दज्जाल को, करसी एक दीन आखिरत ॥३०॥
वेदों कहया आवसी, बुध ईश्वरों का ईस । मेट कलजुग असुराई, देसी मुक्त सबों जगदीस ॥३१॥
बुध ब्रह्मसृष्टी वास्ते, आवसी कहया वेद । ए बात है उमत की, कोई और न जाने भेद ॥३२॥
जो नेत नेत कहया निगमे, सब लगे तिन सब्द । माएने निराकार पार के, क्यों समझे दुनियां हद ॥३३॥
पेहेले हवा कही मलकूृत पर, सब सोई रहे पकड़ । पाई न हकीकत कुरान की, तो कोई सक्या न ऊपर चढ़ ॥३४॥
वेद कहे उत दुनी की, पोहोंचे न मन अकल । कहे कतेब छोड़ सुरिया को, आगे पोहोंचे न अर्स असल ॥३५॥
निगमें गम कही ब्रह्म की, क्यों समझे ख्वाबी दम । सो ए करूँ सब जाहेर, रूहअल्ला के इलम ॥३६॥
कहूँ ईसे के इलम की, जो है हकीकत । हक बका अर्स उमत, जाहेर करी मारफत ॥३७॥
नाम सारों जुदे धरे, लई सबों जुदी रसम। सबमें उमत और दुनियाँ, सोई खुदा सोई ब्रह्म ॥३८॥
लोक चौदे कहे वेद ने, सोई कतेब चौदे तबक । वेद कहे ब्रह्म एक है, कतेब कहे एक हक ॥३९॥
तीन सृष्ट कही वेद ने, उमत तीन कतेब । लेने न देवे माएने, दिल आड़ा दुस्मन फरेब ॥४०॥
दोऊ कहे वजूद एक है, अरवा सबमें एक । वेद कतेब एक बतावहीं, पर पावे न कोई विवेक ॥४१॥
जो कछू कहया कतेब ने, सोई कहया वेद । दोऊ बंदे एक साहेब के, पर लड़त बिना पाए भेद ॥४२॥
बोली सबों जुदी परी, नाम जुदे धरे सबन । चलन जुदा कर दिया, ताथें समझ न परी किन ॥४३॥
ताथें हुई बड़ी उरझन, सो सुरझाऊँ दोए । नाम निसान जाहेर करूँ, ज्यों समझे सब कोए ॥४४॥
विष्णु अजाजील फरिस्ता, ब्रह्मा मैकाईल । जबराईल जोस धनीय का, रूद्र तामस अजराईल ॥४५॥
बुध ब्रह्मा मन नारद, मिल व्यासे बाँधे करम । ए सरीयत है वेद की, जासों परे सब भरम ॥४६॥
वेदें नारद कहयो मन विष्णु को, जाको सराप्यो प्रजापत । राह ब्रह्म की भान के, सबों विष्णु बतावत ॥४७॥
दम अबलीस अजाजील को, जाए कुराने कही लानत । सो बैठ दुनी के दिल पर, चलावे सरीयत ॥४८॥
अजाजील दम सब दिलों, बैठा अबलीस ले लानत । बीच तौहीद राह छुड़ाए के, दाएं बाएं बतावत ॥४९॥
सोई अबलीस सबन के, दिल पर हुआ पातसाह । एही दुस्मन दुनी का, जिन मारी सबों की राह ॥५०॥
मलकूत कहया बैकुंठ को, मोहतत्त्व अंधेरी पाल । अछर को नूरजलाल, अछरातीत नूरजमाल ॥५१॥
ब्रह्मसृष्ट कहे मोमिन को, कुमारका फरिस्ते नाम । ठौर अछर सदरतुलमुंतहा, अरसुल्अजीम सो धाम ॥५२॥
श्री ठकुरानी जी रूहअल्ला, महंमद श्री कृष्ण जी स्याम । सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अछर फरिस्ते नाम ॥५३॥
बुध जी को असराफील, विजया अभिनन्द इमाम । उरझे सब बोली मिने, वास्ते जुदे नाम ॥५४॥
बाकी तो वेद कतेब, दोऊ देत हैं साख । अन्दर दोऊ के गफलत, लड़त वास्ते भाख ॥५५॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥६४२॥
