खुलासा - प्रकरण १३ | Khulasa prakaran 13
कंसे काला-गृह में, किए वसुदेव देवकी बन्ध । भानेज मारे आपने, ऐसा राज मद अन्ध ॥१॥
नूह काफर की बन्ध में, रहे साल चालीस । बेटे मारे कई दुख दिए, तो भी काफर न छोड़ी रीस ॥२॥
कहे वेद बैकुंठ से, आए चतुरभुज दिया दीदार । वसुदेव तिन सिखापन, स्याम पोहोंचाया नन्द द्वार ॥३॥
मलकूत से फरिस्ता, नूर समझाया आए । नसीहत कर पीछा फिरया, नूहें स्याम दिया पोहोंचाए ॥४॥
अहीरों की कोम में, जित महत्तर नन्द कल्यान । सुख लिया बृज वधुएं, औरों न हुई पेहेचान ॥५॥
महत्तरों की कोम में, जित हूद कील सिरदार । जोत रसूल टापू मिने, दिया जबराईलें आहार ॥६॥
खेल हुआ जो लैल में, तकरार जो अव्वल । उतरीं रूहें फरिस्ते, अरस के असल ॥७॥
सात रात आठ दिन का, सुकें कहया इन्द्र कोप । भेजी वाए जल अगनी, प्रले को मृतलोक ॥८॥
तब गोवरधन तले, स्यामें राख्यो गोकुल । जल प्रले के फिरवले, अंदर न हुआ दखल ॥९॥
सात रात आठ दिन का, हुआ तोफान हूद महत्तर । राखी रूहें कोहतूर तले, डूब मुए काफर ॥१०॥
हूद कहया नंदजीय को, टापू बृज अखंड । कोहतूर गोवरधन कहया, न्यारा जो ब्रह्मांड ॥११॥
जोगमाया की नाव कर, तित सखियां लई बुलाए । सो सोभा है अति बड़ी, जित सुख लीला खेलाए ॥१२॥
समारी किस्तीय को, तित मोमिन लिए चढ़ाए । सो स्याम चिराग महंमद की, जिन मोमिन पार पोहोंचाए ॥१३॥
वेदें कहया स्याम बृज में, आए नन्द के घर । पीछे आए रास में, इत हुई नहीं फजर ॥१४॥
कालमाया इंड पेहेले रच्यो, जोगमाया रचियो और । फेर तीसरो कालमाया रच्यो, जाने एही इंड वाही ठौर ॥१५॥
पेहेला तकरार हूद घर, दूजा किस्ती पर । तीसरा भया फजर का, जाने वाही लैलत कदर ॥१६॥
किस्ती नूह नबीय की, लिए अपने तन चढ़ाए । स्याम बेटा नूह नबी का, फिरया किस्ती पार पोहोंचाए ॥१७॥
कहे कुरान डूबे काफर, नृूह नबी तोफान । मोमिन सबे किस्ती चढ़े, ए नई हुई जहान ॥१८॥
कहया वेदें कृष्ण अवतार की, पेहेले आए बृज के माहें । रहे रात पीछली लग, फजर इंड तीसरा इहाँए ॥१९॥
आगूं नूह तोफान के, दो तकरार भए लैल । दोए पीछे ए तीसरा, जो भया फजर का खेल ॥२०॥
कहे महंमद दिन खुदाए का, दुनियां के साल हजार । लैलत कदर की फजर को, पावे दुनियां सब दीदार ॥२१॥
लैल बड़ी महीने हजार से, ए बताए दई सरत । सोई फजर सदी अग्यारहीं, ए देखो दिन कयामत ॥२२॥
ब्रह्मसृष्टी सखियां स्याम संग, खेले बृज रास के मांहें । ए सुनियो तुम बेवरा, खेल फजर तीसरा इहांए ॥२३॥
ए जो खेल देखाया रूहन को, ताके हुए तीन तकरार । सो ए कहूं मैं बेवरा, ए जो फजर कार गुजार ॥२४॥
कालमाया जोगमाया, बीच कहे प्रले दोए । एह खेल भया तीसरा, माएने बुध जी बिना न होए ॥२५॥
एक तोफान हूद के, और किस्ती बयान । प्रले दोऊ जाहेर लिखे, मिने रसूल फुरमान ॥२६॥
पेहेले भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर । स्याम सरूप ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर ॥२७॥
दो बेटे नूृह नबीय के, एक स्याम दूजा हिसाम । स्यामें समारी किस्ती मिने, दिया रूहों को आराम ॥२८॥
हलधर आतम नारायन, जो आया हिंदुस्तान । साहेब कहया हिंदुअन का, संग गीता भागवत ग्यान ॥२९॥
बेटा नूह नबीय का, कहया हिंद का बाप हिसाम । सो तोफान के पीछे, आया हिंद मुकाम ॥३०॥
स्याम रास से बरारब, ल्याया साहेब का फुरमान । हकीकत अखण्ड धाम की, तिन बांधी सब जहान ॥३१॥
सो बुध जी सुर असुरन पे, लेसी वेद कतेब छीन । कहे असुराई मेट के, देसी सबों आकीन ॥३२॥
बाप फारस रूम आरब का, कहया फुरमाने स्याम । फुरमान ल्याए वास्ते, रसूल धराया नाम ॥३३॥
वेद कतेब सबन पे, लेसी छीन बुधजी । खोल माएने देसी मुक्त, बीच बैठ ब्रह्मसृष्टी ॥३४॥
ए खिताब महंमद मेंहेदी पे, जाकी करे मुसाफ सिफत । सो महंमद मेंहेदी खोलसी, आखिर अपनी बीच उमत ॥३५॥
अवतार तले विष्णु के, विष्णु करे स्याम की सिफत । इन बिध लिख्या वेद में, सो आए स्याम बुध जी इत ॥३६॥
लिखी अनेकों बुजरकियां, पैगंमरों के नाम । ए मुकरर सब महंमद पे, सो महंमद कहया जो स्याम ॥३७॥
तीर्थंकरों सबों खोजिया, और खोज करी अवतार । तो बुजरकी इत कहाँ रही, जो कायम न खोले द्वार ॥३८॥
अवतारों इत क्या किया, जो दई न बका की सुध । तो लो द्वार मूंदे रहे, आए खोले विजया-अभिनंद-बुध ॥३९॥
सिफत सब पैगंमरों की, माहें लिखी अल्ला कलाम । उमत सबे रानी गई, इनों किन को दिया पैगाम ॥४०॥
लिखी बड़ाई पैगंमरों, तिन की कहां गई नसीहत । अजूं ठाढ़ी उनों की उमतें, देखो पत्थर आग पूजत ॥४१॥
करी किताबें मनसूख, हुए जमाने रद । ना मोमिन पीछे तोफान के, जो लो आखिर आए महंमद ॥४२॥
रात बड़ी है रास की, कही सुके और व्यास । ता बीच लीला अखंड, ब्रह्म ब्रह्मसृष्टी प्रकास ॥४३॥
मृतलोक और स्वर्ग की, ब्रह्मा और नारायन । रास रात के बीच में, ए चारों दरम्यान ॥४४॥
रात कही कदर की, बोहोत बड़ी है सोए । फिरत चिरागें इनमें, चांद सूर ए दोए ॥४५॥
ब्रह्मलीला तीनों ब्रह्मांड की, सो जाहेर होसी सुख ब्रह्म । दे मुक्त सब दुनी को, ब्रह्मसृष्टी लेसी कदम ॥४६॥
मोमिन तीनों तकरार में, जाहेर होसी लैलत कदर । एक दीन होसी दुनी में, सुख कायम बखत फजर ॥४७॥
ब्रह्मसृष्टी प्रेम लच्छ में, कुमारिका ईश्वर । तीसरी जीवसृष्ट दुनियां, वेद केहेत यों कर ॥४८॥
खास रूहें उमत की, और मुतकी दीन इसलाम । और तीसरी खलक, ए तीनों कहे अल्ला कलाम ॥४९॥
ब्रह्मसृष्टी अछरातीत से, ईस्वरी सृष्ट अछर से । जीवसृष्ट बैकुंठ की, ए जो गफलत में ॥५०॥
रूहें उमत कही लाहूती, और फरिस्ते जबरूती । और आम खलक तारीक से, सो सब कुंन से मलकूती ॥५१॥
बुध नेहकलंक आए के, मार कलजुग करसी दूर । असुराई सबों मेट के, देसी मुक्त हजूर ॥५२॥
विजिया-अभिनंद-बुध जी, लिखी एही सरत । ब्रह्मसृष्ट जाहेर होए के, सब को देसी मुक्त ॥५३॥
ईसे के इलम से, होसी सबे एक दीन । ए दज्जाल को मार के, देसी सबों आकीन ॥५४॥
चरन रज ब्रह्मसृष्ट की, ढूंढ़ थके त्रैगुन । कई विध करी तपस्या, यों केहेवत वेद वचन ॥५५॥
करसी पाक चौदे तबक को, लाहूती उमत । देसी भिस्त सबन को, ऐसी कुरान में सिफत ॥५६॥
बरस मास और दिन लिखे, सरत भांत बिध सब । बड़ाई ब्रह्मसृष्ट की, ए जो लीला होत है अब ॥५७॥
साल मास और दिन लिखे, कौल कयामत हकीकत । सिफत उमत मोमिनों, ए जो जाहेर होत आखिरत ॥५८॥
विजिया-अभिनंद-बुधजी, और नेहेकलंक अवतार । कायम करसी सब दुनियां, त्रिगुन को पोहोंचावें पार ॥५९॥
महंमद मेंहेदी आवसी, और ईसा हजरत । ले हिसाब भिस्त देसी सबों, कायम करसी इन सरत ॥६०॥
अखण्ड वतन इत जाहेर, और जाहेर सुख ब्रह्म । बुध विजिया-अभिनंद जाहेर, जाहेर काटे दुनी के करम ॥६१॥
भिस्त होसी इत जाहेर, और जाहेर दोजक । काजी कजा इत जाहेर, और जाहेर होसी सबों हक ॥६२॥
कई हुए ब्रह्मांड कई होएसी, पर ए लीला न हुई कब । विलास बड़ो ब्रह्मसृष्ट में, सुख नयो पसरसी अब ॥६३॥
कई दुनी हुई कई होएसी, पर कबूं न जाहेर उमत । दे भिस्त चौदे तबकों, करें बखत रोज कयामत ॥६४॥
रसम करम कांड की, हुती एते दिन । अब इलम बुधजीयके, दई सबों प्रेम लछन ॥६५॥
सरीयत बंदगी करे फरज ज्यों, सो करते एते दिन । महंमद मेंहेदी जाहेर होए के, इस्क दिया सबन ॥६६॥
पेहेचान बुध नेहेकलंक, और पेहेचान ब्रह्मसृष्ट । याकी अस्तुत निगम करे, किन सुन्या न देख्या दृष्ट ॥६७॥
पेहेचान महंमद रूहअल्ला, और पेहेचान मोमिन । तोरा सबों पर इनका, यों कहे कुरान रोसन ॥६८॥
तीन सरूप कहे वेद ने, बाल किसोर बुढ़ापन । बृज रास प्रभात को, ए बुधजी को रोसन ॥६९॥
ब्रह्मलीला ब्रह्मसृष्ट में, चढ़ती चढ़ती कहे वेद । प्रेम लच्छ दोऊ कहे, किए जाहेर बुधजीएँ भेद ॥७०॥
साहेब के संसार में, आए तीन सरूप । सो कुरान यों केहेवहीं, सुंदर रूप अनूप ॥७१॥
एक बाल दूजा किसोर, तीसरा बुढ़ापन । सुंदरता सुग्यान की, बढ़त जात अति घन ॥७२॥
ज्यों चढ़ती अवस्था, बाल किसोर बुढ़ापन । यों बुध जाग्रत नूर की, भई अधिक जोत रोसन ॥७३॥
ए केहेती हों प्रगट, ज्यों रहे न संसे किन । खोल माएने मगज मुसाफ के, सब भाने विकल्प मन ॥७४॥
श्री कृष्णजीएँ बृज रास में, पूरे ब्रह्मसृष्टी मन काम । सोई सरूप ल्याया फुरमान, तब रसूल केहेलाया स्याम ॥७५॥
चौथा सरूप ईसा रूहअल्ला, ल्याए किल्ली हकीकत धाम । पाँचमां सरूप निज बुध का, खोल माएने भए इमाम ॥७६॥
ए भी पाँच सरूप का, है बेवरा मांहें कुरान । जो कछू लिख्या भागवत में, सोई साख फुरमान ॥७७॥
एही बड़ी इसारत, इमाम की पेहेचान । सबको सब समझावहीं, यों केहेवत है कुरान ॥७८॥
वेद कहे बुध इनपे, और बुध सुपन । एही सब को जगाए के, देसी मुक्त त्रैगुन ॥७९॥
हिंदू कहें धनी आवसी, वेदों लिख्या आगम । कहया हमारा होएसी, साहेब आगे हम ॥८०॥
मुसलमान कहें आवसी, सो हमारा खसम । लिख्या है कतेब में, आगे नबी हमारा हम ॥८१॥
ईसा अल्ला आवसी, कहे किताब फिरंगान । किल्ली भिस्त जो याही पे, खोल देसी नसरान ॥८२॥
यों लड़ के लोक जुदे हुए, पर खसम न होवे दोए । रब आलम का ना टरे, जो सिर पटके कोए ॥८३॥
यों सब जाहेर पुकारहीं, कोई माएने ना समझत । ए माएने मगज इमाम पे, दूजा कौन खोले मारफत ॥८४॥
यों आए तीनों सरूप, धर धर जुदे नाम । सो कारन ब्रह्म उमत के, गुझ जाहेर किए अलाम ॥८५॥
सुर असुर अदयाप के, करत लड़ाई दोए । ए द्वेष साहेब बिना, मेट ना सके कोए ॥८६॥
द्वेष जो लाग्या पेड़ से, सब सोई रहे पकर । साधो द्वेष मिटावने, उपाय थके कर कर ॥८७॥
कई अवतारों बल किए, कई बल किए तीर्थंकर । द्वेष अद्यापी ना मिट्या, कई फरिस्ते पैगंमर ॥८८॥
साहेब आए इन जिमी, कारज करने तीन । सो सब का झगड़ा मेट के, या दुनियां या दीन ॥८९॥
ब्रोध सुर असुरों को, दूजे जादे पैगंमर और । वेद कतेब छुड़ावने, धनी आए इन ठौर ॥९०॥
दो बेटे रूह अल्लाह के, एक नसली और नजरी । भई लड़ाई इन वास्ते, मसनन्द पैगंमरी ॥९१॥
वेद आया देवन पे, असुरन पे कुरान । मूल माएने उलटाए के, कई जाहेर किए तोफान ॥९२॥
मेटन लड़ाई बन्दन की, और जादे पैगंमर । धनी आए वेद छुड़ावने, ए तीन बातें चित्त धर ॥९३॥
जाको दिल जिन भांत को, तासों मिले तिन विध । मन चाहया सरूप होए के, कारज किए सब सिध ॥९४॥
सो बुध इमाम जाहेर भए, तब खुले सब कागद । सुख तो सांचों को दिए, और झूठे हुए सब रद ॥९५॥
वेदांत गीता भागवत, दैयां इसारतां सब खोल । मगज माएने जाहेर किए, माहें गुझ हुते जो बोल ॥९६॥
अंजील जंबूर तौरेत, चौथी जो फुरकान । ए माएने मगज गुझ थे, सो जाहेर किए बयान ॥९७॥
ए कागद उमत ब्रह्मसृष्ट को, सोभा आई तिन पास । माएने इन रोसन किए, तब झूठे भए निरास ॥९८॥
जब हक हादी जाहेर भए, और अर्स उमत । सब किताबें रोसन भई, ऊगी फजर मारफत ॥९९॥
कहे काफर असुर एक दूसरे, करते लड़ाई मिल । फुरमान जब रोसन भया, तब पाक हुए सब दिल ॥१००॥
रात अंधेरी मिट गई, हुआ उजाला दिन । रब आलम जाहेर भए, सुर असुरों ग्रहे चरन ॥१०१॥
हाँसी हुई अति बड़ी, झूठों बड़ी जलन । मेला अति बड़ा हुआ, आखिर सुख सबन ॥१०२॥
बिना सुख कोई न रहया, सब मन काम पूरन । अंधेरी कछू न रही, भए चौदे तबक रोसन ॥१०३॥
मोह तत्व अहं उड़यो, जो परदा ऊपर त्रैगुन । ए सब बीच द्वैत के, निराकार निरंजन सुंन ॥१०४॥
वचन थके सब इतलों, आगे चले न मनसा वाच । सुपन सृष्ट खोजे सास्त्रों, पर पाया न अखंड घर सांच ॥१०५॥
अछरब्रह्म जाहेर किया, जित उतपत फरिस्तों नूर । घर जबराईल जबरूत, जो नेहेचल सदा हजूर ॥१०६॥
और धाम अछरातीत, नूरतजल्ला अर्स । रूह बड़ी ब्रह्मसृष्ट की, जो है अरस-परस ॥१०७॥
ए लीला सब प्रगट करी, महंमद ईसा बुधजी आए । ए तीनों सरूपों मिल के, सबको दिए जगाए ॥१०८॥
भिस्त दई सबन को, चढ़े अछर नूर की दृष्ट । कायम सुख सबन को, सुपन जीव जो सृष्ट ॥१०९॥
दूजी सृष्ट जो जबरूती, जो ईस्वरी कही । अधिक सुख अछर में, दिल नूर चुभ रही ॥११०॥
और उमत जो लाहूती, ब्रह्मसृष्टी घर धाम । इन को सुख देखाए के, पूरन किए मन काम ॥१११॥
मुक्त दई त्रैगुन फरिस्ते, जगाए नूर अछर । रूहें ब्रह्मसृष्ट जागते, सुख पायो सचराचर ॥११२॥
करनी करम कछू ना रहया, धनी बड़े कृपाल । सो बुधजीएँ मारया, जो त्रैलोकी का काल ॥११३॥
॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥७५५॥
