खुलासा - प्रकरण १४ | Khulasa prakaran 14
कुरान की कहूं
अब कहूं कुरान की, सब विध हकीकत । मगज मायने खोले बिना, क्यों पाइए मारफत ॥१॥
बिध सारी यामें लिखी, जाथें न रहे अग्यान । माएने ऊपर के लेय के, कर बैठे अपना कुरान ॥२॥
आरबों सों ऐसा कहया, कागद ए परवान । आवसी रब आलम का, तब खोलसी कुरान ॥३॥
कागद में ऐसा लिख्या, आवेगा साहेब । अंदर अर्थ खोलसी, सब जाहेर होसी तब ॥४॥
दुनियां चौदे तबकों, और मिलो त्रैगुन । माएने मगज मुसाफ के, कोई खोले न हम बिन ॥५॥
धनी माएने खोलसी, सत जानियो सोए । साहेब बिना ए माएने, और खोल न सके कोए ॥६॥
नाम सारे जुदे धरे, ऊपर करी इसारत । फुरमान खोल जाहेर करे, धनी जानियो तित ॥७॥
गुझ अर्थ यामें लिखे, सो समझे कैसे कर । अर्थ ऊपर का लेय के, अकस लेत दिल धर ॥८॥
बड़ी सोभा अहेल किताब की, लिखी मिने कुरान । सो आरब जाने आपको, ए जो धनी फुरमान ॥९॥
अहेल किताब जानें आपको, और सब जाने कुफरान । फजर होसी माएने खुले, तब होसी पेहेचान ॥१०॥
एक खासी उमत रूहन की, सो गिनती बारे हजार । ए आरब तो अनगिनती, नहीं करोरों पार ॥११॥
एता भी न विचारहीं, होए खावंद बैठे सब । फैल न देखें अपने, लिया मोमिनों का मरातब ॥१२॥
सहूर न करें दिल से, कहया नाजी फिरका एक । और बहत्तर नारी कहे, पर पावें नहीं विवेक ॥१३॥
लिख्या है कुरान में, कुलफ किए दिल पर । परदा कानों आंखों पर, तो न सके अर्थ कर ॥१४॥
कागद एक उमत का, और हुआ झूठों सों छल । माएने जब जाहेर भए, तब भाग्यो झूठों बल ॥१५॥
एह विध साख कुरान में, जाहेर लिखी हकीकत । सो धनी आए जहूदों मिने, ओ आरबों में ढूंढ़त ॥१६॥
परदा लिख्या मुंह पर, वास्ते आवने हिंदुओं माहें । जाहेर परस्त जो आरब, सो इसारत समझत नाहें ॥१७॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥७७२॥
