खुलासा - प्रकरण १५ | Khulasa prakaran 15
कुरान के निसान कयामत के जाहेर हुए
बरस नब्बे हजार पर, गुजरे एते दिन । कयामत लिखी कुरान में, सो ए न पाई किन ॥१॥
कई पढ़ पढ़ काजी हुए, कई आलम आरिफ । माएने मगज मुसाफ के, किन खोल्या ना एक हरफ ॥२॥
लिख्या जाहेर कुरान में, और माजजे सब रद । सांचा माजजा इमाम पे, जो ले उतरया अहमद ॥३॥
करामात कलाम अल्लाह की, सांची कहियत हैं सोए । लिख्या है कुरान में, सो बिना इमाम न होए ॥४॥
पढ़या नाहीं फारसी, ना कछू हरफ आरब । सुन्या न कान कुरान को, और खोलत माएने सब ॥५॥
ए सब किताबें इन पे, तामें किल्ली कुरान । रूह अल्ला महंमद मेंहेदी, एही इमाम पेहेचान ॥६॥
जो लों माएने मगज न पाइया, तो लों पढ़या न किन कुरान । किन भेज्या किन वास्ते, ना कछू रसूल पेहेचान ॥७॥
जो अर्थ ऊपर का लेवहीं, सो कहे देव सैतान । यों जंजीरां मुसाफ की, कई विध करी बयान ॥८॥
अजाजील दम सबन में, फरिस्ता जो बुजरक । सारी जिमी पर सिजदा, किया ऊपर हक ॥९॥
हुकम हुआ तिन को, कर सिजदा आदम पर । माएने मगज न ले सके, लिया ऊपर का जाहेर ॥१०॥
लानत हुई तिन को, हुआ गले में तौक । यों सब जाहेर पुकारहीं, तो भी छोड़ें ना वे लोक ॥११॥
तिन दिया धक्का आदम को, अबलीस गेहूं खिलाए । काढ्या प्यारी भिस्त से, दुस्मन संग लगाए ॥१२॥
ए विचारे क्या करें, सब आदम की नसल । तो फुरमाया ना करें, वे खैंचे पेड़ असल ॥१३॥
ओ तो ले ले माएने मगज, लिखे बड़े निसान । सो ए धरे सरत पर, करने अपनी पेहेचान ॥१४॥
दुनियां सबे जाहेरी, सो लेवे माएनें जाहेर । अंदर अर्थ खुले बिना, क्यों पावे दिन आखिर ॥१५॥
निसान कहे इन वास्ते, सो बांधें कौल पर हद । लेत माएने ऊपर के, सो करने को सब रद ॥१६॥
कलाम अल्ला के माएने, सो भी कही इसारत । ए नसल आदम हवाई, क्यों पावे दिन आखिरत ॥१७॥
माएने मुल्लां या ब्राह्मण, करते जो उलटाए । सोई हरफ जबराईल, गया सब चटाए ॥१८॥
नेहेरें चलसी उलटी, किए नजीकी दूर । ईसा मेंहेदी महंमद, आए हिंद में बरस्या नूर ॥१९॥
नूर खुदा रोसन हुआ, खैंच छूटी सब तरफ । लेत माएने ऊपर के, सो रहया न कोई हरफ ॥२०॥
महंमद आया ईसे मिने, तब अहमद हुआ स्याम । अहमद मिल्या मेंहेदी मिने, ए तीन मिल हुए इमाम ॥२१॥
अल्लफ कहया महंमद को, रूह अल्ला ईसा लाम । मीम मेंहेदी पाक से, ए तीनों एक कहे अल्ला कलाम ॥२२॥
महंमद ईसा आए मेयराज में, और असराफील इमाम । बुध जबराईल मिल के, किए गुझ जाहेर अल्ला कलाम ॥२३॥
माएने इन मुसाफ के, कलाम अल्ला का कौल । ईसे के इलम से, दई इसारतें सब खोल ॥२४॥
बड़े निसान आखिरत के, आजूज माजूज दोए । बेटे कहे याफिस के, इनहूं न छोड़या कोए ॥२५॥
कहे बड़े सबन से, सौ गज का आजूज । और तंग चसम कहया, एक गज का माजूज ॥२६॥
चार लाख कौम इन की, फौजां होसी तीन । अर्थ ऊपर के आखिरत, क्यों पावें रात दिन ॥२७॥
ए तो गिनती कही दिनन की, आखिरत बड़े निसान । माएने मगज मुसाफ के, और करे सो कौन बयान ॥२८॥
काल याही दिन कहे, सो पोहोंचे कौल पर आए । तब पिंड या ब्रह्मांड, देत सबे उड़ाए ॥२९॥
दाभ-तूल-अर्ज मक्के से, जाहेर होसी सब ठौर । एक हाथ आसा मूसे का, दूजे सलेमान की मोहोर ॥३०॥
सो मुख होसी उजला, मोहोर करसी जिन । आसा चुभावे जिन मुख, स्याह मुख होसी तिन ॥३१॥
उज्जल मुख मोमिन कहे, स्याह मुख कहे काफर । या भिस्ती या दोजखी, जाहेर होसी आखिर ॥३२॥
कही दाभा वास्ते वह जिमी, पेहेले हुती सबे कुफरान । जोलों स्याम बरारब ना हतें, ना रसूल खबर फुरमान ॥३३॥
जब स्याम रसूल आए इन जिमी, तब हुआ नूर रोसन । कुरान रसूल उमत, जाहेर करी सबन ॥३४॥
ल्याए बंदगी केहेलाए कलमा, बरस्या खुदा का नूर । सो नूर फिरया खाली भई, जैसी असल दाभा थी अंकूर ॥३५॥
सो नूर सब इत आइया, इन जिमी मसरक । तब वह जिमी दाभा भई, जैसी पेहेले थी बिना हक ॥३६॥
मोमिन मुख उज्जल भए, भए काफर मुख स्याह । यों मसरक और मगरब, दोनों दुरस्त कहया ॥३७॥
रूह अल्ला महंमद इमाम, मसरक आए जब । सूरज गुलबा आखिरी, मगरब ऊग्या तब ॥३८॥
नूर खुदा आया मसरक, ऊग्या सूरज मगरब । जाहेरी ढूंढ़ें सूरज जाहेर, ए जो पढ़े आखिरी सब ॥३९॥
ज्यादा चौदे तबक से, दज्जाल गधा इन हद । काना अस्वार तिन पर, सो भी वाही कद ॥४०॥
ताए रूहअल्ला मारसी, करसी दुनियां साफ । आखिर उमत महंमदी, करसी आए इंसाफ ॥४१॥
दम दज्जाल सबन में, रहत दुनी दिल पर । ए जो पातसाह अबलीस, करत सबों में पसर ॥४२॥
ऐसा ए जानत हैं, तो भी जाहेर चाहें दज्जाल । जब ए दज्जाल मारिया, तब दुनी रेहेसी किन हाल ॥४३॥
आखिर आए असराफील, उड़ावसी बजाए सूर । फेर करसी कायम, बजाए खुदाए का नूर ॥४४॥
गावेगा कुरान को, असराफील सूर कर । तब फिरसी सब फरिस्ते, एह बात चित्त धर ॥४५॥
जब जहूर जाहेर हुआ, कलाम अल्ला का नूर । तब ए होसी कायम, ले याही का जहूर ॥४६॥
ए जो माएने मुसाफ के, सो मेंहेदी बिना न होए । सो साहेब ने ऐसा लिख्या, और क्यों कर सके कोए ॥४७॥
॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥८१९॥
