खुलासा - प्रकरण १७ | Khulasa prakaran 17
अर्स अजीम की हक मारफत - महाकारन
कहूं अर्स अरवाहों को, रूह अल्ला के इलम । जासों पाइए हकीकत हक की, मुझे हुआ ज्यों हुकम ॥१॥
और कहूं मैं अर्स की, ज्यों खबर उमत को होए । सब विध कहूं कायम की, ज्यों समझे सब कोए ॥२॥
हक जात जाहेर करूं, और जाहेर हादी उमत । नूर मकान जाहेर करूं, ए एकै जात सिफत ॥३॥
महंमद नूर हक का, रूहें महंमद का नूर । ए हमेसा बका मिने, ए एकै जात जहूर ॥४॥
ए जो सदरतुल-मुंतहा, ए है कायम अर्स । ए जात सिफात एकै, ए हैं अरस-परस ॥५॥
नूर महंमद रूहें हक की, ए हैं एकै जात । और बाग जोए हौज कौसर, ए साहेबी अर्स सिफात ॥६॥
पार ना अर्स जिमी का, ना बागों का पार । पार ना पसु पंखियन को, ना कछू खेल सुमार ॥७॥
पार न बुध बल को, पार ना खूबी खुसबोए । पार ना इस्क आराम को, नूर पार ना इत कोए ॥८॥
एक पात बिरिख को ना गिरे, ना खिरे पंखी का पर । ना होए नया कछू अर्स में, जंगल या जानवर ॥९॥
अब कहूं बेवरा खेल का, हुआ जिन कारन । सो वास्ता कहूं इन भांत सों, ज्यों होए सबे रोसन ॥१०॥
नूर मकान जो हक का, जित होत है हुकम । होए पल में पैदा फना, ऐसे लाख इंड आलम ॥११॥
अर्स खावंद है एकला, आपै हक जात । बिना कुदरत कादर की, क्यों पाइए सिफात ॥१२॥
इत हमेसा होत है, इन कादर की कुदरत । ए खेल इन खावंद के, देखो नूर सिफत ॥१३॥
खेल में कई मुद्दत, होत है दुनियां को । कई कोट होत पैदा फना, नूर के निमख मों ॥१४॥
जब कछू पैदा ना हुआ, जिमी या आसमान । सो हुकम तब ना हुआ, जिन थें उपजी जहान ॥१५॥
अब सुनो इन खेल की, रूहें उतरी जिन वास्ते । फुरमान ल्याया रसूल, और उतरे फरिस्ते ॥१६॥
ए बीच ला मकान के, खेल जिमी आसमान । चौदे तबक भई दुनियां, आखिर फना निदान ॥१७॥
ए खेल हुआ महंमद वास्ते, और अर्स उमत । आखिर जाहेर होए के, खोलसी हकीकत ॥१८॥
अर्स उमत होसी जाहेर, और जाहेर हक जात । करसी दुनियां कायम, ए महंमद की सिफात ॥१९॥
रूह अल्ला उतरे अर्स से, होए काजी लेसी हिसाब । दे दीदार करसी कायम, यों कहे महंमद किताब ॥२०॥
महंमद मेंहेदी आवसी, करसी इमामत । बका पर सिजदा गिरोह को, करावसी आखिरत ॥२१॥
सब कहें किताबें हक के, खेल हुआ हुकमें । किस वास्ते हुकम किया, ए ना कहया किन ने ॥२२॥
अब देखो दुनियां जाहेरी, करम कांड सरीयत । इनके इस्क ईमान की, कहूं सो हकीकत ॥२३॥
दुनी कहे हक को, वजूद नहीं मुतलक । तो ए हुकम किन ने किया, जो सूरत नाहीं हक ॥२४॥
न ठौर ठेहेरावें अर्स को, ना हक की सूरत । हुकम सूरत बिना क्यों होए, और हुकम रखे साबित ॥२५॥
हक वजूद महंमद कहे, नूर पार तजल्ला नूर । रद-बदल वास्ते उमत, पोहोंच के करी हजूर ॥२६॥
हकें हुकम यों किया, कहे हरफ नब्बे हजार । तीस जाहेर कीजियो, तीस तुम पर अखत्यार ॥२७॥
और तीस गुझ रखो, वे आखिर पर मुद्दार । सो हम आए के खोलसी, अर्स बका के द्वार ॥२८॥
सो साहेब आखिर आवसी, किया महंमद सों कौल । भिस्त दरवाजे कायम, सब को देसी खोल ॥२९॥
काजी होए के बैठसी, होसी सबों दीदार । तो भी ईमान न दुनी को, जो एती करी पुकार ॥३०॥
ऐसा ईमान इन दुनी का, कहे महंमद को बरहक । और महंमद के फुरमाए में, फेर तिन में ल्यावें सक ॥३१॥
महंमद बातें हक सों, पोहोंच के करी हजूर । दुनी न माने हक सूरत, जासों एती भई मजकूर ॥३२॥
और कहूं लैलत कदर की, जो कहे तकरार तीन । हादी हुकमें रूहें फरिस्ते, बीच नाजल इसलाम दीन ॥३३॥
और आगे नूह तोफान के, बीच लैलत कदर । गिरो उतरी अर्स से, जो चढ़ी किस्ती पर ॥३४॥
दो तकरार पेहेले कहे, जो गुजरे मांहें लैल । तोफान पीछे ए तीसरा, जो भया फजर का खेल ॥३५॥
दसमी लग रोज रब का, सो दुनी के साल हजार । कहया बेहेतर महीने हजार से, लैल तीसरा तकरार ॥३६॥
महंमद मेंहेदी ईसा नाजल, असराफील जबराईल । रूहें फरिस्ते ऊपर, हकें भेजे एह वकील ॥३७॥
रहे साल चौरासी लैल में, तिन उपर हुई फजर । अग्यारैं सदी मिने, मेरी बातून खुली नजर ॥३८॥
चौदे तबकों न पाइया, अर्स हक का कित । सो नजीक देखाए सेहेरग से, इलम ईसा के इत ॥३९॥
अर्स ना चौदे तबक में, सो लिए इलम ईसा के । नजीक देखाया सेहेरग से, बीच अर्स बैठाए ले ॥४०॥
और मेहेर करी मोहे रूहअल्ला, दिया खुदाई इलम । तूं रूह हैं अर्स अजीम की, तुझ को दिया हुकम ॥४१॥
गिरो आई लैल के खेल में, सो तुमें मिलसी आए । दिल साफ इनों के करके, अर्स में लीजे उठाए ॥४२॥
ए बात मैं दिल में लई, तब महंमद हुए मेहेरबान । हकीकत मारफत के, पट खोल दिए फुरमान ॥४३॥
सब सुध भई अर्स की, हुई हक सों निसबत । गिरो मिली मोहे वतनी, ताए देऊं अर्स न्यामत ॥४४॥
ए सुकन पेहेले लिखे, बीच कतेब वेद । सो ए करत हों जाहेर, जो दिया दोऊ हादियों भेद ॥४५॥
रूहें बेनियाज थीं, बीच दरगाह बारे हजार । जाने ना आप अर्स की, साहेबी अपार ॥४६॥
सुध नाहीं दुख सुख की, ना सुध विरह मिलाप । ना सुध बुजरक अर्स की, खबर न खावंद आप ॥४७॥
साहेब बंदे की सुध नहीं, छोटा बड़ा क्यों कर । ना सुध एक ना दोए की, ना सांच झूठ खबर ॥४८॥
ना सुध दोस्त ना दुस्मन, ना सुध नफा नुकसान । ना सुध दूर नजीक की, ना सुध कुफर ईमान ॥४९॥
तिस वास्ते खेल देखाइया, ए बात दिल में आन । झूठ निमूना देखाए के, रूहों होए हक पेहेचान ॥५०॥
सांची साहेबी हक की, कोई नाहीं दूजा और । झूठ नकल देखे बिना, पावे ना अर्स ठौर ॥५१॥
बिना निमूने न पाइए, क्यों है तफावत । कछू दूजी देखे बिना, पाइए ना हक सिफत ॥५२॥
यों जान बीच बका मिने, दिल में ल्याए हक । नूर-जलाल रूहन को, देखें असल इस्क ॥५३॥
और लिया ए दिल में, जो अरवाहें अर्स की । दूजी बिना जानें नहीं, हक कैसी है साहेबी ॥५४॥
जित दूजी कोई है नहीं, एकै साहेब हक । तो तिन को दूृजी बिना, कौन कहे बुजरक ॥५५॥
असल होए जित अकेला, और होए नाहीं नकल । सो नकल देखे बिना, क्यों पाइए असल ॥५६॥
जित दुख कोई जाने नहीं, होए अकेला सुख । ए सुख लज्जत तब पाइए, जब देखिए कछू दुख ॥५७॥
सांच होए जित एकै, पाइए ना जिद के छूट । सांच हक तब पाइए, जब होए निमूना झूठ ॥५८॥
दूसरा कोई है नहीं, जित एकै होए । तो तिन की सुध दूजे बिना, क्यों कर देवे सोए ॥५९॥
जित साहेब होवे एकला, ना साहेदी दूजे बिन । बिन दिए साहेदी तीसरे, क्यों आवे ईमान तिन ॥६०॥
तो कहया खुदा एक है, और महंमद कहया बरहक । सो न आवे ख्वाबी दम पर, जो लो होए न रूहें बुजरक ॥६१॥
ए खेल हुआ तिन वास्ते, हक के हुकम । महंमद आया रूहों वास्ते, ले फुरमान खसम ॥६२॥
जो ल्याए फुरमान रसूल, सो अब खोली हकीकत । अर्स रूहें फरिस्ते, हुई हक की मारफत ॥६३॥
लिख्या था जो अव्वल, सो आए पोहोंची कयामत । भिस्त दुनी को देय के, हादी ले उठसी उमत ॥६४॥
इन बिध कहूं बेवरा, ज्यों रूहें जानें बुजरकी । देखाए बिना जानें नहीं, हक कैसी है साहेबी ॥६५॥
हकें देखाई अर्स साहेबी, हादी रूहों को यों कर । दुई देखाई झूठ ख्वाब में, पावने पटंतर ॥६६॥
चढ़ना है नासूत से, तिन ऊपर है मलकूत । तिन पर ला-मकान है, तिन पर नूर बका साबूत ॥६७॥
कोट नासूत की दुनियां, मलकूत को पृूजत । खुदा याही को जानहीं, ए मलकूत साहेबी इत ॥६८॥
कोट मलकूत के खावंद, ला के तले बसत । नूर सिफत कर कर गए, पर आगे ना पोहोंचत ॥६९॥
वेदें नाम धरे खेल के, पूत बंझा सींग ससक । आकास फूल इनको कहया, एक जरा न रखी रंचक ॥७०॥
कतेब कहे तले ला के, सो खेल है सब ला । ए कुंन केहेते हो गया, सो कयामत को फना ॥७१॥
जो जाने खेल को साहेबी, सो खेलै के कबूतर । इन की सहूर सुरिया लग, सो हकें पोहोंचे क्यों कर ॥७२॥
कहे कबूतर खेल के, खेल सरीक हक का । हक हमेसा वेद कतेब में, खेल तीनों काल फना ॥७३॥
एक साहेबी नूर हक की, और खेल कछुए नाहें । न सरीक न निमूना, ए लिख्या वेद कतेबों मांहें ॥७४॥
खेल तो झूठा फना कहया, साहेब हमेसा हक । जैसा साहेब बुजरक, खेल भी तिन माफक ॥७५॥
झूठ निमूना हक को दीजिए, ए कैसी निसबत । ए झूठ खेल देखाइया, लेने हक लज्जत ॥७६॥
कोट इंड पैदा फना, होवें नूर के एक पल । ऐसी नूर जलाल की, कुदरत रखे बल ॥७७॥
तिन से कायम होत है, सदरतुलमुंतहा जित । होए नाहीं इन जुबां, नूर मकान सिफत ॥७८॥
सदरतुलमुंतहा थें, आवत नूर-जलाल । जित है अर्स अजीम, खावंद नूर-जमाल ॥७९॥
सो नूर नूरतजल्ला के, दायम आवे दीदार । इन दरगाह में उमत, रूहें बारे हजार ॥८०॥
एह मरातबा रूहन का, जिन का हादी अहमद । मीम गांठ जब खुली, तब सोई हक अहद ॥८१॥
महामत कहे ए मोमिनों, देखो खसम प्यार । ईसा महंमद अंदर आए के, खोल दिए सब द्वार ॥८२॥
॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥१००९॥
