खुलासा - प्रकरण २ | Khulasa prakaran 2
खुलासा गिरो दीन का
ए देखो खुलासा गिरो दीन का, कहूं फुरमाया फुरमान । हक हादी गिरो अर्स की, सक भान कराऊँ पेहेचान ॥१॥
हक सूरत हादी साहेद, मसहूद है उमत । सो हक खिलवत सब जानहीं, और ए जाने खेल रोज कयामत ॥२॥
हक बका में जेता मता, सो छिपे ना मोमिनों से । खेल में आए तो भी अर्स दिल, ए लिख्या फुरमान में ॥३॥
लिख्या नामे मेयराज में, हरफ नब्बे हजार । तीस तीस तीनों सरूपों पर, दिए जुदे जुदे अखत्यार ॥४॥
एक जाहेर किए बसरिएँ, दूजे रखे मलकी पर । तीसरे सूरत हकी पे, सो गुझ खोल करसी फजर ॥५॥
कही सूरत तीन रसूल की, हुई तीनों पर इनायत हक । किया तीनों का बेवरा, हरफ नब्बे हजार बेसक ॥६॥
राह चलाई बसरिएँ फुरमानें, दई कुंजी मलकी हकीकत । हकी हक सूरत, किया जाहेर दिन मारफत ॥७॥
ए अव्वल कहया रसूलें, होसी जाहेर बखत कयामत । मता सब मेयराज का, करी जाहेर गुझ खिलवत ॥८॥
ए जो कागद वेद कतेब के, तामें जरा न हुकम बिन । दुनियां सब तिन पर खड़ी, ए जो अठारे बरन ॥९॥
कलाम अल्ला जो फुरमान, सो इन सबसे न्यारा जान । ल्याया पैगंमर आखिरी, हक के कौल परवान ॥१०॥
कहया महंमद का सब हुआ, जो काफर करते थे रद । फिरवले सबन पर, महंमद के सब्द ॥११॥
इत मुनाफक खतरा ल्यावते, जो कुराने कही कयामत । सो खास रूहें मोमिन आए, जाके दिल अर्स न्यामत ॥१२॥
ए देखो तुम बेवरा, कहावें बंदे महंमद । सहूर ना करे बातून, कोई न देखे छोड़ हद ॥१३॥
ए दुनियाँ किन पैदा करी, कौन ल्याया हूद तोफान । किन राखी गिरो कोहतूर तले, किन डुबाई सब जहान ॥१४॥
किन फेर दुनी पैदा करी, फेर कौन ल्याया नूह तोफान । किन ऐसी किस्ती कर तारी गिरो, किन डुबाई सब कुफरान ॥१५॥
तीन बेटे नूह नबीय के, बेर तीसरी दुनी इनसे । हक फुरमान गिरो ऊपर, महंमद ल्याए इनमें ॥१६॥
कहया स्याम बाप उन लोकों का, रूम फारस आरबन । सब तुरकों बाप याफिस, हाम बाप हिंदुस्तान सबन ॥१७॥
कुरान हकीकत न खुली, ना स्याम रसूल पेहेचान । ना पावें महंमद गिरो को, जो सौ साल पढ़े कुरान ॥१८॥
ए सब मुखथें कहें महंमद को, ए अव्वल ए आखिर । बड़े काम नजीकी हक के, ए किन किया महंमद बिगर ॥१९॥
एक खुदा हक महंमद, हर जातें पूजें धर नाऊँ । सो दुनियां में या बिना, कोई नहीं कित काऊँ ॥२०॥
ओ खासी गिरो और महंमद, आए दो बेर मांहें जहूदन । गिरो बचाई काफर डुबाए, ए काम होए ना महंमद बिन ॥२१॥
सब जातें नाम जुदे धरे, और सबका खावंद एक । सबको बंदगी याही की, पीछे लड़े बिन पाए विवेक ॥२२॥
रूहें अर्स से लैलत कदर में, हक हुकमें उतरे बेर तीन । सुध खास गिरो न महंमद, कहे हम महंमद दीन ॥२३॥
एक बेर गिरो हूद घर, बेर दूजी किस्ती पर । तीसरी बेर मास हजार लों, सदी अग्यारहीं हिसाब फजर ॥२४॥
जाहेर पहचान कही रसूले, गिरो खासी और कयामत । सहूर करें दिल अकलें, तो दोऊ पावें हकीकत ॥२५॥
हजार साल कहे दुनी के, सो खुदाए का दिन एक । लैलत कदर का टूक तीसरा, कहया हजार महीने से विसेक ॥२६॥
सौ साल रात अग्यारहीं लग, एक दिन के साल हजार । अग्यारै सदी अंत फजर, एही गिरो है सिरदार ॥२७॥
रूहें गिरो तब इत आईं नहीं, तो यों करी सरत । कहया खुदा हम इत आवसी, फरदा रोज कयामत ॥२८॥
जब एक रात एक दिन हुआ, सो एही फरदा कयामत । अहेल किताब मोमिन कहे, हादी कुरान सूरत ॥२९॥
आए वसीयत नामें मक्के से, उठ्या कुरान दुनी से बरकत । सो अग्यारै सदी अंत उठसी, रूहें हादी कुरान सोहोबत ॥३०॥
झण्डा ईसे मेहेंदी ने, खड़ा किया है जित। सो आई इत न्यामतें, हक हकीकत मारफत ॥३१॥
कही थी बरकत दुनी में, सो दुनियां माफक ईमान । सो भी जाहेर ठौर सबे उठे, हिन्दू या मुसलमान ॥३२॥
जब मुसाफ हादी गिरो चली, पीछे दुनी रहे क्यों कर । खेल किया जिन वास्ते, सो जागे अपनी सरत पर ॥३३॥
देखो तीन बेर गिरो वास्ते, हक हुए मेहेरबान । राख लई गिरो पनाह में, डुबाए दई सब जहान ॥३४॥
रसूल आए जिन बखत, कंगूरा गिरया बुतखाने का । तब लोगों कहया रसूल का, जाहेर होने का माजजा ॥३५॥
अब देखो माजजा रब आखिरी, सब उठाए सिजदे ठौर । रोसन हुआ दिन अर्स बका, कोई ठौर रही ना सिजदे और ॥३६॥
सिपारे ओगनतीस में, इन विध लिखे कलाम । अर्स बका पर सिजदा, करावसी इमाम ॥३७॥
और आगे बुत बोले हुते, सांचा आखिरी पैगंमर । फुरमान ल्याया हक का, तुम झूठे हो काफर ॥३८॥
अब बेत अल्ला पुकारत, भेजी साहेदी नामे वसीयत । तो भी दुनी ना देखहीं, जो ऐसे सौं खाय लिखे सखत ॥३९॥
मक्के मदीने दीन का, खड़ा था निसान । सो हुआ फुरमाया हक का, करसी दज्जाल कुफरान ॥४०॥
तो जोरा किया दज्जाल ने, लोकों छुड़ाए दिया आकीन । अग्यारै सदी के आखिर, रहया न किन का दीन ॥४१॥
गजब हुआ दुनी पर, खैंच लिया फुरमान । हादी भेजे नामे वसीयत, इत रहया न किनों ईमान ॥४२॥
आए देव फुरमाए हक के, बीच हिंदुस्तान । करो सबों पर अदल, मार दूर करो सैतान ॥४३॥
आया बीच हिंदुअन के, मुसाफ हक हुकम । सो खलक रानी गई, जिन छोड़े हक हादी कदम ॥४४॥
फुरमान दूजा ल्याया सुकदेव, सो ढांप्या था एते दिन । सो प्रगट्या अपने समें पर, हुआ हिंदुओं में रोसन ॥४५॥
परमहंस जाहेर भए, जाहेर धाम धनी अखण्ड । कुली कालिंगा मारिया, मुक्त दई ब्रह्मांड ॥४६॥
झूठ अमल सबे उठे, आए साहेब बीच हिंदुअन । दाभा जाहेर हुई मक्के से, आए हिंद में मेंहेदी मोमिन ॥४७॥
दो बेर डुबाई जहान को, गिरो दो बेर बचाई तोफान । तीसरी बेर दुनी नई कर, आखिर गिरो पर ल्याए फुरमान ॥४८॥
यों अर्स गिरो जाहेर करी, माहें कुरान पुरान । किन पाई न सुध रूहें अर्स की, आप अपनी आए करी पेहेचान ॥४९॥
एही खासी गिरो हादी संग, एही फरदा कयामत । जाहेर देखावे नामे वसीयत, कछू छिपी न रही हकीकत ॥५०॥
सो पेहेचान क्यों कर सके, जो पकड़े पुलसरात । छोड़े न वजूद नासूती, जान बूझ के कटात ॥५१॥
नासूत ऊपर लोक जानत, आसमान सात में मलकूत । तिन पर हवा जुलमत, तिन पर नूर बका जबरूत ॥५२॥
बुजरकी पैगंमरों, पाई जबराईल से । हुए नजीकी हक के, सो सब न्यामत दई इनने ॥५३॥
सो जबराईल जबरूत से, आगे लाहूत में न जवाए । नूरतजल्ला की तजल्ली, पर जलावत ताए ॥५४॥
जबरूत ऊपर अर्स लाहूत, इत महंमद पोंहोंचे हजूर । रद बदल बंदगी वास्ते, करी हकसों आप मजकूर ॥५५॥
ल्याए फुरमान इसारतें इत थें, सो नासूती क्यों समझाए । मारफत अर्स अजीम में, ए पुलसरातें अटकाए ॥५६॥
जाहेर लिखी आदम की, सब औलाद पूजे हवाए । एक महंमद कहे मैं पोहोंचिया, नूर पार सूरत खुदाए ॥५७॥
दुनियां चौदे तबक में, किन सुरिया उलंघी ना जाए । फना तले ला मकान के, ए तिनमें गोते खाए ॥५८॥
हक सूरत किन देखी नहीं, है कैसी सुनी न किन । तरफ न जानी चौदे तबक में, महंमद पोहोंचे ठौर तिन ॥५९॥
करी महंमदें मजकूर तिनसे, सुने हरफ नब्बे हजार । जहूद तिन साहेब को, कहे सुन्य निराकार ॥६०॥
ए भी कहें हक की सूरत नहीं, जो कहावें महंमद के । सोई सब्द सुन पकड़या, आगूं काफर केहेते थे जे ॥६१॥
तो काहे को कहावें महंमद के, जो इतना न करें सहूर । कौल महंमद रद होत है, जो हक सों किया मजकूर ॥६२॥
जासों पाई बुजरकी महंमदें, हक मिले के सुकन । सो सुकन टूटत है, कर देखो दिल रोसन ॥६३॥
काफर न माने हक सूरत, ताको कछू अचरज नांहें । केहेलाए महंमद के पूजें हवा, ए बड़ा जुलम दीन माहें ॥६४॥
कहे महंमद करूं मैं एक दीन, जिन कोई जुदे परत । कुरान माजजा मेरी नबुवत, हुए एक दीन होए साबित ॥६५॥
तुम करत मुझसे दुस्मनी, मैं किया चाहों एक राह । तो जुदे परत कई दीन से, जो दिलों अबलीस पातसाह ॥६६॥
कुरान माजजा नबी नबुवत, साबित हुआ न चाहें । लड़ फिरके जुदे हुए, जो बुजरक कहावें दीन माहें ॥६७॥
आए रसूलें हक जाहेर किया, किया अर्सों का बयान । हौज जोए बाग कई बैठकें, सब हकीकत ल्याया फुरमान ॥६८॥
कहावें फिरके बुजरक, हुए आप में दुस्मन । महंमद मता अर्स बका, लिया जाए न हवा के जन ॥६९॥
जो लों हक सूरत पावें नहीं, तो लो महंमद औरों बराबर । दई कई बुजरकियां, लिखे लाखों पैगंमर ॥७०॥
तब पावें रसूल की बुजरकी, जब पेहेचान होवे हक । हकें मासूक कहया तो भी न समझें, क्या करे आम खलक ॥७१॥
जाहेर राह मारे दुस्मन, अबलीस दिलों पर । जाहेरी इलमें नफा न ले सके, पेहेचान होए क्यों कर ॥७२॥
बका पोहोंच्या एक महंमद, कही जिनकी तीन सूरत । तित और कोई न पोहोंचिया, जो लई इनो बका खिलवत ॥७३॥
देसी हकीकत सब अर्सों की, नूर जमाल सूरत । केहेसी निसबत वाहेदत, रखे न खतरा बीच खिलवत ॥७४॥
सरत करी जो रसूले, सो पोहोंच्या आए बखत। तिन इमाम को न समझे, जिन पे कुंजी कयामत ॥७५॥
बका से आए रूह अल्ला, और महंमद मेंहेंदी इमाम । मैं जो करी मजकूर, सो देसी साहेदी तमाम ॥७६॥
कुरान माजजा नबी नबुवत, दोऊ साबित होवें तब । दज्जाल मार के एक दीन, आए रूह अल्ला करसी जब ॥७७॥
मसी और इमाम, जब देसी मेरी साहेदी । मैं गुझ करी नूर जमाल सों, सो होसी जाहेर बुजरकी ॥७८॥
मैं दुनियां ल्याया जो दीन में, सो मैं देखत हों अब । फिरके होसी मेरे तेहेत्तर, आखिर होएगी तब ॥७९॥
तब ए बुजरक आवसी, साहेब जमाने के । हक करसी हिदायत तिनको, इनों संग नाजी फिरका जे ॥८०॥
हरफ गुझ जो हुकमें, मैं रखे छिपाए। सो अर्स मता हक खिलवत, जाहेर करसी आए ॥८१॥
मता सब मेयराज का, किया अर्स में हकें मजकूर । जो मेहेर हमेसा मुझ पर, सो ए सब करसी जहूर ॥८२॥
और फिरके सब आवसी, और सब पैगंमर । होसी हिसाब सबन का, हाथ हकी सूरत फजर ॥८३॥
ए जाहेर लिख्या फुरमान में, खुलें ना बिना खिताब । गुझ बातून होसी जाहेर, जब हक लेसी हाथ किताब ॥८४॥
हक जाहेर हुए बिना, मेरी बड़ाई जाहेर क्यों होए । कायम सूर ऊगे बिना, क्यों चीन्हे रात में कोए ॥८५॥
अर्स कहया दिल मोमिन, सब अर्स में न्यामत । कहया और दिलों पर अबलीस, अब देखो तफावत ॥८६॥
मोमिन हक बिना कछू ना रखें, करी मुरदार चौदे तबक । महंमदें मोमिनों राह ए दई, ए राह क्यों ले हवाई खलक ॥८७॥
महामत कहे ए मोमिनों, राह बका ल्योगे तुम । जिन का दिल अर्स कहया, औरों ना निकसे मुख दम ॥८८॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥१९०॥
