Kuljam.org

विषय-सूची

खुलासा - प्रकरण ३ | Khulasa prakaran 3

खुलासा मेयराज का

हक हादी रूहन सों, जो किया कौल अव्वल । ए खुलासा मेयराज का, जो रूहों हुई रदबदल ॥१॥

कौल अलस्तो-बे-रब का, किया रूहों सों जब । हक इलम ले देखिए, सोई साइत है अब ॥२॥

तब वले कहया अरवाहों ने, अर्स से उतरते । किया जवाब हक ने, रूहों याद किया चाहिए ए ॥३॥

तुम माहों माहें रहियो साहेद, मैं केहेता हों तुम को । याद राखियो आप में, इत मैं भी साहेद हों ॥४॥

और साहेद किए फरिस्ते, जिन जाओ तुम भूल । फुरमान भेजोंगा तुम पर, हाथ मासूक रसूल ॥५॥

मेयराज हुआ महंमद पर, तोलों हलता है उजू जल । बैठक गरमी ना टरी, बेर ना भई एक पल ॥६॥

दिया निमूना अरवाहों को, एक पलक बेर जान । वले जवाब रूहों कहया, अजूं सोई अवाज बीच कान ॥७॥

उतर आए नासूत में, भूल गए अर्स की । इत पैदा फना के बीच में, जाने हम हमेसगी ॥८॥

अर्स रूहें भूली नासूत में, इनसों हक हादी निसबत । ताए लिख भेज्या फुरमान में, अजूं सोई है साइत ॥९॥

हाए हाए ए समया क्यों न रहया, ए कैसा भोम का बल । तो कहया सिखरा सींग पर, रेहे न सके एक पल ॥१०॥

आए पड़े तिन फरेब में, चौदे तबकों न बका तरफ । फना बीच सब खेलत, कोई बोल्या न बका हरफ ॥११॥

खेल झूठा झूठी रसमें, रूहें गैयां तिनमें मिल । अब सीधा क्यों ए न होवहीं, जो हुकमें फिराया दिल ॥१२॥

कौल किया हकें इनसों, बीच खिलवत रूहों मजकूर । दिया इलम लदुन्नी इनको, ए बीच दरगाह बिलंदी नूर ॥१३॥

देखो बड़ी बड़ाई इनकी, हकें मासूक भेज्या इन पर । भेजी हाथ कुंजी रूह अपनी, और दई अपनी आमर ॥१४॥

हुकम दिया दिल अर्स किया, हकें कहया महंमद मासूक । ए कौल सुन रूह मोमिन, हाए हाए हुए नहीं टूक-टूक ॥१५॥

जो कौल किए बीच खिलवत, हक हादी रूहों मिल । सो क्यों तुमें याद न आवहीं, अर्स में तन तुम असल ॥१६॥

लिखे पहाड़ कर ईसा महंमद, ए निसान आखिर के । हक बका अर्स देखावहीं, दिन जाहेर करसी ए ॥१७॥

लिख्या सूरज मारफत का, होसी जाहेर महंमद से । आई अर्स रूहें गिरो अहमदी, किए जाहेर जबराईलें ॥१८॥

करसी बका अर्स जाहेर, ताके निसान पहाड़ बिलंद । आखिर अपने कौल पर, आए जमाने खावंद ॥१९॥

हक बका का किबला, कहया जाहेर होसी आखिरत । पावें न माएना जाहेरी, मुसाफ माएने इसारत ॥२०॥

हकें बुजरकी वास्ते, लिखी इसारतें पहाड़ कर । सो दुनी पूजे पहाड़ जाहेरी, इनों नाहीं रूह की नजर ॥२१॥

कहे कुरान इन जिमी से, तरफ न पाई अर्स हक । ए तेहेकीक किन ना किया, कई ढूंढ थके बुजरक ॥२२॥

जो बची गिरोह कोहतूर तले, और तोफान किस्ती पर । बेर तीसरी लैलत कदर में, जिन रोज कयामत करी फजर ॥२३॥

सोई गिरो इसलाम की, खेल लैल देख्या दो बेर । तीसरी बेर फजर की, जाके इलमें टाली अंधेर ॥२४॥

सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम । और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखिर गिरोह स्याम ॥२५॥

ए जो पैदा जुलमत से, सो कुंन केहेते उपजे । मगज मुसाफ न पावत, लेत माएने ऊपर के ॥२६॥

कौल हमारे नूर पार के, सो क्यों समझें जुलमत के । कुंन केहेते पैदा हुए, ला मकान के जे ॥२७॥

लैलत कदर में रूहें फरिस्ते, जो अर्स से उतरे। कौल किया हकें जिन सों, सो नूर बानी से समझेंगे ॥२८॥

फना जिमी के बीच में, जाहेरी पहाड़ पूजत । दुनियां नजर फना मिने, अर्स बका न काहूं सूझत ॥२९॥

दिल हकीकी अर्स मोमिन, कहया तिन दिल की भी तरफ नांहें । वाकी इत तरफ क्यों पाइए, दिल रेहेत अर्स तन माहें ॥३०॥

दिल अर्स मोमिन कहया, जामें अमरद सूरत । खिन न छूटे मोमिन से, मेहेबूब की मूरत ॥३१॥

ए जो फजर सूर असराफील, नुकता हुकम बजावत । ले कुफर बैठे पहाड़ से, सो जरे ज्यों उड़ावत ॥३२॥

और कुफर दुनी जो पहाड़ सी, सूर दूजे कायम करत । हकें मेहेर कर मोमिनों पर, बातून माएने लिखत ॥३३॥

फरिस्ता नजीकी बुजरक, किया सब जिमी सिजदा जिन । दई लानत न किया सिजदा, रद किया वास्ते मोमिन ॥३४॥

दिल मोमिन अर्स कहया, ए जो असल अर्स में तन । ए लिख्या फुरमान में जाहेर, पर किया न बेवरा किन ॥३५॥

औलिया लिल्ला रूहें मोमिन, बोहोत नाम धरे उमत । ए सब बड़ाई गिरो एक की, जो अर्स रूहें हक निसबत ॥३६॥

हकें कलाम लिखे अपने, कहे मैं भेजे मोमिनों पर । सो फिरका खोले इसारतें रमूजें, बिन मोमिन न कोई कादर ॥३७॥

हकें लिख्या मैं करूँ हिदायत, एक नाजी फिरके को । हुआ हजूर ले हक इलम, जले बहत्तर दोजख मों ॥३८॥

लिखियां सब बड़ाइयां, तिन सब सिर हक हुकम । सो सब आमर दई हाथ रूहन, इनों दिल अर्स कर बैठे खसम ॥३९॥

और दिल हकीकी अर्स मोमिन, हके दिल अर्स कहया इन । दिल मजाजी गोस्त टुकड़ा, और ऊपर कहया दुस्मन ॥४०॥

दुनियां दिल मजाजी अवलीस, दिल हकीकी पर हक । एक गिरो दिल अर्स कही, सोई अर्स रूहें बुजरक ॥४१॥

रूह की नजरों पाइए, जो हक के नजीकी । सो बैठे अपने मरातबे, देवे हक कलाम साहेदी ॥४२॥

बड़ा फरिस्ता मलकूत का, जाए सके ना जबरूत जित । सुनने हकीकत कुरान की, रखता नहीं ताकत ॥४३॥

मलकूत जबरूत लाहूत, ए अर्स कर तीनों लिखे । मलकूत फना बीच में, जबरूत लाहूत बका ए ॥४४॥

नूर मकान जबरूत जो, पोहोंच्या जबराईल जित । अर्स अजीम जो लाहूत, हक हादी रूहें बसत ॥४५॥

आगूं जबराईल जाए ना सक्‍या, वाकी हद जबरूत । पोहोंच्या न ठौर रूहन के, जित नूर बिलंद लाहूत ॥४६॥

हक हादी रूहें रूहअल्ला, ए बीच अर्स वाहेदत । करे इलम लदुन्नी बेवरा, इत और न कोई पोहोंचत ॥४७॥

वाहेदत निसबत अर्स की, जब जाहेर हुई खिलवत । ए सुकन सुन मोमिन, दिल लेसी अर्स लज्जत ॥४८॥

ए बीच हमेसा खिलवत के, इनको हक मारफत । वाहेदत एही केहेलावहीं, बीच अर्स अजीम उमत ॥४९॥

बीच मेयराज इसारतें, मासूक लिख भेजत । हाँसी करने रूहन पर, ए जो फरेब देखाया इत ॥५०॥

हक अर्स नजीक सेहेरग से, दोऊ हादी खोले द्वार । बैठाए अर्स अजीम में, जो कहया मेयराजें नूर पार ॥५१॥

किन तरफ न पाई अर्स हक की, मांहें चौदे तबक । सो खोल दिए पट हादिएँ, इलम ईसे के बेसक ॥५२॥

देखो मरातबा मोमिनों, बोलें न मेयराज बिन । जो हकें हरफ छिपे रखे, वास्ते अर्स रूहन ॥५३॥

मेयराज में जो इसारतें, हक इलमें खोलें मोमिन । कहें गुझ छिपा दिल हक का, कोई ना कादर या बिन ॥५४॥

कई जोर किया जबराईलें, आया एक कदम महंमद खातिर । तो भी आगूँ आए न सक्या, कहे जलें मेरे पर ॥५५॥

चढ़ उतर के देखाइया, वास्ते राह मोमिन । जो रूहें उतरी लैलत कदर में, सो चढ़ जाएंगे अर्स वतन ॥५६॥

इसारतें मेयराज में, जो लिख भेजियां हक । सो खोलें हम इसारतें, पढ़ायल रूह अल्ला के बेसक ॥५७॥

कहया मीठा दरिया उजला, जो देख्या नबी नजर। तिन किनारे दरखत, जित बैठा जानवर ॥५८॥

अन्दर मुरग जो कहया, बैठा हुकम के दरखत । इत ना पोहोंच्या जबराईल, सो मोमिन खोले मारफत ॥५९॥

चुटकी खाक ले चोंच में, मुरग बैठा दरखत पर । पर ना जलें इन मुरग के, सो कोई देवे एह खबर ॥६०॥

हादीएँ पूछा हक से, क्यों खाक धरी चोंच में । खेल उमतें मांगिया, गुनाह वजूद हुआ तिनसे ॥६१॥

लिख्या दरिया नींद इसारतें, जो देखाई कर मेहेरबानगी । मोहे रूह अल्ला पट खोलिया, दई महंमदें मेयराज में साहेदी ॥६२॥

ए जो मुरग मेयराज में अंदर, हर साइत यों केहेता था । जो छोडूं खाक चोंच से, तो दरिया होए जाए अंधेरा ॥६३॥

दरिया उजला दूध सा, मेहेर मीठा मिश्री । ए दरिया कबूं न होए अंधेरा, ए हकें रूहों पर मेहेर करी ॥६४॥

कहया खाक वजूद नासूती, हादी बैठा वजूद धर । दुनी दरिया अंधेरी, हादी चले ना होए क्यों कर ॥६५॥

हकें देखाया दरिया मेहेर का, सो अंधेरा क्यों ए ना होए । करसी कायम चौदे तबक, बरकत हादी रूहों सोए ॥६६॥

नूर तजल्ला बीच में, हक हादी रूहों खिलवत । हक से हादी रूहें नूर में, ए अर्स असल वाहेदत ॥६७॥

नूर तजल्ला बीच में, लिख्या गुनाह पोहोंच्या रूहन । जित आए न सक्या जबराईल, इत असल मोमिनों तन ॥६८॥

लिया हाथ हिसाब याही वास्ते, हक रूहों पर हाँसी करत । हक हादी रूहें रूह अल्ला, होसी हाँसी इन खिलवत ॥६९॥

मोतिन के मुंह ऊपर, कुलफ लिख्या मांहें फुरमान । इन गुन्हेगारों के दिल को, अपना अर्स कर बैठे मेहेरबान ॥७०॥

सो कुलफ कहया फरामोस का, कहया गुनाह रूहों का दिल । खेल मांग्या फरामोस का, कर एक दिल सब मिल ॥७१॥

फरामोस गुनाह दिल मोमिनों, सोई कुलफ गुनाह इनों दिल । याकी कुंजी दिल महंमद, सो टाले फरामोसी दे अकल ॥७२॥

कहे महंमद सुनो मोमिनों, ए उमी मेरे यार । छोड़ दुनी ल्‍यो अर्स को, जो अपना वतन नूर पार ॥७३॥

हम बंदे रूहें इन दरगाह, कहया अर्स दिल मोमिन । यारों बुलावें महंमद, करो सिजदा हजूर अर्स तन ॥७४॥

॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥२६४॥

इसी सन्दर्भ में देखें-