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खुलासा - प्रकरण ४ | Khulasa prakaran 4

खुलासा इसलाम का

असल खुलासा इसलाम का, सब राह करत रोसन । झूठ से सांच जुदा कर, देसी आखिर सुख सबन ॥१॥

मगज मुसाफ और हदीसें, हादी हिदायत देखें मोमिन । ए खुलासा बिने इसलाम का, सबों देखावे बका वतन ॥२॥

बका फना का बेवरा, पाया मगज सबका ए । हादी रूहें अर्स से इजने, लैलत कदर में उतरे ॥३॥

हकें कहया अलस्तो-बे-रब-कुंम, कालू बले कहया रूहन । खेल देख मुंह फेरोगे, न मानोगे रसूल सुकन ॥४॥

भी फुरमाया तुम भूलोगे, साहेद किए रूहें फरिस्ते । मैं तुम में साहेद तुम दीजियो, आप अपनी उमत के ॥५॥

चौथे आसमान लाहूत में, रूहें बैठी बारे हजार । इन तसबी से पैदा होत हैं, फरिस्तों का सिरदार ॥६॥

रूहें रहें दरगाह बीच में, प्यारी परवरदिगार । खासलखास कही इनको, सिफत न आवे माहें सुमार ॥७॥

उमत मेला महंमद का, इनकी काहूँ ना पेहेचान । ना होए खुले बातून बिना, मारफत हक फुरमान ॥८॥

ए बात नहीं अटकल की, होए साबित खुलें हकीकत । बूझे दीन महंमद का, हक हादी रूहें निसबत ॥९॥

इन महंमद के दीन में, सक सुभे जरा नाहें । सो हकें दिया इलम अपना, ए सिफत होए न इन जुबांए ॥१०॥

मासूक महंमद तो कहया, बहस हुआ वास्ते इस्क । और कलाम अल्ला में कहया, आसिक नाम है हक ॥११॥

मूल मेला महंमद रूहों का, सो कोई जानत नाहें । ए जाने हक हादी रूहें, अर्स बका के मांहें ॥१२॥

सुंनत जमात याको कहे, और कहया दीन उमत । महंमद की गिरो मिने, सक न सुभे इत॥१३॥

सक सुभे सब सरीयतों, यों कहे हदीस फुरमान । कोई जाने ना हक तरफ को, ए अर्स रूहें पेहेचान ॥१४॥

दूजा ढिग वाहेदत के, आए न सके कोए । आगे ही जल जात है, बका न देखे सोए ॥१५॥

जो देख न सक्या जबराईल, तो क्यों कहूं औरन । ए हक खिलवत महंमद रूहें, सो जाने बका बातन ॥१६॥

ए खेल हुआ वास्ते महंमद, महंमद आया वास्ते रूहन । रूहअल्ला इलम ल्याए इनों पर, ए सब हुआ वास्ते मोमिन ॥१७॥

इनों तन असल अर्स में, तीन बेर उतरे मांहें लैल । ए जाहेर लिख्या फुरमान में, ए हकें देखाया खेल ॥१८॥

रूहें आइयां खेल देखने, आए महंमद मेंहेंदी देखावन । तीनों हादी खेल देखाए के, दोऊ गिरो ले आवे वतन ॥१९॥

रूहें खेल देखे वास्ते, भिस्त दई सबन । द्वार खोल मारफत के, करसी जाहेर हक बका दिन ॥२०॥

रूहें उतरी नूर बिलंद से, खलक पैदा जुलमत । दुनी दिल अबलीस कहया, दिल मोमिन हक वाहेदत ॥२१॥

दिल मजाजी दुनी का, मोमिन हकीकी दिल । हक हादी रूहें निसबत, कही अबलीस दुनी नसल ॥२२॥

तीन जिनस पैदा कही, ताके जुदे कहे ठौर तीन । करे तीनों को हिदायत महंमद, याको बूझसी महंमद दीन ॥२३॥

ए ले खुलासा मोमिन, बका राह इसलाम । ए मेहेर मुतलक हक से, करत जाहेर अल्ला कलाम ॥२४॥

बिने सब की बताइए, ज्यों होए सब पेहेचान । दीजे साहेदी मुसाफ की, ज्यों होए ना सके मुनकर जहान ॥२५॥

जो पैदा जिन ठौर से, तिन सोई देखाइए असल । हुकम चले जित हक का, तित होए ना चल विचल ॥२६॥

पांच बिने कही मुस्लिम की, जिन लई सरीयत । कलमा निमाज रोजा कहया, और जगात हज जारत ॥२७॥

जुबांन से कलमा केहेना, सिर फरज रोजा निमाज । जगात हिस्सा चालीसमा, कर सके न हज इलाज ॥२८॥

परहेज करे बदफैल से, बिने पांचों से पाक होए । सो आग न जले दोजख की, पावे भिस्त तीसरी सोए ॥२९॥

कोई पांच बिने की दस करो, पालो अरकान लग आखिर । पर अर्स बका हक का, दिल होए न मोमिन बिगर ॥३०॥

जो पांच बिने न करे, सो नाहीं मुसलमान । इन की बिने फैल नासूती, ए लिख्या माहें फुरमान ॥३१॥

एक कुरान का माजजा, दूजी नबी की नबुवत । एक दीन जब होएसी, कहया तब होसी साबित ॥३२॥

हादी किया चाहे एक दीन, ए कौल तोड़ जुदे जात । सो क्यों बचे दोजख से, जाए छोड़े ना पुलसरात ॥३३॥

कहे महंमद मिस्कात में, दुनी दिल पर सैतान । वजूद होसी आदमी, होसी फिरकों ए ईमान ॥३४॥

पर मैं डरों इमामों से, करसी गुमराह ऐसी उमत । करसी लड़ाई आप में, छूटे न लग कयामत ॥३५॥

तो भए तेहत्तर फिरके महंमद के, तामें एक नाजी कहया नेक । और बहत्तर कहे दोजखी, ए बेवरा कहया विवेक ॥३६॥

करी हकें हिदायत नाजी को, ए लिख्या मांहें फुरमान । इन बीच फिरके सब आवसी, एक दीन होसी सब जहान ॥३७॥

सरीयत खूबी नासूत में, याको ए पांचों पाक करत । ए जाहेर पांच बिने से, ऊंचे चढ़ न सकत ॥३८॥

छोड़ सरा ले तरीकत, पीठ देवे नासूत । फैल करे तरीकत के, सो पोहोंचे मलकूत ॥३९॥

कलमा निमाज दोऊ दिल से, और दिल सों रोजे रमजान । दे जगात हिस्सा उन्तालीसमा, हज करे रसूल मकान ॥४०॥

कहया दिल दुनी का मजाजी, जो पैदा हुआ केहेते कुंन । सो छोड़ ना सके मलकूत को, आड़ी जुलमत हवा ला सुंन ॥४१॥

दुनियां दिल कहया मजाजी, सो टुकड़ा गोस्त का । अबलीस कहया दुनी नसलें, सोई दिलों इनों पातसाह ॥४२॥

आदम औलाद दिल अबलीस, बैठा पातसाह दुस्मन होए । कहया हवा खुदाए इन का, उलंघ जाए क्यों सोए ॥४३॥

जबराईल महंमद हिमायतें, तो भी छोड़ न सक्या असल । तो दुनियां जो तिलसम की, सो क्यों सके आगे चल ॥४४॥

जेती दुनी भई कुंन से, हवा तिनसे ना छूटत । सो क्यों छोड़े ठौर अपनी, कही असल जिनों जुलमत ॥४५॥

जो उतरे मलायक लैल में, ताको असल नूर मकान । सो राह हकीकत लिए बिना, उत पोहोंचे नहीं निदान ॥४६॥

कलमा निमाज रोजा हकीकी, करे दिल सों रूह पेहेचान । हुआ बंदा बूझ जगात में, दिल दीदार नूर सुभान ॥४७॥

मलकूत हवा जुलमत, उलंघ जाना तिन पर । बिना हादी हिदायत, सो बका पावे क्यों कर ॥४८॥

जिनों हक हकीकत देवहीं, सो छोड़े हवा मलकूत । दिल साफ जिकर रूहानी, ले पोहोंचावे जबरूत ॥४९॥

जो फरिस्ता जबरूत का, सो रेहे ना सके मलकूत । मलकूत बीच फना के, नूर मकान बका जबरूत ॥५०॥

बड़ा फरिस्ता नजीकी, जाको रूहल अमीन नाम । जुलमत हवा तो उलंघी, जबरूत इन मुकाम ॥५१॥

पाई बड़ाई पैगंमरों, हाथ जबराईल सबन। सो जबराईल न पोहोंचिया, मकान महंमद मोमिन ॥५२॥

सो जबराईल जबरूत से, लाहूत न पोहोंच्या क्यों ए कर । हिमायत लई महंमद की, तो भी कहे जलें मेरे पर ॥५३॥

तन मोमिन असल अर्स में, जो अर्स अजीम बका हक । जित पोहोंच्या नहीं जबराईल, तित क्या कहूं औरों खलक ॥५४॥

हक हादी रूहें लाहूत में, ए महंमद रूहों वतन । इस्क हकीकत मारफत, तो हक अर्स दिल मोमिन ॥५५॥

मारफत हक हकीकत, अर्स रूहों को दई हक । जो इलम दिया हकें अपना, तामें जरा न सक ॥५६॥

कही रूहें नूर बिलंद से, मांहें उतरी लैलत कदर । कौल किया हकें इनों सों, मासूक आया इनों खातिर ॥५७॥

ए राह इसलाम मोमिनों, चढ़ उतर देखाई रसूल । आई तीन सूरतें इन वास्ते, जाने रूहें जावें जिन भूल ॥५८॥

इन वास्ते भेजी रूह अपनी, अर्स कुंजी हाथ दे । दे खिताब इमाम को, अर्स पट खोले इन वास्ते ॥५९॥

असराफील जबराईल, भेज दिया आमर । निगहबानी कीजियो, मेरे खासे बंदों पर ॥६०॥

इलम लदुन्नी भेजिया, सब करने बका पेहेचान । आप काजी हुए इन वास्ते, करी खिलवत जाहेर सुभान ॥६१॥

हक कहे मुख अपने, मैं रूहें राखी कबाए तले । कोई और न बूझे इनको, मेरी वाहेदत के हैं ए ॥६२॥

मेरी कदीम दोस्ती इनों से, दोस्ती पीछे इन । ए इलम लदुन्नी से माएने, करे हादी बीच रूहन ॥६३॥

अर्स दिल इनका कहया, और कहया हकीकी दिल । एती बड़ाई इनको दई, जो वाहेदत इनों असल ॥६४॥

ए अर्स बड़ा रूहों का, जो कहया तजल्ला नूर । जबराईल इत न आइया, जित महंमद किया मजकूर ॥६५॥

हरफ केतेक कराए जाहेर, केतेक हुकमें रखे छिपाए । सो वास्ते रूहों दाखले, अब हादी देत मिलाए ॥६६॥

कही पाँच बिने मुस्लिम की, सोई पाँच बिने मोमिन । वे करें बीच फना के, ए पांच बका बातन ॥६७॥

अर्स रूहें बंदे हमेसगी, इनों बिने सब इस्क । हकीकत मारफत मुतलक, इन उरफान मेहेर हक ॥६८॥

चौदे तबक की जहान में, किन तरफ न पाई अर्स हक । सो किया अर्स दिल मोमिनों, ए निसबत मेहेर मुतलक ॥६९॥

हक नूर रूह महंमद, रूहें महंमद अंग नूर । ए हमेसा वाहेदत में, तो सब मुख ए मजकूर ॥७०॥

मोमिन आए इत थें ख्वाब में, अर्स में इनों असल । हुकम करे जैसा हजूर, तैसा होत मांहें नकल ॥७१॥

जो मोमिन बिने पाँच अर्स में, सो होत बंदगी बातन । जिन बिध होत हजूर, सो करत अर्स दिल मोमिन ॥७२॥

दिल अर्स हकीकी तो कहया, जो हक कदम तले तन । रसूल उमती उमती तो कहे, जो हक खिलवत बीच रूहन ॥७३॥

महामत कहे ए मोमिनों, हकें मेहेर करी तुम पर । भुलाए तुमें हाँसीय को, वास्ते इस्क खातिर ॥७४॥

॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥३३८॥

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