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खुलासा - प्रकरण ५ | Khulasa prakaran 5

भिस्त सिफायत का बेवरा

मोमिन आए अर्स अजीम से, हमारी हक सों निसबत । दिया इलम लदुन्नी हकने, आई हक बका न्यामत ॥१॥

हक इलम एही पेहेचान, कछू छिपा रहेना ताए । अर्स बका रूहें फरिस्ते, सब हद्दां देवें बताए ॥२॥

कहूँ नेक दुनी का बेवरा, जो हकें दई पेहेचान । रूह अल्ला महंमद मेहेर थें, कहूँ ले माएने फुरमान ॥३॥

ए जो हुई पैदा कुंन से, सबों सिर फरज सरीयत । पोहोंचे मलकूत हवा लग, जो लेवे राह तरीकत ॥४॥

जो लग्या वजूद को, ताए छूटे न जिमी नासूत । पुलसरात को छोड़ के, क्यों पोहोंचे मलकूत ॥५॥

ए आम खलक जो आदमी, या देव या जिन । सो राह चलें ले वजूद को, पावें नहीं बातन ॥६॥

जो होवे नूर मकान का, कायम जिनों वतन । सो क्यों पकड़े वजूद को, पोहोंचे न हकीकत बिन ॥७॥

जो होवे अर्स अजीम की, सो ले हकीकत मारफत । इनको इस्क मुतलक, जिन रूह हक निसबत ॥८॥

रूहें फरिस्ते दो गिरो, तिन दोऊ के दो मकान । एक इस्क दूजी बंदगी, राह लेसी अपनी पेहेचान ॥९॥

उतरी रूहें फरिस्ते लैल में, अपने रब के इजन । दे हुकमें सबों सलामती, आप पोहोंचे फजर वतन ॥१०॥

भिस्त हाल चार कुरान में, कहया आठ होसी आखिर । ए भी सुनो तुम बेवरा, देखो मोमिनों सहूर कर ॥११॥

तिन भिस्त हाल चार का बेवरा, एक मलकूती भिस्त । दो भिस्त अव्वल लैल में, चौथी महंमद आए जित ॥१२॥

आखिर भिस्तों का बेवरा, जो नैयां होसी चार । जो होसी बखत कयामत के, तिनका कहूं निरवार ॥१३॥

भिस्त अव्वल रूहों अक्स, ए जो होसी भिस्त नई । भिस्त होसी दूजी फरिस्तों, जो गिरो जबरूत से कही ॥१४॥

पैगंमरों भिस्‍त तीसरी, जिनों दिए हक पैगाम । चौथी भिस्त जो होएसी, पावे खलक जो आम ॥१५॥

जिन किन राह हक की, लई सांच से सरीयत । भिस्त होसी तिनों तीसरी, सच्चे ना जलें कयामत ॥१६॥

जो सरीयत पकड़ के, चल्या नहीं सांच ले । सो आखिर दोजख जल के, भिस्त चौथी पावे ए ॥१७॥

रूहों अक्स कहे नई भिस्त में, ताए असल रूहों के तन । सो अरवा अर्स अजीम में, उठें अपने बका वतन ॥१८॥

जोलों अपनी राह पावें नहीं, तोलों पोहोंचे ना अपने मकान । हादी हद्दों हिदायत करके, आखिर पोहोंचावें निदान ॥१९॥

अब कहूँ सिफायत की, जो आखिर महंमद की चाहे । नेक सुनो सो बेवरा, देऊँ रूहों को बताए ॥२०॥

जित पोहोंची सिफायत महंमद की, सो तबहीं दुनी को पीठ दे । सो पोहोंच्या महंमद सूरत को, आखिर तीसरी हकी जे ॥२१॥

जिन छोड़ दुनी को ना लई, हकीकत मारफत । सो अर्स बका में न आइया, लई ना महंमद सिफायत ॥२२॥

जो दुनी को लग रहे, ताए अर्स बका सुध नाहें । महंमद सिफायत लई मोमिनों, जाकी रूह बका अर्स माहें ॥२३॥

अर्स ल्‍यो या दुनियां, दोऊ पाइए ना एक ठौर । हक खोया झूठ बदले, सुन्या न महंमद सोर ॥२४॥

दुनी अपनी दानाई से, लेने चाहे दोए । फरेब देने चाहे हक को, सो गए प्यारी उमर खोए ॥२५॥

सो मोमिन क्यों कर कहिए, जिन लई ना हकीकत । छोड़ दुनी को ले ना सक्या, हक बका मारफत ॥२६॥

चौदे तबक नबी के नूर से, सो सब कहें हम मोमिन । सो मोमिन जाको सक नहीं, हक बका अर्स रोसन ॥२७॥

सब खोजें फिरके ले किताबें, कहें खड़े हम तले कदम । ले हकीकत पोहोंचे अर्स में, जिन सिर लिया महंमद हुकम ॥२८॥

पोहोंची सिफायत जिनको, तिन छोड़ी दुनियां मुतलक । कदम पर कदम धरे, पोहोंच्या बका अर्स हक ॥२९॥

हकीकत मारफत की, हक बातें बारीक । जित नहीं सिफायत महंमद की, सो लरे लीक ले लीक ॥३०॥

तरक करे सब दुनी को, कछू रखे ना हक बिन । वजूद को भी मह करे, ए महंमद सिफायत मोमिन ॥३१॥

कहे महंमद खबर जो मुझको, सो खबर मेरे भाई । धरे आवें कदमों कदम, जिनकी पेसानी में रोसनाई ॥३२॥

महंमद एही सिफायत, अर्स बका हक रोसन । जो अर्स अरवाहों को सक रहे, सो क्यों कहिए रूह मोमिन ॥३३॥

जाए पूछो मोमिन को, जरे जरे बका की बात । देखो अर्स अरवाहों में, ए महंमद की सिफात ॥३४॥

किन बिध रूहें लाहूती, क्यों जबरूती फरिस्ते । जिन लई सिफायत महंमद की, सो बताए देवें सब ए ॥३५॥

इलम खुदाई लदुन्नी, सब अर्सों की सुध तिन । एक जरे की सक नहीं, लई सिफायत हादी जिन ॥३६॥

अर्स रूहें सब बिध जानहीं, हौज जोए जिमी जानवर । महंमद की सिफायत से, मोमिनों सब खबर ॥३७॥

जोए निकसी किन ठौर से, क्यों कर आगे चली। अर्स आगे आई कितनी, जाए कर कहां मिली ॥३८॥

क्यों कर हकीकत हौज की, क्यों घाट पाल गिरदवाए । किन विध टापू बीच में, ए सब सुध मोमिन देवें बताए ॥३९॥

जोए अर्स के किस तरफ है, किस तरफ हौज अर्स के । नूर अर्स की गलियां, अरस अरवा जानें ए ॥४०॥

बारीक गलियां अर्स की, मोमिन भूलें न इत । अरवा अर्स की रात दिन, याही में खेलत ॥४१॥

जाको सिफायत महंमद की, तिन का एही निसान । जोए हौज अर्स जिमीय की, एक जरा न बिना पेहेचान ॥४२॥

नूर तजल्‍ला नूर की, जिमी बाग जानवर । महंमद सिफायत जिनको, तिन से छिपी रहे क्यों कर ॥४३॥

महंमद हक के नूर से, रूहें अंग महंमद नूर । सो देखो अर्स अरवाहों में, पोहोंच्या महंमद का जहूर ॥४४॥

हक हादी रूहन सों, इत खेलें माहें मोहोलन । ए रहे हमेसा अर्स में, हौज जोए बागन ॥४५॥

मेवे चाहिए सो लीजिए, फल फूल मूल पात । तित रहया तैसा ही बन्या, ए बका बागों की बात ॥४६॥

एक बाल न खिरे पसुअन का, न गिरे पंखी का पर । कोई मोहोल न कबूं पुराना, दिन दिन खूबतर ॥४७॥

इत नया न पुराना, न कम ज्यादा होए । इत वाहेदत में दूसरा, कबहूं न कहिए कोए ॥४८॥

महामत सिफायत जिन लई, सो इत हुए खबरदार । हक बका अर्स सबका, तिन इतहीं पाया दीदार ॥४९॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥३८७॥

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