खुलासा - प्रकरण ८ | Khulasa prakaran 8
रूहों की बिने देखियो
जो उमत होवे अर्स की, सो नीके विचारो दिल । बिने अपनी देख के, करो फैल देख मिसल ॥१॥
कैसा साहेब है अपना, और कैसा अपना वतन । कैसो अपनो वजूद है, जो असल रूहों के तन ॥२॥
तुम सबे जानत हो, तुमको कही खबर । ऐसी बात तुमारी बुजरक, सो भूल जात क्यों कर ॥३॥
कैसी बात दिल पैदा करी, जिनसे मांग्या खेल ए । सो कैसा खेल ए किया, ए देखत हो तुम जे ॥४॥
दुनियां कैसी पैदा करी, ए जो चौदे तबक । तिन सबों यों जानिया, किनों न पाया हक ॥५॥
खोज खोज के सब थके, कई कहावें फिरके बुजरक । पर तिन सारों ने यों कहया, गई न हमारी सक ॥६॥
और खावंद जो खेल के, जाको दुनियां सब पूजत । सो कहे हमों न पाइया, हक क्यों कर है कित ॥७॥
हम रूहें भी आइयाँ इन खेल में, सो गैयां माहें भूल । सुध ना बिरानी आपनी, भया ऐसा हमारा सूल ॥८॥
इनमें फुरमान ल्याया रसूल, देने अपनी खबर आप । फुरमान कोई ना खोल सके, जाथें होए हक मिलाप ॥९॥
फुरमान एक दूसरा, सुकजी ल्याए भागवत । ए खोल सके न त्रैगुन, यामें हमारी हकीकत ॥१०॥
कुंजी ल्याए रूहअल्ला, जासों पावें सब फल । ज्यों कर ताला खोलिए, सो जाने न कोई कल ॥११॥
सो कुंजी साहेब ने, मेरे हाथ दई । जिन बिध ताला खोलिए, सो सब हकीकत कही ॥१२॥
सक परदा कोई न रहया, सब विध दई समझाए । कहे खोल दे अर्स रूहों को, ए मिलसी तुझे आए ॥१३॥
अब देखो दिल विचार के, कैसी बुजरक बात है तुम । कैसा खेल तुम देखिया, कई विध देखाई हुकम ॥१४॥
चीन्हो इन खसम को, चीन्हो बका वतन । और चीन्हो तुम आपको, देखो फैल करत विध किन ॥१५॥
फुरमान भेज्या किन ने, ल्याए ऊपर किन । कौन लेके आइया, मांहें क्या खजाना धन ॥१६॥
कौन ल्याया कुंजीय को, है कुंजी में क्या विचार । किन ने ताला खोलिया, खोल्या कौन सा द्वार ॥१७॥
क्या है इन दरबार में, दई कहां की सुध । सुध बका सारी नीके लेओ, विचारो आतम बुध ॥१८॥
ए खेल किनने किया, तुम रूहें भेजी किन । कुंजी कुलफ गिरो आपको, दिल दे देखो रोसन ॥१९॥
एह विचार किए बिना, जो करत हैं फैल हाल । जब होसी मिलावा जाहेर, तब तिनका कौन हवाल ॥२०॥
फरामोसी तुमें किन दई, अब तुमको कौन जगाए । इन बातों नींद क्यों रहें, जो होवे अर्स अरवाए ॥२१॥
मोमिन काफर दो कहे, तिन की एह तफावत । ए चोट काफरों न लगे, मोमिनों छेद निकसत ॥२२॥
महामत कहे ए मोमिनों, क्यों न विचारो तुम । कई बिध तुम वास्ते करी, क्यों भूलो इन खसम ॥२३॥
॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥४५८॥
