खुलासा - प्रकरण ९ | Khulasa prakaran 9
नूर नूरतजल्ला की पेहेचान
बुलाइयां निसबत जान के, देखो मेहेर हक की ए । हाए हाए तो भी इस्क न आवत, अरवा अर्स की जे ॥१॥
ए मेहेर भई मोमिनों पर, समझत नाहीं कोए । सो कोई तो समझे, जो पेहेचान हक की होए ॥२॥
खावंद अर्स अजीम का, सो कहूं नेक हकीकत । इन हक बका से मोमिन, रखते हैं निसबत ॥३॥
बका अव्वल से अबलो, किन किया न जाहेर सुभान । नेक कहूं सो बेवरा, ज्यों होए हक पेहेचान ॥४॥
तबक चौदे मलकूृत से, ऐसे पलथें कई पैदास । ऐसी बुजरक कुदरत, नूरजलाल के पास ॥५॥
ऐसे पल में पैदा करे, पल में करे फनाए । ऐसा बल रखे कुदरत, नूरजलाल के ॥६॥
इनमें कोई कायम करें, जो दिल आए चढ़त । सो इंड सारा नूर में, जो दिल दीदों देखत ॥७॥
कायम होत जो नूर से, सो आवे न सब्द माहें । तो रोसनी नूरमकान की, क्यों आवे इन जुबांए ॥८॥
जब थक रही जुबां इतहीं, ए जो नूरें किया ख्याल । तो आगे जुबां क्यों कर कहे, बल सिफत नूरजलाल ॥९॥
ए बल नूर-जलाल को, जिन की एह कुदरत । एह जुबां ना केहे सके, बुजरक बल सिफत ॥१०॥
सो नूर नूरजमाल के, दायम आवें दीदार । ए जुबां अर्स अजीम की, क्यों कहे सिफत सुमार ॥११॥
नूर-जलाल की सिफत को, जुबां ना पोहोंचत । तो नूरजमाल की सिफत को, क्यों कर पोहोंचे तित ॥१२॥
जुबां थकी बल नूर के, ऐसी सिफत कमाल । तो इत आगूं जुबां क्यों कर कहे, बल सिफत नूरजमाल ॥१३॥
जित चल न सके जबराईल, कहे मेरे पर जलत । नूरतजल्ला की तजल्ली, ए जोत सेहे न सकत ॥१४॥
जाके नूर की ए रोसनी, ऐसी करी सिफत । तिन का असल जो बातून, सो कैसी होसी सूरत ॥१५॥
ऐसी खूबी सोभा सुन्दर, जो सांची सूरत हक । नामै आसिक इन का, सब पर ए बुजरक ॥१६॥
ए जो सब कहियत है, हक बिना कछु ए बात । सो सब नूर की कुदरत, जो उपज फना हो जात ॥१७॥
पाइए इनसे बुजरकी, जो असल कहया एक । खास रूहें याकी जात हैं, ए रूहअल्ला जाने विवेक ॥१८॥
आसिक तो भी एह है, और मासूक तो भी एह । खूबी सोभा सब इनकी, प्यारा प्रेम सनेह ॥१९॥
मेहेरबान भी एह है, दाता न कोई या बिन । हक बंदगी सिवाए जो कछू कहया, सो सब तले इजन ॥२०॥
अब कहूं इन रूहन को, जो खड़ियां तले कदम । तुम क्यों न विचारो रूहसों, ऐसा अपना खसम ॥२१॥
इन का बिछोहा सुन के, आपन रहत क्यों कर । फिराक न आवत हमको, याद कर ऐसा घर ॥२२॥
आराम इस्क इन वतन का, हक का सुन्या आपन । अजहूँ न विरहा आवत, सुन के एह वचन ॥२३॥
ऐसा कदीमी वतन, ऐसा इस्क आराम । ऐसी मेहेरबानगी गिरो को, सुख देत हैं आठों जाम ॥२४॥
ऐसा हक जो कादर, सब विध काम पूरन । ए सुन इस्क न आवत, तो कैसे हम मोमिन ॥२५॥
ए जो सुकन हक के मैं कहे, तामें जरा न रही सक । ए सुन के विरहा न आवत, सो ना इन घर माफक ॥२६॥
यों चाहिए रूहन को, सुनते बिछोहा पिउ । करते याद जो हक को, तबहीं निकस जाए जिउ ॥२७॥
फिराक सुनते हक की, वजूद पकड़े क्यों इत । जो रूह असल वतन की, ए नहीं तिन की सिफत ॥२८॥
खूबी खुसाली बुजरकी, सोभा सिफत मेहेरबान । इस्क प्रेम वतन का, कायम सुख सुभान ॥२९॥
कहूँ प्यार कर मोमिनों, दिल दे सुनियो तुम । अरवा क्यों न उड़ावत, समझ हक इलम ॥३०॥
कुदरत से पाइयत हैं, बुजरकी कादर । सिफत लिखी दोऊ ठौर की, आवत न काहूँ नजर ॥३१॥
तिन हकें मोमिन दिल को, अपना कहया अर्स । कहया तुम भी उतरे अर्स से, यों दई सोभा अरस-परस ॥३२॥
ए खावंद काहूँ न पाइया, खोज खोज थके सब मिल । चौदे तबक की दुनी की, पोहोंचे ना फहम अकल ॥३३॥
सो हादी देखावत जाहेर, अर्स खुदा का जे । चौदे तबक चारों तरफों, सेहेरग से नजीक ए ॥३४॥
हाँसी करी अति बड़ी, हक आए तेहेकीक । चौदे तबकों में नहीं, सो देखाए दिया नजीक ॥३५॥
महामत कहे हँसे हक, देख मोमिनों हाल । आखिर बुलाए चलें वतन, करके इत खुसाल ॥३६॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥४९४॥
