किरन्तन - प्रकरण १०
राग श्री केदारो
सुनो भाई संतो कहूं रे महंतो, तुम अखंड मंडल जान पाया । वैष्णव बानी पूछों गुर ग्यानी, ऐसा अंधेर धंधा क्यों ल्याया ॥१॥
जिन गोकुल को तुम अखंड कहत हो, सो तुमारी दृष्टें न आया । सुकजी के वचन में प्रगट लिख्या है, पर तुमको किने न बताया ॥२॥
जाको तुम सतगुर कर सेवो, ताको इतनी पूछो खबर । ए संसार छोड़ चलेंगे आपन, तब कहां है अपनों घर ॥३॥
सब्द की वस्त सो तो महाप्रले लीनी, और ठौर बताओ मोही । जाको सुध न आप और घर की, क्यों पार पावेगा सोई ॥४॥
कोई आप बड़ाई अपने मुख थें, करो सो लाख हजार । परमेश्वर होए के आप पुजाओ, पर पाओ नहीं भव पार ॥५॥
कोई सुध न पावे याकी, ऐसी माया सपरानी । आपे प्रभु आपे सेवक, मांझे-मांझ उरझानी ॥६॥
बाहेर भेख देख भुलाने, तुम भीतर खोज न कींनी । भागवत वचन वल्लभी टीका, तुम याकी सुध न लींनी ॥७॥
ए तो हाथ में वस्त कहूं दूर न देखाऊं, तुम देखो खोज विचारी । सांच झूठ को प्रगट पारखो, कोई निकसो इन अंधारी ॥८॥
भवसागर और भागवत, याकी कुंजी एक समारी । ए दोऊ ताले दोऊ दरवाजे, कोई खोल न सके संसारी ॥९॥
ए संसार बड़ा है कोहेड़ा, और कोहेड़ा भागवत । ए दोऊ एक कुंजी से खोलूं, जो कोई देखूं आगे संत ॥१०॥
जो कोई खप करे या निध की, सो नाखे आप निघात । महामत कहे ताए अखण्ड सुख दीजे, टालिए संसारी ताप ॥११॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥१००॥
