किरन्तन - प्रकरण १००
धनी एते गुन तेरे देख के, क्यों भई हिरदे की अंध । कई साखें साहेदियां ले ले, याही में रही फंद ॥१॥
कई साखें लई धनी की, कई साखें लई फुरमान । कई साखें लई सास्त्रन की, अंतस्करन में आन ॥२॥
कई साखें साधुन की, कई साखें सब्द ब्रह्मांड । आतम मेरी अनुभव से, लगाए देखी अखंड ॥३॥
जो कोई कबीला पार का, सो सारों ने दई साख । धनी गुन आए आतम नजरों, सो कहे न जाए मुख भाख ॥४॥
कई साखें गुन विचार विचार, बिध बिध करी पुकार । तो भी घाव कलेजे न लग्या, यों गया जनम अकार ॥५॥
कई साखें गुन मुख केहे केहे, उमर खोई मैं सब । अजूं आतम खड़ी ना हुई, क्यों पुकारूं मैं अब ॥६॥
अब दिन बाकी कछू ना रहे, सो भी देखाए दई तुम सरत । क्यों मुख उठाऊं आगूं तुम, चरनों लागूं जिन बखत ॥७॥
ज्यों ज्यों तुम कृपा करी, मैं त्यों त्यों किए अवगुन । तिन पर फेर तुम गुन किए, मैं फेर फेर किए विघन ॥८॥
गुन धनी के गाते गाते, गई सारी आरबल । अवगुन अपने भाखते, उमर खोई ना सकी चल ॥९॥
अब हुकम होए धनी सो करूं, मेरा बल ना चले कछू इत । सुरखरू तुम करोगे, पुकार कहे महामत ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥१००॥ चौपाई ॥१४९२॥
