किरन्तन - प्रकरण १०१
राग श्री
साथ जी सुनो सिरदारो, मुझ जैसी ना कोई दुष्ट । धाम छोड़ झूठी जिमी लगी, चोर चंडाल चरमिष्ट ॥१॥
प्रेम खोया मैं बानी कर कर, हो गया जीव कोई भिष्ट । साथ के चरन धोए पीजिए, ताको दिए मैं कष्ट ॥२॥
मुख बानी केहेलाई बड़ी कर, मांहें ब्रह्म सृष्ट । पंथ पैंडे संसार के ज्यों, होए चलाया इष्ट ॥३॥
ले पंडिताई पड़ी प्रवाह में, कर कर ग्यान गोष्ट । न्यारा हुआ न नेहेकाम होए के, मैं लिया न निरगुन पुष्ट ॥४॥
अनेक अवगुन किए मैं साथ सों, सो ए प्रकासूं सब । छोड़ अहंकार रहूं चरनों तले, तोबा खैंचत हों अब ॥५॥
एते दिन धनी धाम छोड़ के, दई साथ को सिखापन । अब साथें मोको समझाई, तिन थें हुई चेतन ॥६॥
कृपा करी साथ सिरदारों, मुझ पर हुए मेहेरबान । निरगुन होए न्यारी रहूं, छोड़ बड़ाई गुमान ॥७॥
दिन कयामत के आए पोहोंचे, अब कैसी ठकुराई । धिक धिक पड़ो तिन बुध को, जो अब चाहे बड़ाई ॥८॥
अब हुकम चढ़ाऊं सिर साथ को, बकसो मेरी भूल । भी दीजो सिखापन मुझको, ज्यों होऊं सनकूल ॥९॥
इन जिमी में साथ में, जिनों करी सिरदारी । पुकार पुकार पछताए चले, जीत के बाजी हारी ॥१०॥
सो देख के ना हुई चेतन, मूढ़मती अभागी । अब लई सिखापन साथ की, महामत कहे पांउं लागी ॥११॥
॥ प्रकरण ॥१०१॥ चौपाई ॥१५०३॥
