किरन्तन - प्रकरण १०२
राग श्री
बुजरकी मारे रे साथजी, बुजरकी मारे । जिन बुजरकी लई दिल पर, तिनको कोई ना उबारे ॥१॥
आगूं कई मारे बुजरकिएँ, जिन दृढ़ कर लई विश्वास । सो देखे मैं अपनी नजरों, निकस चले निरास ॥२॥
कई मारे कई मारत है, ऐसी बुजरकी एह । न देत देखाई इन माया में, बिना बुजरकी जेह ॥३॥
जेती बुजरकी बीच दुनी के, सो सब कुफर हथियार । कुफरों में कुफर बुजरकी, काम क्रोध अहंकार ॥४॥
इन माया में कोई बुजरकी, छूट खुदा जो लेवे । सो तेहेकीक आपे अपना, पाया फल सो भी खोवे ॥५॥
खोवे जोस बंदगी खोवे, और साहेब की दोस्ती । बिना इस्क जो बुजरकी, सो सब आग जानो तेती ॥६॥
दुनियां में दोऊ लड़त हैं, एक कुफर दूजा ईमान । जीती कुफरें त्रैलोकी, ईमान दिया सबों भान ॥७॥
कुफर की हुई पातसाही, चौदे तबक चौफेर । सब दुनियां को बेमुख करके, बैठा बुजरकी ले अंधेर ॥८॥
मोको मार छुड़ाई बंदगी, सो भी बुजरकी इन । ऐसी दुस्मन ए बुजरकी, मैं देखी न एते दिन ॥९॥
पूरन मेहेर भई धनी की, दोऊ हादिऐं करी चेतन । सो भी बुजरकी देखी दुस्मन, जो भिस्त दई सबन ॥१०॥
जो कोई मारे इन दुस्मन को, करे सब दुनियां को आसान । पोहोंचावे सबों चरन धनी के, तो भी लेना ना तिन गुमान ॥११॥
महामत कहे ईमान इस्क की, सुक्र गरीबी सबर । इन बिध रूहें दोस्ती धनी की, प्यार कर सके त्यों कर ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥१०२॥ चौपाई ॥१५१५॥
