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किरन्तन - प्रकरण १०४

राग श्री

कयामत आई रे साथजी, कयामत आई । वेद कतेब पुकारत आगम, सो क्यों न देखो मेरे भाई ॥१॥

आए स्यामाजीएँ मोहे यों कहया, ए खेल किया तुम कारन । तुम आए खेल देखने, मैं आई तुमें बुलावन ॥२॥

कागद आया वतन का, कासद होए ल्याए फुरमान । आया खातिर अपने, देने को ईमान ॥३॥

अग्यारे सै साल का, आए साखें लिखी आगम । मांहें अनुभव लिख्या अपना, सो पोहोंचाया खसम ॥४॥

जो साहेब किने न देखिया, ना कछू सुनिया कान । सो साहेब काजी होए के, जाहेर करसी कुरान ॥५॥

जेते वचन कुरान में, सो सब स्यामाजी दई साख । सो सारे इन लीला के, कहूं केते हजारों लाख ॥६॥

सो कुंजी स्यामाजी दई, हकीकत वतन । माएने खुले सब तिन से, जो छिपे हुते बातन ॥७॥

और भी फुरमान में लिख्या, कोई खोल ना सके किताब । सोई साहेब खोलसी, जिन पर धनी खिताब ॥८॥

वसीयत नामे आए दरगाह सें, जाहेर करी कयामत । ए हकीकत तुम पर लिखी, देखाए दिन सरत ॥९॥

या वेद या कतेब, सब आए तुम खातिर । सब साख तुमारी देवहीं, जो देखो नीके कर ॥१०॥

साख देवे सब दुनियां, वैराट चौदे भवन । समझे सारे देखहीं, जिनका दिल हुआ रोसन ॥११॥

ए साखें सब पुकारहीं, निपट निकट कयामत । आए गई सिर ऊपर, तुम क्यों न अजूं चेतत ॥१२॥

साथजी साफ हुए बिना, अखंड में क्यों पोहोंचत । चेत सको सो चेतियो, पुकार कहें महामत ॥१३॥

॥ प्रकरण ॥१०४॥ चौपाई ॥१५३३॥

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