किरन्तन - प्रकरण १०५
राग श्री
मैं पूछत हों ब्रह्मसृष्ट को, दिल की दीजो बताए ॥ टेक ॥
जो कोई ब्रह्म सृष्ट का, सो देखियो दिल विचार । कहियो तेहेकीक करके, जिनों जो किया करार ॥१॥
सब कोई बात विचारियो, देख अपनी अपनी अकल । सृष्ट तीनों करम करत हैं, एक दूजे सों मिल ॥२॥
सो तीनों अब जुदे होएसी, है हाल तुमारा क्यों कर । दिन एते जान्या त्यों किया, अब आए पोहोंची आखिर ॥३॥
पूजे परमेश्वर करके, दिल में राखें दोए । तिन कारन पूछत हों, कौन विध याकी होए ॥४॥
कहे परमेश्वर मुख थें, दिल चोरावें जे । दगा देवें मांहें दुस्मन, क्या नहीं देखत हो ए ॥५॥
कहावत हैं ब्रह्म सृष्ट में, धनीसों छिपावें बात । दिल की करें औरन सों, ए कौन सृष्ट की जात ॥६॥
ए जो दोए दिल राखत हैं, ए तो दुनियां की रीत । मांहें मैले बाहेर उजले, ए जीव सृष्ट की प्रीत ॥७॥
एकै बात ब्रह्म सृष्ट की, दोए दिल में नाहें । सोई करें धनीसों जाहेर, जैसी होए दिल मांहें ॥८॥
मिनों मिनें गुझ करें, निस दिन एही चितवन । बुरा चाहें तिनका, जिन देखाया मूल वतन ॥९॥
पीठ चोरावें धनी सों, करें मिनो मिने खोल । ए देखो अंदर की जाहेर, देखावें अपना मोल ॥१०॥
करें धनी सों चोरियां, चोरों सों तेहेदिल । यों जनम खोवें फितुए मिने, रात दिन हिल मिल ॥११॥
करें लड़ाइयां आपमें, कहें हम हैं धाम के । क्यों ना विचारों चितमें, कैसा जुलम है ए ॥१२॥
चरचा सुनें वतन की, जित साथ स्यामाजी स्याम । सो फल चरचा को छोड़ के, जाए लेवत हैं हराम ॥१३॥
बाहेर देखावें बंदगी, मांहें करें कुकरम काम । महामत पूछे ब्रह्मसृष्ट को, ए बैकुंठ जासी के धाम ॥१४॥
॥ प्रकरण ॥१०५॥ चौपाई ॥१५४७॥
