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किरन्तन - प्रकरण १०६

राग श्री

ए सुच कैसे होवहीं, तुम देखो याकी विध । अनेक आचार कर कर थके, पर हुआ न कोई सुध ॥१॥

निस दिन ग्रहिए प्रेम सो, जुगल सरूप के चरन । निरमल होना याही सों, और धाम बरनन ॥२॥

इन विध नरक जो छोड़िए, और उपाय कोई नाहें । भजन बिना सब नरक है, पच पच मरिए मांहें ॥३॥

धनी बिना अंग निरमल चाहे, सो देखो चित ल्याए । क्यों निरमल अंग होवहीं, जो इन विध रच्यो बनाए ॥४॥

दोऊ मैले जब मिले, बांध गोली मांस रचाए । नरक उदर दस मास लों, पूरो कियो पचाए ॥५॥

जठरा अगिन तले करी, ऊपर ऊंधे मुख लटकाए । बोल न सके ठौर सकड़ी, काढयो मुरदे ज्यों छुटकाए ॥६॥

हाड़ मांस लोहू रगां, ऊपर चाम मढ़ाए । नव द्वार रचे नरक के, निस दिन बहे बलाए ॥७॥

ऊपर बंध बालन के, जलस गुदा अंतर छाल । चले नदी मल मूत्र की, कहूं केतो नरक को हाल ॥८॥

पंचामृत पाक बनाए, भोजन भयो रूचाए । अंग संग ले निकस्यो, कौन हाल भयो ताए ॥९॥

अंत आहार सूकर कूकर को, या कौआ कीरा खाए । या तो अगिन जलाए के, करके खाक उड़ाए ॥१०॥

ए नरक निरमल क्यों होवहीं, जो ऊपर से अंग धोए । अंग धोए मन निरमल, कबहूं न हुआ कोए ॥११॥

धिक धिक नीची चातुरी, विचार न अंतस्करन । त्रैलोकी इन अंग संग, गई खोए अखंड वतन ॥१२॥

ए सुच क्‍योंए न होवहीं, जो सौ बेर अन्हाए । ए तो पिंड नरकै भरयो, देखो अन्तर नजर फिराए ॥१३॥

विवेक विचार न पाइए, ऊपर टेढ़ी पाग लटकाए । आप देखे मांहें आरसी, सिर आसमान लों ले जाए ॥१४॥

नहीं भरोसो खिन को, बरस मास और दिन । ए तो दम पर बांधिया, तो भी भूल जात भजन ॥१५॥

आतम धनी पेहेचानिए, निरमल एही उपाए । महामत कहे समझ धनी के, ग्रहिए सो प्रेमें पाए ॥१६॥

॥ प्रकरण ॥१०६॥ चौपाई ॥१५६३॥

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