किरन्तन - प्रकरण १०७
राग श्री
झूठ सब्द ब्रह्मांड में, कहावत याही में सांच । ए दोऊ झूठे होत हैं, वास्ते पिंड जो कांच ॥१॥
ए लगे दोऊ सुन्य को, निराकार सामिल । निरंजन या निरगुन, सो भी रहे इन भिल ॥२॥
एकै साइत पैदा हुए, और फना होसी एक बेर । ए क्यों पावें अद्वैत को, जो ढूंढे मांहें अन्धेर ॥३॥
ए न्यारे को क्यों पावहीं, पैदास सारी इन । सत सब्द ब्रह्मांड में आया, पर ए ना छोड़े कोई सुंन ॥४॥
जीव विष्णु महाविष्णु लों, याके कई विध नाम धरत । अग्यान ग्यान ले विग्यान, यों कई विध खेल खेलत ॥५॥
एक अनेक सब इनमें, इत सांच झूठ विस्तार । अछर ब्रह्म क्यों पावहीं, भई आड़ी निराकार ॥६॥
अछर अछरातीत कहावहीं, सो भी कहियत इत सब्द । सब्दातीत क्यों पावहीं, ए जो दुनियां हद ॥७॥
पांच तत्व गुन तीनों ही, ए गोलक चौदे भवन । निरगुन सुन्य या निरंजन, ज्यों पैदा त्योंही पतन ॥८॥
ए सुपना नींद सुरत का, खेले अछर आतम । हम भी आए देखने, खसम के हुकम ॥९॥
ब्रह्मसृष्ट के कारने, खेल जो रचिया ए । खेल देखाए सत वतन, महामत आए ले ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥१०७॥ चौपाई ॥१५७३॥
