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किरन्तन - प्रकरण १०८

राग श्री

फुरमान मेरे मेहेबूब का, ले आया अर्स से रसूल । भेज्या अपनी अरवाहों पर, साहेब होए सनकूल ॥१॥

सोई खोले अपनी इसारते, जो अर्स की अरवाहें । एही परीछा जाहेर, और काहूं न खोल्या जाए ॥२॥

बरकत इन रूहन की, भिस्त देसी सबन । ले दे हिसाब फजर को, ले चलसी रूहें वतन ॥३॥

मुझे भेज्या कासिद कर, मैं ल्याया फुरमान । एही जानो तुम तेहेकीक, दिलसों आकीन आन ॥४॥

मैं देत हों खुसखबरी, जो रबानी अरवाहें । वे उतरे अर्स अजीम से, जो हैं हमेसगी इप्तदाए ॥५॥

रसूल कहे मैं आखिरी, मेरे पीछे न आवे कोए । कहया रूह अल्ला की आवसी, और मेंहेंदी इमाम सोए ॥६॥

रूह अल्ला दो जामे पेहेरसी, दूसरे ऊपर मुद्दार । सोई इमाम मेंहेंदी, याकी बुजरकी बेसुमार ॥७॥

मैं आया हों अव्वल, आखिर आवेगा खुदाए । काजी होए के बैठसी, करसी सबों कजाए ॥८॥

साल नव सै नब्बे मास नव, हुए रसूल को जब । रूह अल्ला मिसल गाजियों, मोमिन उतरे तब ॥९॥

गिरो बनी असराईल, सो मिसल गाजियों जान । होए कबूल बंदगी उनसे, इन विध कहे फुरमान ॥१०॥

एक निमाज की हजार, एही करसी कबूल । कई कही महंमद आखिर सिफत, सो भी इन बीच होसी रसूल ॥११॥

एही गिरो रबानी, रूहें बीच दरगाह । कई हजारों सिफतें इन की, मांहें बुजरक रूहअल्लाह ॥१२॥

जाहेर महंमद पुकारहीं, फुरमान ल्याया मैं । कई हजारों बातें करी, साहेब की सूरत सें ॥१३॥

कई रद बदलें करी साहेब सों, अपनी उमत के वास्ते । या विध कलाम कई लिखें, सो पढ़े न मानें ए ॥१४॥

यों लिख्या है कई विध, पर समझे ना बेसहूर । दुनी पढ़ पढ़ अपनी अकलें, कई करें मजकूर ॥१५॥

बिना आकीने पढ़हीं, अपनी अकलें करें बयान । सो सुनाए सुनाए दुनी को, कई किए बेईमान ॥१६॥

एक अचरज ए देख्या बड़ा, कहे बेचून बेचगून । कुरान देखें पढ़ें यों कहें, बेसबी बेनिमून ॥१७॥

फुरमान जाहेर सूरत देखावहीं, सो माएने न ले दिल अंध । पढ़ें अपनी अकलें, पाड़ी दुनियां दोजख फंद ॥१८॥

सिपारे सयकूल में, यों लिख्या जाहेर कर । देखाऊं माएने मुसाफ, चीन्हो दिल की खोल नजर ॥१९॥

ए जानें हरम के मेहेरम, जिनों तेहेकीक करी सूरत । मुख ना फेरें सूरत सों, सोई बंदगी हकीकत ॥२०॥

एक खूबी चाहें साहेब की, और न कछुए चाहें । उनकी एही बंदगी, जो सांचे आरिफ अरवाहें ॥२१॥

जिनों अर्थ लिया अंदर का, माएने पेहेचाने तिन । खासों की एही बंदगी, जाने दिल रूह वतन ॥२२॥

आसिक अर्स अजीम की, चाहे मिलना हमेसगी । चाहे साहेब और उमत, उनकी एही बंदगी ॥२३॥

एही रूहों की बंदगी, जो कही खास उमत । एही अहेल किताब हैं, लिख्या दूसरे सिपारे जित ॥२४॥

और देखो दुनी की बंदगी, ए भी सयकूल में लिखे । सो भी देखाऊं बेवरा, जो कर बैठे किबले ॥२५॥

पातसाहों एही जानिया, मोती जवेर सिर ताज । इनका एही किबला, चाहें ज्यादा अपना राज ॥२६॥

सोना रूपा दुनी का, अरथ चाहें भरे भंडार । इनका एही किबला, कई विध करें विस्तार ॥२७॥

जिनकी बद-खसलतें, अपना भला मन ल्याए । इनका एही किबला, औरों का भला न चाहें ॥२८॥

जो जाहेर परस्त हैं, चाहें मिट्टी पानी पत्थर । इनका एही किबला, जिनकी बाहेर पड़ी नजर ॥२९॥

मिट्टी पत्थर बनाए के, कहें खुदाए का घर । मेहेराव को किबला किया, करें निमाज तिन पर ॥३०॥

जो यार हैं अपने तन के, भला खावें सोवें पलंग । तिनका एही किबला, और न चाहें रंग ॥३१॥

आगूं अपनी दानाई के, और न काहूं देखत । इनका एही किबला, अपनी तरफ खैंचत ॥३२॥

जिन जैसा किबला सेविया, आगूं आया तैसा तिन । दुनी कारन खोवे दीन को, तो आखिर कही जलन ॥३३॥

इन विध फुरमान फुरमावहीं, जाहेर देत बताए । अन्दर बैठा जो दुस्मन, सो देत माएने उलटाए ॥३४॥

आरिफ कहावें आपको, होए बुजरक मांहें दीन । कहया हादी का रद करें, यों खोवत हैं आकीन ॥३५॥

जब जाहेर माएने लीजिए, तब खड़े होत हैं घर । अन्दर माएने सब उड़त हैं, सो पढ़े लेवें क्योंकर ॥३६॥

पढ़े सो भी पेट कारने, और पालने कबीले । दुनियां को देखावहीं, आगूं चल के ए ॥३७॥

जब लीजे अन्दर के माएने, तब ना कछू साहेब बिन । साहेब बिना सब दोजख, चौदे तबक अगिन ॥३८॥

दीन इसलाम से जात हैं, कारन सुख सुपन । बुजरक आगे होए के, राह मारें औरन ॥३९॥

कही गरीबी बुजरक, पढ़ कर सो ना ले । कई बंध फंद कर मारहीं, लई मुल्लां गरीबी ए ॥४०॥

कोई सीधा सब्द जो केहेवहीं, तो तोरा देखावें ताए । जो गरीब सामें बोलहीं, तो तिनको सूली चढ़ाए ॥४१॥

कहे मुखथें हम मोमिन, और हमहीं पढ़े सरे-दीन । हमहीं अहेल किताब हैं, हमहीं में आकीन ॥४२॥

यों हम हम करते कई गए, अजूं योंहीं जाए रात दिन । यों करते आखिर आए गई, बांधी तोबा लगी अगिन ॥४३॥

किया टोना लड़की महंमद पर, दई गांठ अग्यारे तिन । सो हर सदी गांठें खुलीं, तब महंमद ले चले मोमिन ॥४४॥

ए आयत देख्या चाहे, ताए देखाऊं बेसक । इनमें जो सक ल्यावहीं, सो जलसी आग दोजक ॥४५॥

जब तमाम सदी अग्यारहीं, ए महंमद उमत आकीन । जबराईल मुसाफ ले आए, और बरकत दुनियां दीन ॥४६॥

ए तीनों उठाए दुनी से, जबराईल ले आया अपने मकान । खड़ा किया झंडा दीन का, ल्याए लाखों खलक ईमान ॥४७॥

वसीयत नामे साहेदी, आए लिखे बड़ी दरगाह । सो मिलाए दिए कुरान से, महामत हुकम खुदाए ॥४८॥

॥ प्रकरण ॥१०८॥ चौपाई ॥१६२१॥

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