किरन्तन - प्रकरण १०९
राग श्री
मासूक मेरे रूह चाहे सिफत करूं, सो मैं जाए ना कही । जब देख्या बेवरा कर, तब तामें उरझ रही ॥१॥
सब थें बड़ी मुझे करी, ऐसी और न दूजी कोए । जो मेहेर करी मुझ ऊपर, सो सिफत जुबां क्यों होए ॥२॥
किन विध मैं तुमको कहूं, क्यों कर दिल धरूं । ले एहेसान तुमारे दिल में, मैं गुजरान क्यों करूं ॥३॥
मैं चलते देखे मजहब, और सबके परमेश्वर । सो सारे बीच फना मिने, नूर बका न काहू नजर ॥४॥
फना छोड़ इन परमेश्वरों, नूर बका न पाया किन । तिन पर नूर बिलंद, सो किया तुम मेरा वतन ॥५॥
खेल किया मेरे कारने, दुनियां चौदे तबक । मेरे हाथ तिनकी हैयाती, भिस्त पाई मुतलक ॥६॥
खेल कर मोहे बैठाई मांहें, मुझ पर भेज्या फुरमान । मांहें लिखी हकीकत मारफत, मुझ बिना न काहूं पेहेचान ॥७॥
कुंजी दई मुझ को, और मेरै सिर खिताब । सास्त्र चौदे तबक के, सब मैं ही खोलों किताब ॥८॥
राह देखाऊं सबन को, ऐसो बल दियो खसम । सब को फना से बचाए के, लगाए तुमारे कदम ॥९॥
खेल बनाया मेरे वास्ते, मोहे भेज के आए आप । पट खोल इलम समझाइया, मोसों नीके कियो मिलाप ॥१०॥
बका न चौदे तबक में, न पाया त्रैलोकी त्रैगुन । सेहेरग से नजीक देखाइया, ऐसा इत इलमें किया रोसन ॥११॥
ऐसा बेसक चौदे तबक में, कोई न हुआ कबूं कित । इन नुकते सब बेसक हुए, ऐसी बेसकी आई इत ॥१२॥
ए भी बड़ाई मुझ को दई, जो सबों देख्या नूर पार । सबों सेहेरग से नजीक, कुंजिएँ देखाया निरधार ॥१३॥
ए दिल की बातें कासों कहूं, रूह की जानो सब । बोलन की कछू ना रही, जो कहो सो करूं मैं अब ॥१४॥
मोहे करी सबों ऊपर, ऐसी ना करी दूजी कोए । अजूं रूह मांग्या चाहे, ए तुम कैसी बनाई सोए ॥१५॥
बैठाई आप जैसी कर, सो खोल देखाई नजर । अजूं मांगत मेरे धनी, और ऐसे तुम कादर ॥१६॥
जो तुम बड़े करे खेल में, ताकी दुनी करे सिफत । सो बड़े गिरो के पांउं की, खाक भी न पावत ॥१७॥
तिन गिरो में सिरदारी, तें मुझे दई मेरे खसम । ऐसी बड़ी करी मोहे खेल में, अब इत उरझ रहया मेरा दम ॥१८॥
दुनी सिफत पोहोंचे मलकूत लो, सो फरिस्ते खाक भी पावत नाहें । तिन गिरो में बुजरक, मोहे ऐसी करी खेल माहें ॥१९॥
मैं भटकी बीच दुनी के, घर घर मांगी भीख । लौकिक दई मोहे साहेबी, अंतर में अपनी सरीख ॥२०॥
नर नारी बूढ़ा बालक, जिन इलम लिया मेरा बूझ । तिन साहेब कर पूजिया, अर्स का एही गुझ ॥२१॥
जब हकें मोहे इलम दिया, तब मोसों कही निसबत । सो निसबत बका हक की, ताकी होए ना इत सिफत ॥२२॥
जिन बंदगी मेरी करी, लिया निसबत हिस्सा तिन । पांउं खाक मांगी बुजरकों, ए सोई फकीर मोमिन ॥२३॥
ए बुध ना चौदे तबक में, सो अपनी दई अकल । समझी सब मैं अर्स की, जो सिफत तेरी असल ॥२४॥
मैं बातून तुमारी समझी, तुम अपना दिया इलम । अब इत केहेना कछू ना रहया, होसी अर्स में आगूं खसम ॥२५॥
ऐसी बड़ाई केती कहूं, जो करी अलेखे अपार । सो नेक कही मैं गिरो समझने, समझेगी रूह सिरदार ॥२६॥
महामत कहे मेहेबूब जी, मोहे खेल देखाया बुजरक । करो मीठी बातें मुझसों, मेरे मीठे खसम हक ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥१०९॥ चौपाई ॥१६४८॥
