किरन्तन - प्रकरण ११ | Kirantan prakaran 11
राग श्री नट
रे हूँ नाहीं रे हूँ नाहीं सिध साध संत री भगत, नाहूं वैष्णव अपरस आचार । जात कुटम कुल नीच ना ऊंच, ना हूँ बरन अठार ॥१॥
रे हूँ नाहीं व्रत दया संझा अगिन कुंड, ना हूँ जीव जगन । तंत्र न मंत्र भेख न पंथ, ना हूँ तीरथ तरपन ॥२॥
रे हूँ नाहीं करामात मत अगम निगम, धरम न करम उनमान । सुपन सुषुप्त जाग्रत न तुरिया, तप न जप न ध्यान ॥३॥
रे हूँ नाहीं अंग इंद्री ग्यान ब्रह्मचारी, ब्रह्मांड न लगत वचन । रूप रंग रस धात में नाहीं, गुन पख दिवस ना रैन ॥४॥
रे हूँ नाहीं सब्द सोहं जो तत्व पांचमें, ना खट चक्र सिर पवन । त्रिकुटी त्रिवेनी तीनों ही काल में, ना अनहद अजपा आसन ॥५॥
रे हूँ नाहीं नवधा में मुक्त में भी नाहीं, न हूँ आवा गवन । वेद कतेब हिसाब में नाहीं, न मांहें बाहेर न सुंन ॥६॥
रे हूँ नाहीं न्यारा जहां हूँ तहां नजीक में, ना हूँ उनमुनी आकार । ना हूँ दृष्टें किन सुनिया री सृष्टें, न हूँ निराकार ॥७॥
तुम सांचे सिध साध भगवत तुमको वैष्णवो, सांच सकल संसार । भनत महामत तुम अमर होउ याही में, मैं न कछू यामें निरधार ॥८॥
॥ प्रकरण ॥११॥ चौपाई ॥१०८॥
