किरन्तन - प्रकरण ११०
राग श्री
कारी कामरी रे, मोको प्यारी लागी तूं । सब सिनगार को सोभा देवै, मेरा दिल बांध्या तुझसों ॥१॥
तूं नाम निरगुन कहावहीं, सब सरगुन के सिरे । सब नंग मोती तेरे तले, कोई नाहीं तुझ परे ॥२॥
कामरी पेहेरी बृजवधू, और सुन्दरवर स्याम । भी पेहेरी महंमद ने, और पेहेरी इमाम ॥३॥
मोल नहीं इन कामरी को, याको ले न सके कोए । मोमिन कहे सो लेवहीं, जो रूह अर्स की होए ॥४॥
गोवरधन को ढांपिया, एक बूंद न हुआ दखल । आग लोहा पानी प्रले के, सोस लिया सब जल ॥५॥
अहीर किए धंन धंन, और आरब कुर्रेस । मारू भी धंन धंन हुए, है सोई हमारा भेस ॥६॥
रूह अल्ला पेहेरी अंदर, हुई नहीं जाहेर । दुनियां हिरदे अंधली, सो देखे नजर बाहेर ॥७॥
पट पेहेर खाए चीकना, हेंम जवेर सिनगार । हक लज्जत आई मोमिनों, तिन दुनी करी मुरदार ॥८॥
सोहाग दिया साहेब ने, कामरी सोहागिन । आगूं बोले बुजरक, सराही साधू जन ॥९॥
हमारे ताले मिने, लिखे अल्ला कलाम । महामत कहे सब दुनी को, प्यारी होसी तमाम ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥११०॥ चौपाई ॥१६५८॥
