किरन्तन - प्रकरण १११
राग श्री
फरेबी लिए जाए, मेरी रूह तूं आँखें खोल । बीच बका के बैठके, तें किनसों किया कौल ॥१॥
अर्स की खिलवत में, हक की वाहेदत । बैठ के बातें जो करी, सो कहां गई मारफत ॥२॥
हकें कहया रूहन को, जिन तुम जाओ भूल । इस्क ईमान ल्याइयो, मैं भेजोंगा रसूल ॥३॥
उतरते अरवाहों सों, कहया अलस्तो-बे-रब-कुंम । मैं लिखूंगा रमूजें, सो जिन भूलो तुम ॥४॥
साहेद किए हैं सब को, जेती अर्स अरवाहें । आप भी हुए साहेद, अपनी आप जुबांए ॥५॥
मैं भेजी रूह अपनी, सब दिल की बातें ले । तुमें अजूं याद न आवही, हाए हाए कैसी फरेबी ए ॥६॥
सब बातें मेरे दिल की, और सब रूहों के दिल । सो सब भेजी तुम को, जो करियां आपन मिल ॥७॥
फुरमान ल्याए महंमद, किन खोली न इसारत । तब रूहें आई न थी, तो पीछे फेर करी सरत ॥८॥
कहे महंमद मसी आवसी, ले कुंजी लाहूत से । एक दीन सब करसी, सब कायम होसी कुंजिएँ ॥९॥
बका ऊपर बंदगी, करावसी इमाम । हक गिरो हम आए के, करें कजा तमाम ॥१०॥
आगूं आए जाहेर किया, आवने को ईमान । खासी गिरो के वास्ते, कई कहे निसान ॥११॥
ए बातें सब अर्स की, जब याद आवे तुम । तब इस्क तुमें आवसी, उड़जासी तिलसम ॥१२॥
कौन है तेरा मासूक, किनसों है निसबत । देख अपना वतन, अब तूं आई कित ॥१३॥
हकें रूहों को दई, अपनी जो न्यामत । इन नासूतें भुलाए दई, हक की हकीकत ॥१४॥
मूल मिलावा खिलवत का, अजूं न आवे याद । ए झूठी जिमी जो दोजख, इत कहा लग्यो तोहे स्वाद ॥१५॥
मासूकें इत आए के, कैसा दिया इलम । सक तोहे कोई ना रही, अजूं याद न आवे खसम ॥१६॥
महामत कहें ए मोमिनों, ऐसी क्यों चाहिए रूहन । ए मेहेर देखो मेहेबूब की, अर्स जिनों वतन ॥१७॥
॥ प्रकरण ॥१११॥ चौपाई ॥१६७५॥
