किरन्तन - प्रकरण ११३
चतुर चौकस चेतन अति चोपसों, कूवत कर सब अंग कमर कसे । सुंदर सेज्या सनकूल तन रूह रची, मासूक दिल मोमिन मोहोल मांहें बसे ॥१॥
मन तन जोबन चढ़ता नौतन, आया अमरद आसिक इस्क गंज ले । अधुर अमृत मुख दंत रसना रस, नित नए सुंदर सब देखे चढ़ते ॥२॥
निलवट बंके नैन नासिका श्रवन, कौल फैल हाल नित नवले देखाए । रूह भी रंग रस चंचल चपल गत, मोहन मोही मोहनी मह हो जाए ॥३॥
भाखती महामती अर्स रूहें उमती, पूरन कर प्रीत प्रेमें पोहोंचाई । अर्स वाहेदत खिलवत खसम की, हुज्जत निसबत लिए इत आई ॥४॥
॥ प्रकरण ॥११३॥ चौपाई ॥१६८४॥
