किरन्तन - प्रकरण ११५
हुब मेहेबूब की आसिक प्यास ले, चाहे साफ सराब सुराई सका । पीवते पीवते पिउ के प्याले सों, हुई हाल में लाल पी मस्त बका ॥१॥
दिल परस सरस भयो अर्स इलाही, दोऊ चुभ रहे दिल सों दिल मिल । न्यारी ना होए प्यारी आप मारी, चल विचल ना होए वाहेदत असल ॥२॥
लगी सो लगी आतम अंदर लगी, यों अंतर आतम जगी जुदी न होए । सरभर भई पर आतम यों कर, यों तेहे दिली मिली छोड़ सके न कोए ॥३॥
महामत दम कदम न छूटे इन खसम के, हुआ मोहोल मासूक का मेरे दिल मांहीं । एक अव्वल बीच आई सो एक हुई, आखिर एक का एक मोहोल बीच और नाहीं ॥४॥
॥ प्रकरण ॥११५॥ चौपाई ॥१६९२॥
