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किरन्तन - प्रकरण ११६

नूर नगन चेतन भूखन रचे, अंग संग देखे सब चढ़ते रोसन । यो खैंच खड़ी करी इलम खसम के, लई जोस फरामोस से होस वतन ॥१॥

सब अंग आसिक के इस्क सों रस बसे, बढ़त बढ़त बीच आए बका । यों आई उमत इस्क भरी अर्स में, पीवे साफ सुराई सांई हाथ सका ॥२॥

हकें अब लिए फेर अंधेर से इन बेर, रूहें मोमिन पोहोंचियां अर्स मांहें तन । बृज रास जागनी तीनों सुख देय के, मोमिन तन किए धंन धंन ॥३॥

भनत महामती हक दिल मारफत की, पोहोंचाई इन न्यामतें उमत खिलवत । क्यों कहूं सिफत बरकत वाहेदत की, लज्जत आई इमामत कयामत ॥४॥

॥ प्रकरण ॥११६॥ चौपाई ॥१६९६॥

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