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किरन्तन - प्रकरण ११७

मिली मासूक के मोहोल में माननी, आसिक अंग न मांहें अंग । जानूं जामनी बीच जुदी हुती हक जात सें, पेहेचान हुई प्रात हुए पिउ संग ॥१॥

मन सुकन तन भए सब एकै, एकै जात सिफात सब बात । एक अंग संग रंग सब एकै, सब एक मता अर्स बका बिसात ॥२॥

नाहीं जुदा कांही जांही अर्स मांहीं, मिले रूह भेले दिल एक हुए । तो कलूब किबला भया मकबूल अल्लाह कहया, अव्वल आखिर मिले एक हुए न जुए ॥ ३॥

हक अरस परस सरस सब एक रस, वाहेदत खिलवत निसबत न्यामत । महामत अलमस्त होए आवें उमत लिए, पीवत आवत हक हाथ सरबत ॥४॥

॥ प्रकरण ॥११७॥ चौपाई ॥१७००॥

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