किरन्तन - प्रकरण ११८
राग श्री
मोमिन लिखे मोमिन को, कहो तो आवें इत । ए अचरज देखो मोमिनों, कैसा समया हुआ सखत ॥१॥
दम दिल तन एकै, बिछुर के भूली वतन । जानू के सोहोबत कबूं न हुती, तो यों कहावें सुकन ॥२॥
मोमिन रखे मोमिन सों, जो तन मन अपना माल । सो अरवा नहीं अर्स की, ना तिन सिर नूर जमाल ॥३॥
मता मोमिन का काफर, ले न सके क्योंए कर । दिल मोमिन का अर्स कहया, दिल काफर अबलीस घर ॥४॥
जब मेला होसी मोमिनों, तब देखसी सब कोए । और न कोई कर सके, जो मोमिनों से होए ॥५॥
जब लग भूली वतन, तब लग नाहीं दोस । जब जागी हक इलमें, तब भूली सिर अफसोस ॥६॥
हकें जगाए मोमिन, अपनी जान निसबत । अर्स किया दिल मोमिन, बैठाए बीच खिलवत ॥७॥
जाकी तरफ न पाई किनहूं, इन मांहें चौदे तबक । ताको ले बैठे दिल में, किया ऐसा अपने हक ॥८॥
और दुनी के दिल पर, किया अबलीस पातसाह । सो गुम हुए बीच रात के, क्यों ए न पावें राह ॥९॥
ऐसा हकें जाहेर किया, ऊपर रूहों मेहेर मुतलक । कई बिध बताई रसूलें, पर क्या करे हवाई खलक ॥१०॥
मोमिन सुकन सुन जागसी, जाको अर्स वतन । जब नूर झण्डा खड़ा हुआ, पीछे रहें न रूहें अर्स तन ॥११॥
एह किताबत पढ़ के, रूहें रेहे न सकें एक खिन । झूठी सों लग न रहे, जो रूह होए मोमिन ॥१२॥
सखत बखत ऐसा हुआ, ईमान छोड़या सबन । तब अरवाहें करें कुरबानियां, मह होवें मोमिन ॥१३॥
जीव देते न सकुचें, मोमिन राह हक पर । दुनियां जीव ना दे सके, अर्स रूहों बिगर ॥१४॥
अर्स तन रूह मोमिन, लोभ न झूठा ताए । मोमिन जुदागी न सहें, ज्यों दूध मिसरी मिल जाए ॥१५॥
लिखी फकीरी ताले मिने, अपने हादी के । कदम पर कदम धरें, मोमिन कहिए ए ॥१६॥
एक हक बिना कछू न रखें, दुनी करी मुरदार । अर्स किया दिल मोमिन, पोहोंचे नूर के पार ॥१७॥
महामत कहें ए मोमिनों, ए है अपनी गत । झूठ वास्ते जुदे ना पडें, मोमिन अर्स वाहेदत ॥१८॥
इन महंमद के दीन में, जो ल्यावेगा ईमान । छत्रसाल तिन ऊपर, तन मन धन कुरबान ॥१९॥
॥ प्रकरण ॥११८॥ चौपाई ॥१७१९॥
