किरन्तन - प्रकरण १२ | Kirantan prakaran 12
राग श्री गौड़ी
वचन विचारो रे मीठड़ी, वल्लभाचारज बानी । अर्थ लिए बिना ए रे अंधेरी, करत सबों को फानी ॥१॥
बानी गाऊँ श्री वल्लभाचारज, ज्यों वैष्णव को सुख होए । सत वचन बोहोत तो न कहूं, जानों दुख पावे दुष्ट कोए ॥२॥
ए बानी को टेढ़ा कहावो, ए कौन तुमारा धरम । वैष्णव कहाए के उलटे चलिए, ए नहीं तिनके करम ॥३॥
देखीते वैष्णव अति सुंदर, नीके बनावत भेख । माला तिलक धोए धोती पेहेरे, एक दूजे के देख ॥४॥
कौन तुम और कहां तें आए, और कहां तुमारा घर । ए कौन भोम और कहां श्री कृष्णजी, पाओगे कौन तर ॥५॥
उत्तम भेख धरो वैष्णव के, और वैष्णव आप कहावो । जो वैष्णव बस करे नव अंग, सो वैष्णव क्यों न जगावो ॥६॥
तुम पांच के बांधे पांच देखत हो, पांच के चौदे भवन । ए पांचों प्रले हो जासी, पीछे कब ढूंढ़ोगे अपना वतन ॥७॥
ए बानी तो अपरस करे आतम, तुम अपरस करो बाहेर अंग । आकार अपरस किए कहा होए, इने आतम सों कैसो सनमंध ॥८॥
तुम झूठ को साजो समारो, जो झूठा होए जासी । सांचे सुख देवे जो सांचा, सो कबे ओलखासी ॥९॥
मांहें अंधेर और वैष्णव कहावो, ए तो बातें सब फोक । ज्यों धूरत नाम धरावे धनवंत, पासे नहीं दमड़ी रोक ॥१०॥
बिध न लहो विवाद करो, ना देखो वचन विचारी । वल्लभ बानी समझे बिना, खोवत निध तुमारी ॥११॥
अहंकारें कई जुलम करो, ना त्रास सील संतोख । गुन अंग इंद्री के बस परे, ना देखो नजरों दोख ॥१२॥
धूरत करके ल्याओ धन, खरचो मुख करो उनमाद । मेले मेलो मुख भाखो उछव, पातलिऐं डालो प्रसाद ॥१३॥
एक सीत जूठ को ब्रह्मा जैसा, जल में मीन होए आया । ए जूठ को महामत बानी देखावे, ग्वालों को चल्लू न कराया ॥१४॥
ओ हांसी ठठोली करे हरामी, ताए ले बैठो मंडली मुख । ए नीच करम डबोवे नरक में, पीछे छूट पाओगे कब सुख ॥१५॥
ए बानी उत्तम चढ़ावे ऊंचे, ए उलटे अधम स्वादे । कठिन पंथ चढ़ाए नहीं ऊंचे, पीछे नीचे दौड़े नीच वादे ॥१६॥
कुकरम करो कुटिल गत चालो, आगे पीछे चींटी हार । वल्लभ कुंअर कितने को बरजे, कई उलटे सेवक संसार ॥१७॥
दोष नहीं इन बानी केरो, ए तो दुष्ट दासी की कमाई । अधम शिष्य गुर को बुरा कहावे, पर सोने न लगत स्याही ॥१८॥
ए बानी तुम नाहीं पेहेचानी, यामें बिध बिध के प्रकास । इन प्रकास में खेलें श्रीकृष्णजी, रमें अखंड लीला रास ॥१९॥
तुम पनधारी आतम निवेदी, बानी न देखो विचारी । अजूं ना मानो तो इत आओ, मैं देखाऊं लीला तुमारी ॥२०॥
वैष्णव होए सो वचन मानसी, और जो वल्लभ बानी से टलिया । महामत कहे सो काहे को जनम्या, गर्भ मांहें क्यों न गलिया ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥१२९॥
