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किरन्तन - प्रकरण १२१ | Kirantan prakaran 121

सिफत तो सारी सब्द में, चौदे तबक के मांहें । कलाम अल्ला न्यारा सबन से, सो क्यों कहूं सिफत जुबांए ॥१॥

तामें सिफत सोफी महंमद की, याकी गरीब गिरो की सिफत । सो करसी कायम त्रैलोक को, एही खावंद आखिरत ॥२॥

सो वचन लिखे हैं इसारतों, पाइए खुले हकीकत । उपले माएने न पाइए, जो अनेक दौड़ाओ मत ॥३॥

गोस कुतब पैगंमर, ओलिए अंबिए कई नाम । ताए कई बिध दई बुजरकियां, साहेब के समान ॥४॥

सो सिफत सब महंमद की, सो महंमद कहया जो स्याम । अव्वल आखिर दोऊ दीन में, एही बुजरक महंमद नाम ॥५॥

याही बिध गिरोह की, नाम लिखे अनेक । जुदे जुदे नामों पर सिफत, पर गिरो एक की एक ॥६॥

तिनकी भी है तफसीर, सुनियो गिरो मोमिन । मारफत दरवाजा खोलिया, दिल दीजो नजर वतन ॥७॥

गिरो एक बुजरक कही, रूह अल्ला आए तिन पर । इत जादे पैगंमर दो भए, एक नसली और नजर ॥८॥

तिनसे राह जुदी हुई, गिरो दोए हुई झगर । एक उरझे दीन जहूद के, उतरी किताबें दूजे पर ॥९॥

सो भाई न माने किताब को, रोसनाई ढांपे फेर फेर । तब आया दूजे पर महंमद, सब किताबें ले कर ॥१०॥

एही फिरका नाजी कहया, दे साहेदी फुरमान । एक नाजी नारी बहत्तर, एही नाजी की पेहेचान ॥११॥

एही गिरो खासी कही, जिनमें महंमद पैगंमर । हकीकत मारफत खोल के, जाहेर करी आखिर ॥१२॥

जब खुली हकीकत मारफत, तब मजहब हुए सब एक । तब सबके दिल धोखा मिट्या, हुए रोसन पाए विवेक ॥१३॥

एती बातें कुरान में, बिध बिध करी रोसन । कई नाम धर दई बुजरकियां, सो बल महंमद और मोमिन ॥१४॥

कहे महामत मुसाफ उमत की, सिफत न आवे जुबान । तीनों अर्स अजीम के, ईसे किए बयान ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥१२१॥ चौपाई ॥१७५०॥

इसी सन्दर्भ में देखें-