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किरन्तन - प्रकरण १२३

चरचरी छंद

स्यामाजी स्याम के संग, जुवती अति जोर जंग । करती पूरन रंग, परआतम परे ॥१॥

अंग अंग उछरंग, सखी सखी मन उमंग । अलबेली अति अभंग, भामनी रस भरे ॥२॥

छटके छेल कंठ मेल, हाँस खेल रंग रेल । बंध बेल ठमके ठेल, कामनी केलि करे ॥३॥

कंठ हार सजे सिनगार, नैन समार सोभे मुखार । संग आधार करे विहार, महामती काज सरे ॥४॥

॥ प्रकरण ॥१२३॥ चौपाई ॥१७६२॥

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