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किरन्तन - प्रकरण १२७ | Kirantan prakaran 127

पर न आवे तोले एकने, मुख श्री कृष्ण कहंत । प्रसिद्ध प्रगट पाधरी, किवता किव करंत ॥१॥

कोट करो नरमेध, अश्वमेध अनंत । अनेक धरम धरा विखे, तीरथ वास वसंत ॥२॥

सिद्ध करो साधन, विप्र मुख वेद वदंत ।सकल क्रियासूं धरम पालतां, दया करो जीव जंत ॥३॥

व्रत करो विध विधना, सती थाओ सीलवंत । वेख धरो साध संतना, गनानी गनान कथंत ॥४॥

तपसी बहु बिध देह दमो, सर्वा अंग दुख सहंत । पर तोले न आवे एकने, मुख श्री कृष्ण कहंत ॥५॥

मेहेराज कहे मुख ए धंन, जो वली रूदे रमंत । चौदे भवन ते जीतियो, धंन धंन ए कुलवंत ॥६॥

॥ प्रकरण ॥१२७॥ चौपाई ॥१९५१॥

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