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किरन्तन - प्रकरण १३

राग श्री

आज सांच केहेना सो तो काहू ना रूचे, तो भी कछुक प्रकासूं सत । सत के साथी को सत के बान चूभसी, दुष्ट दुखासी दुरमत । अखंड सुख लागियो ॥१॥

वेद ने पुरान सास्त्र सब उपजे, पीछे भारथ पर्व अठार । दाझ न मिटी तिन व्यास की, पीछे उदयो भागवत सार ॥२॥

ए सुख की सागर सत बानी प्रगटी, सो लई साधों विचार । अधिक अमृत सुकें सींचिया, तिन देखाए दरवाजे पार ॥३॥

भले या जुग में आचारज प्रगटे, जिन चरची सुकजी की बान । धंन धंन टीका श्री वल्‍लभी, इन प्रेम प्रकास्यो परमान ॥४॥

आए मिलो रे वैष्णव पारखी, तुम देखियो विचारी सब अंग । टीका वल्लभी बानी सुकदेव की, ताके एक अखर को न कीजे भंग ॥५॥

इत वृन्दावन रासलीला रातडी अखंड, खेलें पिउ गोपी जन । तो ऊधव संदेसे किन पर लाइया, कहो किनने किए रूदन ॥६॥

इत रात अखण्ड सो तो टाली न टले, भी कह्या आगे ऊग्या रे दिन । सखियां पिउ उठे सब घर से, ए घर कौन रे उतपन ॥७॥

बृज अखंड ब्रह्मांड में हुआ, विचार देखो रे बुधवंत । एक रंचक न राखी चौदे लोक की, महाप्रले कह्यो ऐसो अंत ॥८॥

बृज ने रास अखण्ड कहे प्रगट, सो तो नित नित नवले रंग । एक रंचक रहे जो ब्रह्मांड की, तो टीका को होवे रे भंग ॥९॥

रात दिन अखण्ड कहे बृज में, दिन नाहीं वृन्दाबन रास । रात अखण्ड लीला खेलहीं, दोऊ कैसे अखण्ड विलास ॥१०॥

बृज रास लीला दोऊ नित कही, खेलें दोऊ लीला बाल किसोर । तो मथुरा आए कंस किनने मारया, ए कौन भई तीसरी लीला और ॥११॥

कहो के भूल्या टीका करता, के भूले तुम अर्थ । सो जुबां काटिए जो टीका को टेड़ा कहे, तुम भूले करत अनर्थ ॥१२॥

तुम आंकड़ी न पाई इत अखण्ड कह्या, तोए न खुले रे द्वार । तुम समझे नहीं बानी सुकदेव की, तो हिरदे रह्यो रे अंधकार ॥१३॥

अर्थ टीका का जो तुम पाया होता, तो अंधेर को होत नास । अनेक ब्रह्मांड जाके पलथें उपजे, ताको देखत इत उजास ॥१४॥

तुमको बल जो खुल्या होता इन बानी का, तो भटकत नहीं रे भरम । इतथें देखो अखंड लीला प्रगट, तब समझत माया को मरम ॥१५॥

तुम सब मिल दौड़े अखंड सुखको, सुन प्रेम टीका के वचन । अर्थ पाए बिना प्रेमें ले पटके, कहूं उलटाए दिए रे अगिन ॥१६॥

इन बृज रैन को ब्रह्मा बोहोत तलफया, पर पाई नहीं रे निरवान । सो सुखें तुम कैसे पाओगे, देखो अपनी चाल के निसान ॥१७॥

ए झूठा भवजल अथाह कह्या, ताको पार न पायो किन क्यांहें । याको गौपद बच्छ गोपी कर निकसी, सो पार जाए मिलियां अखंड मांहें ॥१८॥

अब केता कहूं तुमकों जाहेर, ए अर्थ प्रगट कह्यो न जाए । निघात डारे छोड़ लज्या अहंकार, नेहेचल सुख दीजे रे ताए ॥१९॥

ए प्रकास विचार तुम देख्या नाहीं, तुम वैभवें लगे रे विलास । अब महामत कहे जोत उद्दोत भई, ताको इत आए देखो रे उजास ॥२०॥

॥ प्रकरण ॥१३॥ चौपाई ॥१४९॥

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