किरन्तन - प्रकरण १४
राग सोरठ
धनी न जाए किनको धूत्यो, जो कीजे अनेक धुतार । तुम चैन ऊपर के कई करो, पर छूटे न क्यों ए विकार ॥१॥
कोई बढ़ाओ कोई मुड़ाओ, कोई खैंच काढ़ो केस । जोलों आतम न ओलखी, कहा होए धरे बहु भेस ॥२॥
चार बेर चौका देओ, लकड़ी जलाओ धोए जल । अपरस करो बाहेर अंग को, पर मन ना होए निरमल ॥३॥
सात बेर अस्नान करो, पेहेनो ऊंन उत्तम कामल । उपजो उत्तम जात में, पर जीवड़ा न छोड़े बल ॥४॥
सौ माला वाओ गले में, द्वादस करो दस बेर । जोलों प्रेम न उपजे पिउ सों, तोलों मन न छोड़े फेर ॥५॥
तान मान कई रंग करो, अलापी करो किरंतन । आप रीझो औरों रिझाओ, पर बस न होए क्यों ए मन ॥६॥
उच्छव करो अंनकूट का, विविध करो प्रसाद । पर निकट न आवें नाथ जी, पीछे सब मिल करो स्वाद ॥७॥
सीखो सबे संस्कृत, और पढ़ो सो वेद पुरान । अर्थ करो द्वादस के, पर आप न होए पेहेचान ॥८॥
साधो सबे जोगारंभ, अनहद अजपा आसन । उड़ो गड़ो चढ़ो पांच में, आखिर सुन्य न छोड़ी किन ॥९॥
आगम भाखो मन की परखो, सूझे चौदे भवन । मृतक को जीवत करो, पर घर की न होवे गम ॥१०॥
सतगुर सोई जो आप चिन्हावे, माया धनी और घर । सब चीन्ह परे आखिर की, ज्यों भूलिए नहीं अवसर ॥११॥
ए पेहेचाने सुख उपजे, सनमंध धनी अंकूर । महामत सो गुर कीजिए, जो यों बरसावे नूर ॥१२॥
॥ प्रकरण ॥१४॥ चौपाई ॥१६१॥
