किरन्तन - प्रकरण १५
राग श्री
पतित सिरोमन यों कहे । जो मैं किए हैं बज्रलेप, मेरे साहेब सों द्वेष ॥ टेक ॥१॥
पतित मेरे आगे कौन कहावे, मैं कोई न देख्या रे पतीत । ए सब कोई साध चलत हैं सीधे, जो देखिए अपनी रीत ॥२॥
दुनियां सकल चलत है पैंडे, जो साध बड़ों ने बताया । उलटा कोई नहीं रे यामें, पतित किने न केहेलाया ॥३॥
उलटा एक चलत हों यामें, मैं छोड़ी दुनियां की राह । तोड़ी मरजाद बिगड़या विश्व थें, मैं तो पतितन को पातसाह ॥४॥
सूर जैसे पतित कहावे, और की सोभा आप देवे । ओ अंधा राँक गरीब साध जो, सो क्या रे पतीती लेवे ॥५॥
नामधारी पतित जो हुते, जिन जुध जगपति सों किए । जगपति जग में बड़ा जोरावर, तिन मार चरन तले लिए ॥६॥
या जग में ए क्या रे पतीती, कोई न पोहोंच्या पार । बोहोत दौड़े सो सुन्य तोड़ी, आड़ी पड़ी निराकार ॥७॥
मैं उलटाए आतम जुगतें जगाई, पार की तरफ फिराई । सुन्य निराकार पार परआतम, मैं ता पर दृष्ट चढ़ाई ॥८॥
अगम के पार जो अलख कहावे, मैं तिनसों जाए जुध लिया । इहाँ लग और सब्द नहीं सीधा, सो प्रगट पकड़ के किया ॥९॥
इन आतम को घर एही अछर है, ए तो पारब्रह्म परखाया । ए जुध जीत्या मैं सेहेजे, सतगुर जी की दया ॥१०॥
अब अछर के पार मैं जुध बनाऊँ, सकल आउध अंग साजुं । प्रेम की सैन्या प्रगट चलाऊँ, कंठ अछरातीत मिलाऊँ ॥११॥
पतित ऐसी पुकार न कीजे, पर मोको इन चोटें अगिन लगाई । बोहोत बरस मैं राखी अंदर, अब तो ढाँपी न जाई ॥१२॥
पार के पार पार जाए पोहोंच्या, जीवत अखण्ड सुख पाया । पतितन के सिर महामत मुकुट मनि, जिन ए जुध जग में लखाया ॥१३॥
॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥१७४॥
