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किरन्तन - प्रकरण १६

राग श्री

दुख रे प्यारो मेरे प्रान को । सो मैं छोड़यो क्यों कर जाए, जो मैं लियो है बुलाए ॥ टेक ॥१॥

इन अवसर दुख पाइए, और कहा चाहियत है तोहे । दुख बिना चरन कमल को, सखी कबहूं न मिलिया कोए ॥२॥

जिन सुख पिउजी ना मिले, सो सुख देऊं रे जलाए । जिन दुख मेरा पिउ मिले, मैं सो दुख लेऊं बुलाए ॥३॥

दुख तो हमारो आहार है, औरन को दुख खाए । दुख के भागे सब फिरें, कोई विरला साध निबाहे ॥४॥

दुख को निबाहू ना मिले, और सुख को तो सब ब्रह्मांड । इन झूठे दुख थें भाग के, खोवत सुख अखण्ड ॥५॥

दुख की प्यारी प्यारी पिउ की, तुम पूछो वेद पुरान । ए दुख मोही को भला, जो देत हैं अपनी जान ॥६॥

ता कारन दुख देत हैं, दुख बिना नींद न जाए। जिन अवसर मेरा पिउ मिले, सो अवसर नींद गमाए ॥७॥

नींद बुरी या भरम की, भरम तो भई आड़ी पाल । वह दुख देत जलाए के, जो आड़ी भई अपने लाल ॥८॥

नींद निगोड़ी ना उड़ी, जो गई जीव को खाए । रात दिन अगनी जले, तब जाए नींद उड़ाए ॥९॥

इन सुपने के दुख से जिन डरो, दुख बदले सत सुख । अपने मासूक सों नेहड़ा, तोको देयगो बनाए के दुख ॥१०॥

ता सुख को कहा कीजिए, जो देखलावे धरम राए । मैं वह दुख मांगो पिउपें, पिउ सों पल पल रंग चढ़ाए ॥११॥

दुख सब सुपनों हो गयो, अखण्ड सुख भोर भयो । महामत खेले अपने लाल सों, जो अछरातीत कह्यो ॥१२॥

॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥१८६॥

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